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एक-दूसरे के हाथों मारे गए दैत्य

Mon, 02 Sep 2013 07:45 PM IST
शिवकुमार गोयल
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दैत्य हिरण्यकश्यपु के कुल में निकुंभ नामक दैत्य था। उसके पुत्र सुंद और उपसुंद महापराक्रमी थे। दोनों ने घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा जी ने वर मांगने को कहा। दैत्यों ने कहा, हमें अमरत्व प्रदान करें।
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ब्रह्मा जी ने कहा, अमरत्व किसी को नहीं मिल सकता। हर किसी की मृत्यु अवश्यंभावी है। उनके बार-बार आग्रह करने पर ब्रह्मा जी ने कहा, ठीक है, तुम्हारा संहार नहीं हो पाएगा, पर यदि तुम दोनों में फूट पड़ गई, तो एक-दूसरे के हाथों मारे जाओगे।

दोनों दैत्य अपने को अमर मानकर अहंकारवश ऋषि-मुनियों का उत्पीड़न करने लगे। दोनों से त्रस्त देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्हें बताया कि उनके दिए वरदान के कारण इन दैत्यों का अत्याचार चरम सीमा को पार कर गया है। उन्होंने असुर वध की गुहार लगाई। ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा से कहा, एक ऐसी सुंदर रमणी तैयार करो, जो इनके बीच पहुंचकर इन दोनों को आकर्षित कर उनमें फूट डाल सके।
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तिलोत्तमा नामक एक सुंदरी को पढ़ा-लिखाकर दैत्य बंधुओं के पास भेजा गया। कुछ दिनों में ही उसने सुंद और उपसुंद को इतना आकर्षित कर लिया कि दोनों उससे विवाह के सपने देखने लगे।

उसे लेकर दोनों भाइयों में प्रतिस्पर्धा और द्वेष की भावना पनपने लगी। अंत में उसे पत्नी बनाने की लालसा में दोनों आपस में ही लड़ते हुए काल का ग्रास बन गए। इस तरह अन्याय का अंत हुआ और देवताओं को राहत मिल गई।
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