गुरुद्वारा दरबार साहिब को भारत से जोड़ने वाले करतारपुर गलियारे के उद्घाटन समारोह के दिन पाकिस्तान में जश्न का माहौल था। देश के दूरस्थ इलाकों में रहने वाले लोगों ने टेलीविजन पर इस समारोह का लुत्फ उठाया। एक दूसरे के साथ विवादों और युद्धों में उलझे रहे दो पड़ोसी देशों ने दुनिया को दिखा दिया कि अगर मौका मिले और राजनीतिक इच्छा शक्ति हो, तो कुछ भी संभव है। अब तक ज्यादातर पाकिस्तानी गुरुद्वारा दरबार साहिब के महत्व से अनजान थे। लेकिन जब प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि सिख समुदाय के लिए इस गुरुद्वारे के महत्व के बारे में उन्हें अब जाकर पता चला है, तब आम पाकिस्तानी को भी इसका महत्व मालूम हुआ। इमरान खान ने कहा, 'फर्ज कीजिए कि मुसलमान मक्का से कुछ मील दूरी पर खड़े हैं, लेकिन उन्हें अंदर आने की इजाजत नहीं मिलती। अचानक ही सारे प्रतिबंध हटा लिए जाते हैं और आपको वहां जाने की इजाजत मिलती है। मुस्लिमों के लिए जैसे मक्का है, वैसे ही सिखों के लिए दरबार साहिब है।'
गुरुद्वारा दरबार साहिब की भावना ने सभी पाकिस्तानियों को एक कर दिया और विपक्ष के किसी भी सदस्य ने सरकार के फैसले का विरोध नहीं किया। यह तथ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत तथा दुनिया के दूसरे देशों से पाकिस्तान आए सिख श्रद्धालुओं को कोई शिकायत नहीं थी और वे यहां बेहद खुश नजर आ रहे थे। बेशक यह बहुत बड़ी पहल थी, लेकिन तब भी यह सवाल तो उठ ही रहा है कि दोनों देशों के बीच व्याप्त संदेह और बदतर रिश्तों को देखते हुए क्या यह गलियारा श्रद्धालुओं के लिए खुला रह पाएगा? या ऐसा भी कोई समय आएगा, जब राजनीतिक वजहों से भारत यह गलियारा बंद कर देगा? ऐसी आशंकाओं की वजहें हैं। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने के विरोध में पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंध घटाते हुए भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित कर दिया है और नई दिल्ली से अपने उच्चायुक्त को भी वापस बुला लिया है। दोनों देशों के बीच सभी तरह का व्यापार ठप हो चुका है और वीजा मिलने में भी बड़ी मुश्किलें आ रही हैं।
लेकिन अगर ये दोनों मुल्क मजहब को सियासत से अलग रखें, तो मुझे यकीन है कि करतारपुर गलियारे के बंद होने की नौबत कभी नहीं आएगी। पाकिस्तान के अनेक मुसलमान धार्मिक पर्यटन के लिए भारत जाना चाहते हैं और वे वीजा की मांग कर रहे हैं। हाल के कुछ वर्षों में देखा गया है कि भारत सरकार ने अपने यहां की दरगाहों की जियारत के लिए जाने के इच्छुक पाक श्रद्धालुओं को वीजा नहीं दिया है, जबकि दोनों देशों के बीच इस तरह के धार्मिक पर्यटन के लिए सहमति बनी हुई है। मौलाना फजलुर रहमान द्वारा अपना धरना खत्म कर दिए जाने से सरकार ने राहत की सांस ली है। मौलाना को भी यह एहसास हो गया कि पाकिस्तान जैसे लोकतांत्रिक मुल्क में सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने के लिए धरने पर बैठने से कुछ हासिल नहीं होता। मौलाना अपनी जिद में इतने हताश हो गए थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ-साथ सेना की भी आलोचना कर दी। लेकिन मौलाना को तब तुरंत अपनी जुबान बंद कर लेनी पड़ी, जब सेना ने कहा कि सरकार को उसका पूरा समर्थन है। मौलाना को बस इतना फायदा हुआ कि उन्होंने अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं में उम्मीद पैदा की और इसका भी पता चला कि उनकी पुकार पर उनके हजारों समर्थक जमा हो सकते हैं।
पाकिस्तान की सियासत में अब कुछ बदलाव की उम्मीद की जा रही है, क्योंकि बहुत मुश्किलों के बाद और अदालती आदेश के मद्देनजर तीन बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ का नाम एक्जिट काउंसिल लिस्ट से हटा लिया गया है और अब वह इलाज के लिए लंदन गए हैं। जेल में वह गंभीर रूप से बीमार थे, पर अब तो उनके खून में प्लेटलेट काउंट भी बहुत कम हो गया है, और इसकी वजह के बारे में कुछ मालूम नहीं है। बुधवार को उन्हें लंदन के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके भाई और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ उनके साथ गए हैं। मरियम नवाज को, जो मुस्लिम लीग में बेहद महत्वपूर्ण जगह रखती हैं और जिनकी लोकप्रियता भी काफी है, अपने पिता की देखभाल करने के लिए जमानत दी गई है। लेकिन चूंकि उनके खिलाफ अदालत में मामले हैं, ऐसे में, सरकार उन्हें वापस जेल भेज देगी या उन्हें उनके घर में रहने की इजाजत दी जाएगी, यह सवाल तो है ही। मरियम के पति भी जेल में हैं। मरियम अपने पिता के साथ लंदन नहीं जा पाईं, क्योंकि उनका पासपोर्ट अदालत के पास है, और फिलहाल यह साफ नहीं है कि पासपोर्ट उन्हें लौटाया जाएगा या नहीं। ट्विटर पर बेहद सक्रिय रहने वाली मरियम फिलहाल सोशल मीडिया से दूर हैं और उन्होंने कोई राजनीतिक बयान भी नहीं दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि मुस्लिम लीग की सत्ता प्रतिष्ठान के साथ इस पर सहमति बनी है कि नवाज की पार्टी पहले की तरह फिलहाल सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं करेगी। कहा यह जा रहा है कि नवाज शरीफ आगे के इलाज के लिए अमेरिका जाएंगे। अभी मुस्लिम लीग 'देखो और इंतजार करो' के मूड में है।
जबकि सबकी निगाहें इस समय इमरान खान और उनकी कमजोर सरकार पर है। सरकार का बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करता है कि सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा सेवा विस्तार को, जिसका फैसला प्रधानमंत्री ने किया, स्वीकार करते हैं या नहीं। दरअसल पाकिस्तान में इस पर सवाल उठ रहे हैं कि प्रधानमंत्री द्वारा जनरल बाजवा के सेवा विस्तार के पत्र की कॉपी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई और दूसरे सरकारी विभागों में इसे क्यों नहीं भेजा गया, जबकि तमाम सरकारी नोटिफिकेशन को दूसरे विभागों में भेजने की परंपरा रही है। नवंबर के अंत तक बहुत से ऐसे मुद्दों पर सच्चाई सामने आ जाएगी।