देश में आयोजित अब तक तीन काव्य समारोहों में भाग लेने का सुअवसर मिल चुका है। ऐसा पहला समारोह टोरंटो में हुआ था, जहां आइसलैंड, कनाडा, पुएरटोरिको, अमेरिका, लातीनी अमेरिका के कई देश, ट्रिनिदाद, जार्ज टाउन, सूरीनाम आदि देशों के लगभग तीस कवि प्रतिभागी थे।
दूसरा काव्य समारोह, जो सही अर्थों में विश्व काव्य समारोह था, सन 2000 में कोलंबिया (लातीनी अमेरिका) के एक रमणीक स्थल मेडेयीन में हुआ, जिसमें दुनिया भर के लगभग साठ कवि प्रतिभागी थे।
तीसरा विश्व काव्य समारोह सन 2005 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में आयोजित था। संदर्भ यह था कि वर्ष 2005 कोरिया की स्वतंत्रता का षष्टपूर्ति वर्ष था। इसी वर्ष कोरिया, जापानी प्रभुत्व से मुक्त हुआ था। यह वर्ष इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि जापानी प्रभुत्व की लड़ाई में एक कवि ने प्राणों की बाजी लगा दी थी, जिसमें जीत कोरिया की हुई।
इससे भी रोचक दूसरा तथ्य यह कि जो कवि जिंदगी भर बंदूक चलाता रहा, वही कवि आजादी दिलाकर अपने नए स्वतंत्र हुए देश में, दूसरी तरह की स्वतंत्रता की घोषणा कर बौद्ध हो गया। इस कवि का नाम हान योंन उन था। बौद्ध होने के बाद उसे नया नाम मिला ‘म्हाने’। इसी बौद्ध हुए कवि के नाम पर दक्षिण कोरिया में एक प्रतिष्ठान है ‘म्हाने फाउंडेशन’। यह प्रतिष्ठान मानता है कि शांति के प्रकोष्ठ में प्रवेश कविता के माध्यम से ही संभव हो पाता है, इसलिए सर्वाधिक महत्व कवि को ही देना चाहिए।
कोरिया छोटे-छोटे पर्वतों का देश है। इसी श्रृंखला में एक पर्वत है गेउमगैंग पर्वत, जिसकी तलहटी पर बना है ‘म्हाने प्रतिष्ठान।’ दक्षिण कोरिया में अधिकांश लोग बौद्ध हैं। साथ ही कुछ शमानवादी हैं, कुछ नए बने ईसाई।
हमारा विमान जब सियोल हवाई अड्डे पर उतरा, तब हमें लेने एक दुभाषिनी आई। टैक्सी शहर के शीला होटल की ओर दौड़ रही थी। साथ ही साथ बगल में बह रही थी ‘शान’ नदी नीली और निर्मल। वहां के निवासी इस नदी को गंगा की तरह पवित्र मानते हैं। पहला दिन विश्राम का दिन था। दूसरे दिन स्वागत समिति के अध्यक्ष श्री कोउन ने दो घोषणाएं कीं।
पहली यह कि ओह से चिंग शिनदल जा और लीसी यंग सहित एक दर्जन कोरियाई कवि सत्र एक में कविता पाठ करेंगे आैर दूसरी घोषणा यह थी कि बारह अगस्त को सुबह-सुबह सभी कवि चार बसों में बैठकर उत्तरी कोरिया ले जाए जाएंगे। दस बजे हम सब ‘म्हाने बौद्ध विहार’ पहुंचे। पीसगेट से होते हुए हम उस हॉल में पहुंचे, जहां नोबेल पुरस्कार विजेता बोले शोयिंका (जो हमारे साथ आए थे) को शांति पुरस्कार से नवाजा गया।
बाहर निकल हमने देखा एक लंबी कतार में हम साठ कवियों की हस्त लिखित रचनाओं के होलोग्राफ टंके सजे थे (रचनाएं हमसे पहले ही मंगवा ली गई थीं) इन सभी रचनाओं को एक पुस्तक के आकार में नत्थी कर वहीं के पुस्तकालय में रखा जाएगा। शाम को हम उत्तरी कोरिया के कुमारगैंग होटल में रुके। रात्रि में काव्यपाठ वहीं हॉल में हुआ, जो सुबह तक चला। दस बजे हम सबको सियोल लौटना था। सभी कवि बस में जा बैठे थे। ग्यारहवें तल पर लिफ्ट की प्रतीक्षा में हमारे साथ संयोग से बोले शोयिंका भी खड़े थे। लिफ्ट आते ही हम दोनों ने कदम बढ़ाए। दरवाजा बंद हुआ। लिफ्ट बीच में कहीं बत्ती चली जाने के कारण ठप्प। हम सकते में। शोयिंका ने चुप्पी तोड़ी। ‘कुछ करो।’
हमने कहा ‘सांस रोको चालीस सेकेंड रोककर फिर छोड़ो फिर इसी तरह करते रहो।’ तीन मिनट का यह समय लगा सदियां बीत गईं। बाहर आकर शोयिंका ने कागज पर लिखकर जो वाक्य हमें दिए और जो आज भी अपने पास हैं अनुवाद की भाषा में इस तरह पढ़े जाएंगे। ‘मेरे लिए यह अनुभव नया न था तो भी घबरा देने वाला था। सौभाग्य से मेरे साथ भारत का कवि कैलाश वाजपेयी भी था। सौम्य सी उलझन भरा। लगा कि भारत की दैवी शक्तियां न केवल यह लिफ्ट, वरन उत्तरी कोरिया का लिफ्ट भी, जो समय के ताने-बाने में उलझा पड़ा है सुलझा लेंगी।
चौदह अगस्त को शीला होटल के सभागार में काव्य पाठ हुआ। सबसे पहले शोयिंका ने कविता पढ़ी फिर अमेरिका के राष्ट्रकवि रॉबर्ट पिंस्की ने काव्यपाठ किया। रॉबर्ट की रचना का शीर्षक था ‘स्टुपिड मेडीटेशन ऑन पीस।’ फिर अपनी बारी आई हमने ‘सच’ शीर्षक वाली कविता का पाठ किया। हमारे मंच से उतरने के बाद रॉबर्ट पिंस्की ने हमारे साथ हमारी टंकित रचना का पन्ना लेकर अपनी कविता हमें थमा दी। उसके नीचे रॉबर्ट ने लिखा था- ‘‘वार्म रिगार्ड्स एंड एडमिरेशन टु कैलाश-फैलो सर्चर -रॉबर्ट पिंस्की’’
वह कविता अभी भी अपने पास सुरक्षित है।