करतारपुर गलियारे की नींव रखने की घटना को हमारे यहां बहुत उम्मीद के साथ देखा गया और इसे स्थायी शांति की दिशा में बड़ा कदम बताया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी तुलना बर्लिन की दीवार गिराए जाने से की। लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस सुखद संभावना का जोरदार खंडन करते हुए कहा कि गलियारे के खुलने को दोतरफा रिश्तों की शुरुआत से नहीं जोड़ा जा सकता। इससे यह सवाल पैदा हुआ है कि क्या मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ रिश्तों के मामले में बंटी हुई है।
दूसरी तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि भारत से बेहतर रिश्ते के मुद्दे पर देश की सभी राजनीतिक पार्टियां और सेना एकमत हैं। लेकिन सवाल यह है कि किस आधार पर वे सब एकमत हुए हैं। जाहिर है, कश्मीर मुद्दे पर बात न करने की सहमति तो उनमें नहीं बनी होगी। हकीकत यह है कि अगर पाकिस्तान से कश्मीर का मुद्दा छीन लिया जाए, तो वह दिशाहीन हो जाएगा।
दरअसल भारत ने पाकिस्तान के सामने करतारपुर गलियारा खोलने का प्रस्ताव दो दशक से भी पहले रखा था, और तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अपनी चर्चित लाहौर यात्रा में इस पर जोर भी दिया था। इतने वर्षों तक भारत के इस प्रस्ताव पर रुचि न जताने के बाद इमरान खान के प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान ने अचानक इस गलियारे पर हामी भर दी और इसकी नींव भी रख दी। बेशक इसे सब जानते हैं कि इमरान सेना के करीबी हैं, लेकिन 26 नवंबर से पहले इस प्रस्ताव पर पाकिस्तान के अंतिम रूप देने का कारण कुछ और भी है। दरअसल मुंबई हमले की 10 वीं बरसी से पहले इस पर कदम आगे बढ़ाना पाकिस्तान द्वारा इस मामले में अपनी किरकिरी कम कराने का सुनियोजित प्रयास था। उसका मानना था कि करतारपुर गलियारे के भावनात्मक मुद्दे के कारण भारतीय मीडिया मुंबई हमले में उसकी भूमिका को उतना तूल नहीं देगा।
गलियारा खोलने का दूसरा कूटनीतिक लाभ यह था कि इससे पाकिस्तान को अपनी छवि सुधारने में मदद मिली-उसे लगा कि अब उसे आतंकवाद का केंद्रबिंदु नहीं माना जाएगा और इससे भारत के साथ बातचीत का रास्ता भी खुल सकता है। पाकिस्तान में गलियारे की नींव रखते हुए भव्य समारोह का आयोजन इसी कारण था। लेकिन पाकिस्तान अगर यह सोच रहा था कि खालिस्तान आंदोलन को खाद-पानी देने की उसकी करतूत की, जिसका सुबूत आयोजन के दौरान भी दिखा, भारत अनदेखी कर देगा, तो यह उसकी मूर्खता ही था!
दरअसल पाकिस्तान बहुत बदतर स्थिति से गुजर रहा है। उसने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आर्थिक मदद मांगी है, जो शायद ही मिले। जहां तक चीन की बात है, तो उसका पाकिस्तान पर कई तरह से नियंत्रण है। इस समय वह पाकिस्तान की लगभग हर परियोजना की फंडिंग कर रहा है, पर उसकी ब्याज दर काफी अधिक है। इमरान ने चीन से मदद मांगी है, लेकिन बीजिंग ने इस मदद के बहाने सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) के तहत और 15 परियोजनाओं में पाकिस्तान के सामने फंडिंग का प्रस्ताव रखा है। जबकि इमरान शुरू से ही सीपीईसी के आलोचक रहे हैं।
ऐसी स्थिति में भारत के साथ मेलजोल न केवल पाकिस्तान के अलगाव को कम करेगा, बल्कि पाकिस्तान के मुताबिक, इससे दुनिया में यह संदेश भी जाएगा कि भारत अपने इस पड़ोसी देश को आतंक का केंद्रबिंदु नहीं मानता। पर पाकिस्तान को इसका बहुत लाभ नहीं मिलने वाला, क्योंकि अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक मानता है।