यह सच है कि जिन्ना ने संयुक्त भारत की एकता के लिए कैबिनेट मिशन प्लान को स्वीकार किया था, लेकिन उस प्लान में एक कमजोर, सीमित अधिकार वाले केंद्र की परिकल्पना थी। जिन्ना नेहरू के बयानों के बाद संयुक्त भारत योजना से पलट गए। यदि उन्होंने संयुक्त भारत स्वीकार कर लिया होता, तो भी 1947 के कुछ ही वर्षों बाद सांप्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन रोक सकना संभव न होता। पाकिस्तान बतौर एक मजहबी सोच जुनून की हद के पार जा चुका था।
जिन्ना ने यह बात मुखर होकर कही कि हिंदू और मुसलमान साथ नहीं रह सकते हैं। यह वही जिन्ना थे, जिन्होंने 1919-20 में गांधी जी का राजनीति में मजहब व मुल्लाओं को लाने का विरोध किया था। पर बाद में वह राष्ट्रवादी सेक्यूलर चोला उतार चुके थे। खिलाफत आंदोलन, हिंदू-मुस्लिम दंगों के लंबे सिलसिले और पृथक मजहबी निर्वाचन व्यवस्था के राजनीतिक सिद्धांत ने जो अलगाव पैदा किया, उससे पाकिस्तान के विचार के उभरने की राह बनी। 1940 के बाद आजादी का दिवस आने तक विश्व का पहला इस्लामी देश पाकिस्तान अस्तित्व में आ भी गया।
जिन्ना पाकिस्तान के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री होने के बजाय ब्रिटिश वायसराय की परंपरा में गवर्नर जनरल बने। यह जनतंत्र का रास्ता नहीं था। यहीं से बिखराव की भूमिका भी लिखी जाने लगी। सैन्य शासन के आने से पहले वहां तेजी से प्रधानमंत्री बदलते रहे। उस देश के पास एकमात्र मुद्दा कश्मीर था। भाषा उर्दू थी, जिसे राष्ट्रभाषा बनाने की जिद ने बांग्लादेश को अलग कर पाकिस्तान के दो टुकड़े करा दिए थे। बांग्लादेश के बनते ही पाकिस्तान का मूल आधार द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत भी ढह गया। कमजोर नींव पर खड़ा यह देश बहुत पहले बिखर जाता, पर भारत के सेक्यूलर नेतृत्व ने पाकिस्तान के प्रति बड़ी ममता का प्रदर्शन किया।
वर्ष 1971 की पराजय के बाद एक अपूर्ण, उद्देश्यविहीन पाकिस्तान अब सिर्फ मुल्ला और मिलिटरी के भरोसे हो गया था। कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण के बावजूद हमारे सेक्यूलर नेताओं ने युद्ध की घोषणा न करके संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाई। अनुच्छेद 370 के जरिये अलगाव के बीज और बो दिए गए। हमारे नेताओं ने यह जानते हुए भी, कि पाकिस्तान के परमाणु बमों के एकमात्र लक्ष्य हम ही हैं, उसमें बाधा डालने की कोशिश नहीं की।
पाकिस्तान का कोई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषायी या आर्थिक आधार नहीं था। अब इस्लाम और कश्मीर जिहाद ही उसका एकमात्र लक्ष्य रह गया था। अमेरिकी डॉलरों पर जिंदगी बसर करने वाले इस देश के पास अपनी आर्थिक प्रगति के लिए समय नहीं था। कर्ज ही इसका एकमात्र सहारा बना, जो अब लगभग 210 खरब डॉलर के बराबर है। यह कर्ज पाकिस्तान की कुल वार्षिक जीडीपी के साठ गुने के बराबर है, जिसका भुगतान असंभव है।
पाकिस्तान के सीमा प्रांत खैबर पख्तूनख्वा का डूरंड रेखा से लगा लगभग एक तिहाई क्षेत्र तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के प्रभाव में आ चुका है। बलोच विद्रोहियों ने तालिबान पाकिस्तान से हाथ मिला लिया है। सेना के विरुद्ध विद्रोह के स्वर मुखर हैं। गृहयुद्ध की भूमिका लिखी जा रही है और नेतृत्व का भीषण अभाव है। बिखराव के इस दौर में पाकिस्तान के लिए कोई रोने वाला है भी या नहीं, यह नहीं दिख रहा।