विगत 19 जुलाई को दिल्ली के अस्पताल में कोरोना से जूझते हुए प्रोफेसर कलीम बहादुर की मृत्यु हो गई। करीब डेढ़ साल पहले ही उनकी पत्नी किरन सक्सेना का निधन हुआ था, जो बरेली शहर के प्रसिद्ध वकील और अंग्रेजी पत्रकार मुंशी प्रेमनारायण सक्सेना की बेटी थीं। तभी से कलीम बहादुर जी का स्वास्थ्य और भी गिरता चला गया।
उम्र के साथ स्मृति भी धुंधलाने लगी और लोगों के चेहरों की शिनाख्त उनके लिए कठिन होती जा रही थी। आज उनके न रहने पर अपने पास किसी अमानत की तरह संजोकर रखा उनका यादनामा मुझे बहुत याद आ रहा है।
कलीम बहादुर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में साउथ एशियन स्टडीज के प्रोफेसर रहे, जिनकी एक समय बड़ी ख्याति थी। भारत-पाक संबंधों के वह विशेषज्ञ माने जाते थे। प्रारंभ में कुछ साल तक उन्होंने गांधी फैजाम डिग्री कॉलेज, शाहजहांपुर में अंग्रेजी का अध्यापन किया।
बरेली कॉलेज में पढ़ाई के दौरान किरन से उनका प्यार हुआ और फिर दोनों विवाह बंधन में बंध गए। इस रिश्ते की उन दिनों खूब चर्चा रही। मुंशी प्रेमनारायण जी ने इस प्रेम विवाह पर कोई आपत्ति नहीं की, पर मोहल्ले वाले और पास-पड़ोस में विरोध का स्वर सुनाई दिया।
कलीम का साहस देखिए कि उन्होंने किरन के पास-पड़ोस से सीधा संपर्क किया और कहा कि आप लोगों को इस बात पर आपत्ति है कि मेरा नाम कलीम बहादुर खां है, तो लीजिए, मैं अपना नाम कृष्ण बहादुर रख लेता हूं। अब तो कोई आपत्ति नहीं होगी?
विवाह के कार्ड पर कलीम बहादुर खां का नाम कृष्ण बहादुर छपा था। पति और पत्नी, दोनों में से किसी ने अपना धर्म नहीं बदला। किरन भी जेएनयू में प्रोफेसर थीं। पुराने पत्रकार धर्मपाल गुप्त ‘शलभ’ का कहना था कि वैसे कलीम के पास मजहब था भी नहीं।
मकान उनका बरेली के बड़े बाजार की गली नवाबान में था जहां अब उन्हें जानने वाला कोई नहीं। बरेली में कुतुबखाना, सब्जी मंडी में विलायती राम बिस्कुट वालों की दुकान के सामने उन्हीं का एक छोटा-सा रेस्टोरेंट हुआ करता था, जहां चाय की चुस्कियों के बीच साम्यवाद से प्रभावित युवाओं का जमावड़ा होता था, जिनमें कलीम बहादुर प्रमुख थे।
वह 1857 के शहीद खान बहादुर खां के पौत्र थे, पर उन्होंने सत्तावनी क्र्रांति में फांसी चढ़ने वाले शहीद खान बहादुर खां के पौत्र की पहचान को अपने नाम के साथ जोड़ने की कभी कोशिश नहीं की। करीब दो दशक पहले कलीम बहादुर जब बरेली कॉलेज के आमंत्रण पर यहां आए थे, और उन्होंने जो भाषण दिया था, वह बरेली की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, 'उन दिनों हम लोग गली नवाबान में रहते थे।
इस गोल मोहल्ले में दरअसल पूरा कुनबा ही था खान बहादुर खां का। सब एक दूसरे के रिश्तेदार। मेरे वालिद अहमद बहादुर खां शिक्षक थे। हमारे घर में एक खानदानी रजिस्टर हुआ करता था, जिसमें खानदान के हर शख्स के बारे में डेली डायरी की तरह सारी जानकारियां दर्ज होती थीं।
17वीं सदी के छठे दशक में हाफिज रहमत खां के बेटे जुल्फिकार खां ने इसकी शुरुआत की थी। बचपन में और बड़ा होने पर भी इस रजिस्टर को देखा-पढ़ा है। मगर इससे ज्यादा कुछ नहीं। बरेली का समाज हमेशा से ही बहुभाषी, बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों का रहा है।
शहर के तमाम मोहल्लों में भी ऐसा ही रहा। झगड़ा-टंटा तो तब भी होता था, मगर यह व्यक्तिगत होता था, सामूहिक नहीं। दरअसल फिरकापरस्ती इस शहर की तबियत में है ही नहीं। बटवारे के वक्त भी यहां से जाने वाले तमाम लोग वे थे, जो प्राइवेट कंपनियों में मुलाजमत करते थे और अपनी रोजी की खातिर उन्हें जाना पड़ा।
मेरे चाचा यार मोहम्मद खां रेलवे में काम करते थे। वह न्यूरिया और दोहना में स्टेशन मास्टर रहे। रेलवे उन दिनों प्राइवेट कंपनियां चलाती थीं, सो उन्हें ईस्ट पाकिस्तान जाना पड़ा। ऐसे ही मेरे भाई सलीम बहादुर खां रावलपिंडी गए। मुझे एक वाकया याद है, गालिबन 1943 की बात है।
चुंगी के इलेक्शन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के कैंडिडेट आमने-सामने थे। मोहल्लों में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी सुने जाते थे। नतीजा आया, तो पता चला कि कांग्रेस के मौलवी अब्दुल वाजिद चुन लिए गए। होली के तमाम ऐसे दिन याद हैं, जब मैं अपने वालिद की साइकिल पर पीछे बैठा आलमगिरीगंज जैसे इलाकों से गुजरा हूं, जहां खूब रंग चल रहा होता। मगर वालिद को देखते ही कुछ देर को थम जाता। ऐसा नहीं कि उन्हें रंग से कोई परहेज था, मगर शायद वह लोगों के इज्जत करने का अपना तरीका था।'
कलीम बहादुर उसके बाद बरेली नहीं आए। उन्होंने वर्ष 2008 में एक विद्वतापूर्ण व्याख्यान ‘धार्मिक उग्र्रवाद का उदय एवं दक्षिण एशिया के लिए इसके प्रभाव' पर दिया था। उनका एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार रमेश मेनन के साथ था। यह चर्चा खास तौर पर वाजपेयी-मुशर्रफ समिट को केंद्र में रखकर की गई थी। जेएनयू से अवकाश प्राप्ति के बाद भी दक्षिण एशिया की स्थिति पर उनका निरंतर संवाद हमें लाभान्वित करता था। उनके न रहने की खबर मिली, तो देर तक अपने शहर में आने की उनकी चाहत के साथ वह सब भी मेरे भीतर देर तक उमड़-घुमड़ बजता रहा, जब उन्होंने अपनी शर्तों पर जिंदगी जीते हुए देश के बड़े शिक्षाशास्त्री और दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति और सामाजिक स्थितियों का विशेषज्ञ बनकर बड़ी ख्याति अर्जित की थी। उनकी पक्षधरताएं वैश्विक समाज को उसका असल चेहरा सौंपने की कायल थीं, जिसे राजनीति बार-बार क्षतिग्रस्त करने पर आमादा थी।