मैं अदना-सा सरकारी मुलाजिम हूं। अच्छे दिन आने वाले हैं और मेरी रुह कांप रही है। शुरुआत हो गई है। 'फाइव डे वीक' वाले युग का अवसान होने जा रहा है, यानी छे दिन आने वाले हैं। बात प्रस्ताव से आगे बढ़ चुकी है और अच्छे दिन की गाज कभी भी गिर सकती है। अब लंबे समय से शनिवार को टांगे फैलाकर सोने की आदत छोड़नी होगी। शनिदेव कुपित होने को हैं। बहुत हो चुकी फांकेबाजी। अब काम, काम और केवल काम की बातें होंगी। जब काम होगा, तभी तो विकास होगा और जब विकास होगा, तभी भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाएगा। मंत्री जब चौबीस घंटे दिन-रात काम करेंगे, तो क्या बड़े बाबू शनिवार के आठ-नौ घंटे और नहीं दे सकते।
अब कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन की भावना सर्वोपरि होगी। बुरे दिनों का खात्मा होगा, और अच्छे दिन यानी छे दिन बाजा बजाते आ रहे हैं। प्रति शनिवार, शनिदेव की पूजा-अर्चना का यह सौभाग्य भरा प्रतिफल है। जो तेल शनिदेव को चढ़ता था, अब अधिकारियों के लगाने में काम आएगा। जिस सरकारी कर्मचारी में आयरन की कमी होती जा रही थी, वह आयरनी से बाहर आएगा। दफ्तर का लोहे का फाटक पूजते-पूजते अकाल पीड़ित-सा लगने वाला कर्मचारी स्वयं लौहपुरुष हो जाएगा। अब वह इस कोठी का धान उस कोठी में करता हुआ युग परिवर्तन का साक्षी बनेगा। अभी उंगली से मतदान के निशान भी नहीं छूटे थे कि अच्छे दिन ने दस्तक दे दी है।
जब नौकरी शुरू की थी, तब भी छह दिन के काम का हफ्ता हुआ करता था। कुछ ही दिन काम करते बीते थे कि 'फाइव डे वीक' की योजना आ गई। इस योजना ने ही निकम्मा बना डाला, वरना हम भी आदमी थे काम के। अच्(छे) दिन आने वाले हैं; यह बात और है कि मेरा बुढ़ापा खराब होने जा रहा है। मैं अब रिटायरमेंट के दिन और कनपटी पर बिछ गए सफेद बालों की गिनती कर रहा हूं। अच्छे दिन आने से मैं क्या, मेरे पूजनीय पिता जी भी अब नहीं रोक सकते। आगे-आगे देखिए होता है क्या!