नवंबर माह में राजस्थान की सांभर झील, दस हजार से ज्यादा प्रवासी परिंदों की कब्रगाह बन चुकी है। जहां कभी दूर देश से आए परिंदे अपने परिवारों के साथ नर्म धूप में अठखेलियां करते थे, चहकते थे, वहीं आज सदा-सदा के लिए मौन हैं। हमारी धरती उनकी कब्रगाह बन रही है। सभ्यता, संस्कृति और पर्यावरण पर डींगे हांकते हुए हम इन पक्षियों के हत्यारे साबित हो रहे हैं। हजारों किलोमीटर की यात्रा के बाद, सांभर झील पहुंचे प्रवासी पक्षियों के मारे जाने के कारणों की तलाश जारी है। राजस्थान के जयपुर, नागौर और अजमेर जिलों की सीमाएं इस झील से मिलती हैं। पक्षियों की मौत को लेकर आशंका जाहिर की जा रही है कि झील के पानी में किसी प्रकार के जहरीले रसायन के घुलने से ऐसा हुआ है। कुछ लोग यह कह रहे हैं कि झील में सोडियम की मात्रा बढ़ने से पक्षियों को लकवा मार रहा है। सोडियम की मात्रा बढ़ने के पीछे, नमक के अवैध खनन को कुछ लोग जिम्मेदार बता रहे हैं।
इस प्रकार की यह पहली घटना नहीं है। हमारी तथाकथित विकास की अवधारणा ने प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट करना शुरू कर दिया है। हमारी नापाक हरकतों से लंबे समय से पशु-पक्षी मारे जा रहे हैं। गिद्धों, गौरैयों और असंख्य जीव-जंतुओं को हमने लील लिया है। हमने अपने स्वार्थ के लिए असंख्य जीव-जंतुओं के निवासों को उजाड़ दिया है। हवा, पानी और खाद्य पदार्थों को जहरीला बनाने में हमारा ही हाथ है। परिंदे, मानव निर्मित सीमाओं में नहीं बंधते। वे प्रकृति और मौसम के अनुसार अपना बसेरा बनाते हैं। निश्चय ही यूरोपीय देशों की स्वच्छ आबोहवा में पलने वाले ये परिंदे, मजबूरीवश हमारे यहां आते हैं। जाड़े के मौसम में जब वहां की झीलें जम जाती हैं, तब उन्हें भारत या एशिया की ओर रुख करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता। वे आते हैं, तो हमारा पर्यावरण संवर जाता है। हमारे लोक संसार में इन प्रवासी पक्षियों के लिए अनेक लोकगीत मिलते हैं। लोक समाज उनके कलरव से उत्साहित और आनंदित होता है। आज ये परिंदे एकाएक हमसे सशंकित हो उठे हैं।
सदियों से जो सांभर झील, परिंदों के लिए अनुकूल रही, इस बार मौत का कारण कैसे बन गई, इस मामले की जांच जारी है। राजस्थान उच्च न्यायालय के संज्ञान में मामला आ चुका है और आज इस पर सुनवाई होनी है। यह सही है कि सांभर झील का मनमाना दोहन, नमक व्यापारियों द्वारा किया गया है, मगर दुनिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील में नमक की मात्रा बढ़ने का तर्क गले नहीं उतर रहा। बर्ड फ्लू की आशंका को चिकित्सकों ने पहले ही खारिज कर दिया है। बात, झील के जल के विषाक्त होने पर ठहरती है। संभव है किसी फैक्टरी का जहरीला रसायन नदियों से होते हुए झील तक पहुंचा हो। जो भी हो, जांच के बाद ही स्थिति साफ होगी और पक्षियों के मारे जाने के ठोस कारण का पता चलेगा। फिर भी क्या जांच के बाद परिंदों की सामूहिक हत्या की जिम्मेदारी तय होगी?
सांभर झील में पक्षियों की 27 प्रकार की प्रजातियां मरी हैं। बर्ड फ्लू इसका कारण होता, तो भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रजातियों पर एक समान असर नहीं पड़ता। देश की नदियों और झीलों में फैलता प्रदूषण आज गंभीर खतरा बन चुका है। आए दिन अनेक प्रकार की मछलियां दम घुटने से मर रही हैं। गर्मियों में यह स्थिति और भी खराब होती है। रसायनों के इस्तेमाल से सैकड़ों प्रकार के जीव-जंतु समाप्त हो चुके हैं। ऐसे में बढ़ते प्रदूषित वातावरण में जिस तरह पशु-पक्षियों का खात्मा हो रहा है, उससे यह आशंका प्रबल हो रही है कि अगला नंबर मनुष्यों का है।