फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कॉलेजियम पर न्यायमूर्ति का सवाल

Wed, 28 Sep 2016 07:21 PM IST
सुधांशु रंजन
विज्ञापन
सुधांशु रंजन
विज्ञापन
उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर जो टकराव की स्थिति उच्चतम न्यायालय तथा केंद्र सरकार के बीच उत्पन्न हो गई है, वैसा टकराव हाल के दशकों में देखने को नहीं मिला है। प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं किए जाने को लेकर सरकार पर प्रहार करने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। दूसरी ओर केंद्र सरकार भी उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार पूरी तरह से न्यायपालिका के हाथों छोड़ना नहीं चाहती। फोर्थ जजेज मामले (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रेकार्ड बनाम संघ) में गत वर्ष अक्टूबर में सर्वोच्च अदालत ने संविधान के 99वें संशोधन को निरस्त कर दिया, जिसके द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया गया था। परंतु अदालत ने इतना स्वीकार किया कॉलेजियम की कार्यपद्धति में कई कमियां हैं और सरकार से प्रक्रिया की विवरणिका बनाने को कहा। बात इसी पर अटक गई, क्योंकि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर किसी भी नियुक्ति को वीटो करने का अधिकार अपने पास रखना चाहती है, जो शीर्ष न्यायालय को मंजूर नहीं है।
विज्ञापन


उच्चतम न्यायालय ने व्याख्या के जरिये कॉलेजियम व्यवस्था थोपी है, जिसका संविधान में कोई जिक्र नहीं है। फर्स्ट जजेज मामले (एसपी गुप्ता बनाम संघ) में 1981 में अदालत ने कहा कि चूंकि कार्यपालिका जनता के प्रति जवाबदेह है और न्यायपालिका की ऐसी कोई जवाबदेही नहीं है, इसलिए नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के पास होना चाहिए। परंतु 1993 में सेकंड जजेज मामले में इस निर्णय को पलटते हुए उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ ने कहा कि संविधान का उद्देश्य योग्य एवं ईमानदार न्यायाधीशों की नियुक्ति करना है। अदालत के अनुसार, न्यायाधीश ही किसी वकील की योग्यता एवं निष्ठा की परख कर सकता है। विधायिका के पास वकीलों की योग्यता परखने का कोई जरिया नहीं है और अनुच्छेद 121 एवं 211 के तहत न्यायाधीशों के चरित्र पर संसद या विधानमंडल में कोई बहस नहीं हो सकती है। इसी तर्क पर न्यायालय ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका से छीनकर अपने हाथों में ले लिया।

कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। परंतु इस बार आवाज अंदर से आई है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एवं कॉलेजियम के सदस्य न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर ने आरोप लगाया है कि कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता नहीं है और वह भविष्य में कॉलेजियम की बैठकों में भाग नहीं लेंगे। सवाल यह नहीं है कि नियुक्ति कौन करता है या उसकी प्रक्रिया क्या है। सवाल यह है कि क्या नियुक्ति के बाद उसे पूर्ण सुरक्षा मिलती है। यदि हां, तो नियुक्ति का अधिकार किसके पास है, यह अहम नहीं है। इसलिए न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने फोर्थ जजेज मामले में संविधान पीठ के अन्य चार न्यायाधीशों के साथ असहमति जताते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को सही माना। उन्होंने मेरी पुस्तक जस्टिस, जूडोक्रेसी ऐंड डेमोक्रेसी इन इंडिया से एक अंश उद्धृत किया, जिसमें मैंने लिखा है कि राजनीति में सक्रिय कई अधिवक्ताओं को जज बनया गया। केएस हेगड़े तथा टकेचंद तो राज्यसभा सांसद थे, जब उन्हें उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। परंतु जस्टिस हेगड़े इतने निष्पक्ष रहे कि उन्हें उन्हीं की कांग्रेस सरकार ने भारत का प्रधान न्यायाधीश नहीं बनने दिया। न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर पहले केरल सरकार में मंत्री थे, और उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाए जाने का काफी विरोध था, पर वह एक आदर्श जज साबित हुए।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें