आजकल लोगों की बातों में इतनी मिठास है कि ज्यादा बातचीत करें, तो डायबटीज होने का खतरा पैदा हो जाता है। वैसे बातचीत के लिए अब लोग बचे भी कितने हैं? परिवार छोटे होते जा रहे हैं और रिश्ते-नाते सिमटते जा रहे हैं। सो खाली स्थान भरने के लिए सोशल मीडिया का जाल और अनचाही कॉल्स का जंजाल है। आजकल अनचाही कॉल्स पर भी लोग-बाग पांच-सात मिनट गप्पें लड़ा लेते हैं। रहा सोशल मीडिया का, तो अनजाने कमेंट्स, लाइक्स और फॉलोवर्स की गिनती यहां स्टेट्स सिंबल बन गई है। एक शेर रीडिफाइन कर रहा हूं-उम्रे दराज मांगकर लाए थे चार दिन, दो स्टेटस पोस्ट करने में कट गए दो कमेंट के इंतजार में।
आज जिसे देखिए, वह आदर्शवाद पर टिका दिखाई देता है-समाज में नैतिकता होनी चाहिए, करप्शन कम होना चाहिए, ट्रैफिक रूल्स नहीं तोड़ने चाहिए, बड़ों का आदर करना चाहिए, आदि-आदि। ये सारी बातें हमें छोड़कर बाकी सब को करनी चाहिए। जहां कुछ करने की बात आती है, तो हमारे पास अपनी जिंदगी में की हुई ढेर सारी अच्छाइयों के रिकॉर्ड भरे पड़े हैं। हम किस दिन कौन-सा भला काम कर चुके हैं, यह रिकॉर्ड सहित बताना नहीं भूलते।
आपसे कहां तक बताएं मिठास भरी बातों का सिलसिला। कहीं शॉपिंग करने जाइए, तो दो-चार लोग फ्री गिफ्ट कांटेस्ट का फॉर्म लिए घूमते मिल जाएंगे, जिसमें वे पांच रुपये का चम्मच पकड़ा कर आपकी दी हुई इनफॉरमेशन से आपकी खरीदारी की औकात टटोलते हैं। उनका बस चले, तो अपने सर्वे में आपका बैंक अकाउंट नंबर और एटीएम पिन जैसी गोपनीय सूचना तक पूछ लें। मीठी-मीठी बातें सुनते हुए मुझे बचपन में सुना गाना याद आता है- मीठी-मीठी बातों से बचना जरा, दुनिया के लोगों में है जादू भरा। इधर आप मिठास में उलझे, उधर आपकी जेब कटी। मैं एक शेर से अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा-मुझे अच्छे लोग बहुत मिले मैं उनके बोझ से दब गया, कभी कभी जो मिलो मुझे तो खराब बन के मिला करो।