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कश्मीर का एक ही विकल्प

Tue, 06 Jun 2017 06:07 PM IST
शिवदान सिंह
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शिवदान सिंह
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अस्सी के दशक में पंजाब के खालिस्तानी आतंकवाद की समाप्ति के बाद पाकिस्तान ने पंजाब में इस्तेमाल तरीकों को जम्मू-कश्मीर में भी इस्तेमाल किया। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने अफगानिस्तान में भी यही किया। हथियारों से लैस आतंकियों के जरिये उसने दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि कश्मीर की जनता भारत में नहीं रहना चाहती। उसकी यह साजिश बेनकाब हो चुकी है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इससे कोई समझौता नहीं हो सकता। इसके बावजूद पाकिस्तान की ओर से यह दुष्प्रचार किया जाता है कि कश्मीरी पाकिस्तान में शामिल होना चाहते हैं या फिर कथित आजादी के नाम पर वहां जनमत संग्रह कराए जाने की बात होती है। इन दावों की सचाई को परखा जा सकता है। 
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पाकिस्तान 1947 से लेकर आज तक कभी-भी ऐसा देश नहीं रहा है, जहां पर मानवाधिकारों की स्थिति अच्छी रही हो या इतना विकास हुआ हो कि भारत के मुकाबले वहां पर एक आदमी की जिंदगी ज्यादा खुशगवार हो। पाक में अभी तक भूमि सुधार लागू न होने के कारण ज्यादातर जमीन केवल 243 जमींदारों के कब्जे में है। इस कारण वहां पर सामंती तथा कबायली कानूनों से ही रोजाना की जिंदगी चलती है। पाकिस्तान ने विश्व को केवल दो चीजें ही निर्यात की है, आतंकवाद तथा जमीन।

पाकिस्तान में ज्यादातर सेना का शासन रहा, जिसके कारण लोकतांत्रिक विरोध के लिए वहां पर कोई स्थान कभी रहा ही नहीं। इसी कारण अस्सी के दशक में वहां के फौजी शासक जियाउल हक ने अफगनिस्तान में लड़ने के लिए गरीब परिवार के युवाओं को इस्लामी मदरसों के रास्ते से तालिबानी आंतकवादी बनाकर रूसी सेनाओं के विरूद्ध लड़ने के लिए उपलब्ध करवाया। इस कारण जगह-जगह पाकिस्तान में आंतकी कैंप चलाए जा रहे हैं। पाकिस्तान में न कोई विदेशी निवेश ही आ रहा है और न ही वहां पर कोई औद्योगिक विकास हुआ। 
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कश्मीर की जिस आजादी की बात की जाती है, उसकी हकीकत भी देखी जा सकती है। इस राज्य के तीन भाग जम्मू, कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र हैं, जिनमें कुल 22 जिले हैं। जनमत संग्रह या किसी प्रकार के भारत विरोधी विचार की खबरें जम्मू और लद्दाख से नहीं आ रही हैं। यह भारत विरोधी प्रदर्शन दक्षिण कश्मीर के केवल चार जिलों तक ही सीमित हैं, क्योंकि यहां पर पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी पैसों तथा आंतक के द्वारा युवाओं को डराकर उन्हें पत्थरबाजी और अन्य प्रकार की देश विरोधी गतिविधियों के लिए तैयार करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार जनमत संग्रह में जम्मू-कश्मीर के मूल निवासियों द्वारा ही मत का प्रयोग करना चाहिए। मगर पाक अधिकृत कश्मीर में वहां के पंजाब और पख्तूनख्वा के लोगों को बड़ी संख्या में बसाया गया है। प्रधानमंत्री भुट्टो ने वहां पर 1947 से लागू भारतीय कश्मीर के अनुच्छेद 370 जैसा प्रावधान हटा दिया था। इस कारण पाक कब्जे वाले कश्मीर की जनसंख्या का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है, और वहां के मूल निवासी कश्मीरी अल्पसंख्यक हो गए। दूसरी तरफ आतंक के बल पर घाटी से तीन लाख कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करने पर मजबूर किया गया, जिससे घाटी में हिंदुओं की संख्या न्यूनतम हो गई है। इसलिए न पाक अधिकृत कश्मीर और न ही भारतीय कश्मीर में जनमत संग्रह के लिए असली मतदाता मौजूद हैं। 
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कश्मीरी जनता के साथ मिलकर भारत सरकार तथा राज्य सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिनसे कुछ गिने-चुने अलगाववादियों और आतंकवादी अलग-थलग पड़ जाएं।
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