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जोशीमठ त्रासदी: जाग सके तो जाग, जलविद्युत परियोजनाओंपर फिर उठे सवाल

चंडी प्रसाद भट्ट
Updated Mon, 16 Jan 2023 05:26 AM IST

सार

जोशीमठ जैसी वर्तमान त्रासदियों को बढ़ाने में जलविद्युत परियोजनाओं का सर्वाधिक योगदान रहा है। जलवायु परिवर्तन भी इसका एक कारण हो सकता है।
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जोशीमठ में भू धंसाव देखती टीम। - फोटो : अमर उजाला


वर्तमान में जोशीमठ में आई आपदा को सिर्फ आंशिक रूप से प्राकृतिक कहा जा सकता है। यह त्रासदी दरअसल हमारे द्वारा बनाई और विकसित की गई है। इसमें खनन, गलत तरह से सड़कों का निर्माण, डाइनामाइट का अत्यधिक प्रयोग, जलविद्युत परियोजनाओं का बिना गहरी पड़ताल के बनाया जाना, नदियों के प्रवाह क्षेत्र में घुसपैठ आदि का हाथ रहा है। जलवायु परिवर्तन भी इसका एक कारण हो सकता है, पर वह संपूर्ण कारण नहीं है।


वैज्ञानिक और समाजिक संस्थाएं लगातार सुझाव और चेतावनी देती रही हैं। पर्यावरण मंत्रालय की कमेटियां, ‘कैग,’ हाइकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट ने अनेक बार हस्तक्षेप किया है। मीडिया बार-बार गड़बड़ियों को उजागर करता रहा है, पर सरकारें सदा लापरवाही से इसे देखती रही हैं। वर्तमान त्रासदियों को बढ़ाने में जलविद्युत परियोजनाओं का सर्वाधिक योगदान रहा है। समाज का बड़ा हिस्सा और वैज्ञानिक इनके विरोध में तर्क देते रहे हैं। स्वयं सरकार ने इसे लेकर अनेक सकारात्मक निर्णय लिए हैं। मसलन, 1982 में ‘चिपको आंदोलन’ के वैज्ञानिक तर्कों को मानते हुए ‘विष्णु प्रयाग परियोजना’ का निर्माण रोकने का निर्णय लिया गया या कुछ ही समय पहले भागीरथी के ऊपरी क्षेत्रों की तीन जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण बंद करा दिया गया था। परंतु जलविद्युत लॉबी देश की राजनीति को प्रभावित करती रही है। नतीजे में इन परियोजनाओं में कभी भी पर्यावरण की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।


विनाश और बर्बादी के लिए जलविद्युत परियोजनाओं की जिम्मेदारी तय होनी चहिए और उन्हें इसका हर्जाना भी देना चहिए। मामला चाहे ‘पूर्वी धौली,’ ‘विष्णु गंगा’ या ‘मनेरी भाली परियोजना’ हो या ‘श्रीनगर,’ ‘अस्सी गंगा,’ ‘मंदाकिनी’ या ‘गौरी नदी,’ ‘ऋषि गंगा’ की परियोजना हो, हर घाटी में आपदा को त्रासद रूप इन परियोजनाओं ने ही दिया है। उत्तराखंड में खेती की जमीन अत्यंत कम है, खासकर पर्वतीय क्षेत्र (88 प्रतिशत) में यह और भी कम है। अतः जमीन की हर तरह की हिफाजत पर्वतवासियों के अस्तित्व से जुड़ी है। इसी तरह जंगलों का विस्तार ग्रामीणों के पारंपरिक वनाधिकारों का सम्मान करते हुए किया जाना चहिए। चौड़ी पत्ती के जंगलों का विस्तार और चीड़ पर नियंत्रण भी जरूरी है। वन-पंचायतों की स्वायत्तता बरकरार रखी जानी चहिए।


पानी के निजीकरण को रोकना जरूरी होगा। समुदायों को पानी के प्रबंधन का अधिकार देकर बड़ी जलविद्युत कंपनियों से नदियों को बचाना चाहिए। भूस्खलन नदियों को रोकता व उथला करता है। इससे नदियों का व्यवहार बदल जाता है और वे विध्वंसक रूप ले लेती हैं। अतः वैकल्पिक ऊर्जा पर व्यापक काम होने चहिए। कोई भी कमेटी बने, वह सिर्फ सरकारी लोगों की ही न हो। ऐसी कमेटियों से मौलिक विचार कभी नहीं निकलते। अतः कम-से-कम आपदा के बाद तो अनुभवी लोगों का परामर्श लेने में झिझक नहीं दिखाई जानी चहिए। ‘कैग,’ विभिन्न न्यायालयों या जांच-कमेटियों ने जिन सरकारी विभागों या संस्थानों पर उंगली उठाई है, उन्हें दोबारा जिम्मेदारी देने में सावधानी बरतनी चहिए। पर्यावरण पर परियोजनाओं के विभिन्न प्रभावों के सतही अध्ययन की ओर सुप्रीम कोर्ट ने संकेत किया है। यह काम विश्वसनीय संस्थाओं द्वारा ही कराया जाना चहिए।


हेमवतीनंदन बहुगुणा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिखे एक पत्र में कहा था, ‘सही मायने में वही परियोजना सफल मानी जाएगी, जो विनाश-रहित होगी और जिसके क्रियान्वयन से क्षेत्र की जनता को, प्राकृतिक संपदा को और क्षेत्र की रमणीयता को किसी प्रकार की क्षति नहीं होगी।’(सप्रेस)

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