मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के कनासिया गांव में, धन्य तेरी करतार कला का, पार नहीं कोई पाता है, भजन की टेर गूंज रही है। दर्शकों में भजन सुनते-सुनते मस्ती छा गई, वे झूमने और नाचने लगे। यह मीठी खनक आवाज शिवानी गांगोलिया की थी, जो कबीर भजन गा रही थीं।
शिवानी गांगोलिया उज्जैन की रहने वाली हैं, उनका पूरा परिवार ही संगीत से जुड़ा है। उन्होंने हाल में कॉलेज की शिक्षा ग्रहण की है। लेकिन यहां शिवानी अकेली नहीं है, जो कबीर भजन गाती हैं। और भी कई महिलाएं हैं। मालवा में कबीरधारा बह रही है। कई युवा इससे जुड़े हैं और प्रहलाद सिंह टिपानिया जैसे बहुत से लोक गायक कबीर को गाने वाले भी हैं।
यहां 90 के दशक की शुरुआत से कबीर भजन कार्यक्रम नियमित होते रहते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में काम करनेवाली संस्था के कार्यालय में मंडलियां आती थीं और भजन गाती थीं। कबीर के विचारों पर चर्चा होती थी। तब से यह सिलसिला चल रहा है। हर माह की दो तारीख को यह कार्यक्रम होता है।
एकलव्य संस्था ने करीब तीन दशक पहले कबीर मंडलियों से संपर्क व संवाद स्थापित किया था। कबीर के सामाजिक विचारों को केंद्र में रखकर इस तरह के नियमित कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया था। हालांकि कबीर को मालवा में मौखिक वाचिक परंपरा में सालों से गाया जाता रहा है। यह श्रुति (सुनना) और स्मृति (याद करना) कबीर परंपरा शताब्दियों से चल रही है। मौखिक परंपरा, श्रुति और स्मृति के आधार पर चलती है, इसमें गीतों में जोड़-घट होती रहती है।
कबीर 15 वीं शताब्दी के क्रांतिकारी कवि, समाज सुधारक थे। वे ऐसे कवि व संत हैं, जिन्होंने आर्थिक अभाव में रहते हुए धार्मिक कर्मकांड,जातिवाद और पाखंड का विरोध किया था। जुलाहे के रूप में अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करते रहे। उन्होंने एक निडर सामाजिक आलोचक की भूमिका को भक्ति और आध्यात्मिकता से जोड़ा था।
कबीर के भजनों की खूबी यह है कि 600 साल बाद भी वह जनसामान्य में कई रूपों में मौजूद हैं। कबीर उनके भजन व उन्हें गाने वालों में हैं। मैं इसी मालवा के कबीर को जानने- समझने की कोशिश करने आया हूं। मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में मालवा अंचल है। मालवा की एक पुरानी कहावत है- मालव धरती गहन गंभीर, डग डग रोटी पग पग नीर। यह कहावत यहां की उपजाऊ भूमि, जिसमें अच्छी उपज होती है, यहां की समृद्धता को दर्शाती है और पानी की बहुलता को भी।
नारायण सिंह देल्म्या बरण्डवा (उज्जैन जिला) गांव के रहने वाले हैं। पहले वह खुद कबीर की चौका आरती, पूजा पाठ व महंतों की सेवा करते थे, लेकिन जब से उन्हें कबीर वाणी का सही अर्थ समझ आया है, तब से उन्होंने यह सब छोड़ दिया। इसी प्रकार, कालूराम बामनिया जो पहले एक महंत की सेवा करते थे, सत्संग से जुड़े थे, पर उन्होंने भी वह सब छोड़कर कबीर की समाज सुधार वाली परंपरा को आगे बढ़ाया।
गीता पराग, बीसलखेड़ी गांव की रहनेवाली हैं। वह कबीर की ओर उनकी सास लीलाबाई पराग की वजह से मुड़ी। लीलाबाई, कबीर भजन गाती थीं। गीता पराग ने उनसे कबीर भजन सुने, फिर कैसेट व सीडी से भजन सुनने लगीं। वह कबीर भजन गाने लगीं, उन्हें विधिवत गायन की सीख नारायण देल्म्या और कालूराम बामनिया ने दी। इसके लिए हर हफ्ते घरों में जाकर तम्बूरा और मजीरा के साथ भजनों का प्रशिक्षण दिया जाता था।
तम्बूरा, हारमोनियम, वायलिन, ढोलक, नगाड़ी, करतार और मजीरे ने इसे नया रूप दिया है। सुर-तान व कबीर संगत को मजेदार बनाया है। बाजार में कई सीडी आ गई हैं। जगह-जगह कार्यक्रम होते हैं।
रामनारायण स्याग बताते हैं कि हमने कबीर के साथ भीमराव आंबेडकर को भी जोड़ा। आंबेडकर विचार मंच का भी गठन किया था। इसके तहत् भी कई सालों तक बैठकों का सिलसिला चला। आंबेडकर के विचारों व संविधान में लोगों के अधिकारों पर भी बातें की।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि छह सौ साल बाद भी कबीर धारा बह रही है। वह आज मालवा में कबीर भजन मंडलियों में जीवंत हैं, जो नियमित तौर पर उन्हें गाते हैं, सुनते हैं और गुनते हैं, उसमें कुछ जोड़ते और आगे बढ़ाते हैं। कबीर से सीख लेते हैं। खुद बदलते हैं और दूसरों को यही संदेश देते हैं।