हममें से किसी को अपनी मृत्यु का अनुभव नहीं है। मृत्यु हमेशा दूसरे की होती है, किंतु इसी के साथ यह भी सच है कि जिसके साथ स्नेह था, जो आजीवन सुख-दुख में भागीदार रहा, जब उसकी मृत्यु होती है तब हमारे भीतर भी कुछ टूटता है, कोई कोना खाली हो जाता है। हम सब जिंदा रहते हुए भी, भावनात्मक तल पर कई बार, एक दूसरी तरह की मृत्यु भी मरते हैं।
नवंबर के अंतिम सप्ताह में हर वर्ष बहुत याद आते हैं कवि श्री हरिवंशराय बच्चन, जो एक साथ अग्रज, मित्र, अभिभावक, हितैषी सभी कुछ थे। हुआ यों कि जब हम लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. के विद्यार्थी थे उन्हीं दिनों अंबाला में होने वाले काव्य समारोह में भाग लेने का बुलावा आया।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे बच्चन जी को निकट से देखने का वह पहला सारस्वत क्षण था। आयु में सब प्रतिभागी कवियों की तुलना में छोटा होने के कारण, सबसे पहले हमारा नाम ही पुकारा गया। हमने डरते-डरते गीतात्मक रचना पढ़ी उसे खूब सराहा गया। प्रत्युष बेला में, जब समारोह समाप्त हुआ सभी कविगण उठने लगे तभी एक आवाज सुनाई पड़ी, 'कैलाश जी!' आवाज में एक दुलार भरा बड़प्पन था। हम सहमे-सहमे बच्चन जी के पास गए।
उन्होंने अधिकार भरे स्वर में कहा, ‘अपना दाहिना हाथ पास लाओ।' हमने हाथ आगे बढ़ाया। बच्चन जी ने यह कहते हुए, 'मैं तुम्हारी हथेली चूमूंगा', हथेली चूमकर कहा, ‘बहुत ऊंचे जाओगे'। इसके बाद दो-चार बातें हुईं और हमने बताया कि लखनऊ के नरेंद्रदेव छात्रावास में रहकर पीएचडी पूरी करने का संकल्प मन में है। बच्चन जी ने कहा, 'लखनऊ पहुंचकर लिखना।' तब से लेकर आजीवन बच्चन जी से संपर्क बना रहा।
कम से कम तब तक जब तक उनका बेटा अमिताभ उन्हें जिद करके मुंबई नहीं ले गया। सन् 1959 के अंत में मुंबई रेडियो में एक कवि गोष्ठी आयोजित हुई थी। वहां भी बच्चन जी के सभापतित्व में ही रचना पाठ करने का अवसर मिला था। हम यह पहले ही लिख चुके हैं कि कैसे हमारी झोली में टाइम्स ऑफ इंडिया की नौकरी आ गिरी। मुंबई से भागने के कारणों में पहला था कि वहां रहने वाली कोई भाषा अग्रवाल मन बना बैठी कि उसे हमसे ही विवाह करना है।
वह रोज टाइम्स के दफ्तर में बीच का मैदान पारकर आ धमकती। 'धर्मयुग' के संपादक भारती जी हमें अपने छोटे भाई की तरह स्नेह करते थे। भाषा अग्रवाल की इस आवाजाही से वह हमें लेकर बहुत चिंतित रहते थे। उन्होंने एक दिन हमें डांटते हुए कहा, ‘मुंबई की बरसात में तुम फंस सकते हो। इसलिए इस एक तरफा आसक्ति से बचो। यह मैत्री खतरनाक है।’
मुंबई से भागने का दूसरा कारण था राजकपूर का इसरार कि ‘मैं तुम्हें चार गुनी पगार देता हूं। टाइम्स की नौकरी छोड़ो’, तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण था टाइम्स की दस से पांच तक की नौकरी। ग्यारह महीने तक इस बेगार से जब हम बुरी तरह ऊब गए तब हारकर हमने बच्चन जी को दिल्ली में फोन किया। उन्होंने जो सलाह दी वह शायद हमें भा गई और हम वहां की नौकरी से इस्तीफा देकर दिल्ली आ गए और अरसे तक बेकार रहे।
मोतीबाग में कपिला जी ने एक स्वतंत्र कमरे की व्यवस्था कर दी जबकि तेजी भाभी (अमिताभ की मां) ने कह दिया कि जब भी मन करे आ जाया करो परिणाम यह कि हमारी कई शामें और रविवार '13, विलिंग्डन क्रेसेट' में ही बीतते। वहां हमें ज्यादा खुलापन और गहरी आत्मीयता मिलती। कैंब्रिज विश्वविद्यालय से, विलियम बटलर येट्स जैसे उम्दा कवि पर पीएचडी करने के बावजूद बच्चन जी बाबा तुलसीदास को विश्व का अन्यतम कवि मानते थे। शाम को चाय के बाद पिछले बरामदे में बैठकर वे सद्गृहस्थ के लक्षणों पर चर्चा करते।
जहां तक कवित्व का प्रश्न है बच्चन जी कहते, 'इसी के साथ यह मत भूलो कैलाश! जिंदगी के व्यापक फलक पर हर सम-विषम परिस्थिति में हम सबका मार्गनिर्देशन करने की सामर्थ्य सिर्फ तुलसी में है। तुलसी ने कविता नहीं, मंत्र लिखे हैं। हम शांत हो या विक्षिप्त, कुरूप हों या सुंदर, निर्धन हों या धन्ना सेठ, स्वजन मिले हों या बिछुड़ गए हों। तुलसी की कविता हमेश समरस रहने की राह सुझाती है। ऊपरवाले की मर्जी के बगैर स्वार्थ तो स्वार्थ परमार्थ तक नहीं सधता।' फिर इसके बाद बच्चन जी कोई दोहा जड़ देते।
कालांतर में हमारी नियुक्ति दिल्ली वि.वि के शिवाजी कॉलेज में हो गई। यह शायद सन् 1962 की बात है। दिल्ली वि.वि. के कला संकाय में अज्ञेय जी की उपस्थिति में हमें भी काव्यपाठ करने का अवसर मिला। वहां श्रोताओं में अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष डॉ. सरूपसिंह भी थे। अगले दिन डॉ. सरूपसिंह ने अपने कक्ष में बुलाकर हमसे कहा, ‘मैंने अपनी छात्रा रूपा की नियुक्ति तुम्हारे कॉलेज में की है। तुम्हारा कॉलेज दूर और सुनसान जगह पर है। रूपा बड़ी सीधी सरल है उसका ख्याल रखना।’
इस तरह रूपा से हमारा परिचय हुआ जो कालांतर में प्रगाढ़ मैत्री में बदल गया। हम दोनों कई बार बच्चन जी के यहां भी जाते। वर्षों बाद तेजी भाभी ने डांटते हुए हमसे कहा, ‘व्हाई डोंट यू कमिट योर सेल्फ’। बच्चन जी बोले तेजी ठीक तो कह रही है, ‘जुए के नीचे गर्दन डाल’ इसी के साथ एक सप्ताह बाद बच्चन जी अभिभावक बने और अजित कुमार और कीर्ती की उपस्थिति में हम दोनों सद्गृहस्थ बन गए।