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क्रांति की तलछट

Mon, 07 Jul 2014 03:42 AM IST
ओम गुप्ता/संपादक एवं मीडिया विश्लेषक
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'तलछट' (`द लोलैंड’), दो भाइयों की कहानी है। इस विषय पर अनगिनत कथाएं रची गई हैं। मसलन सुप्रसिद्ध ब्रिटिश उपन्यासकार जेफरी आर्चर की रचना `केन एंड एबल' ने हिंदी सिनेमा में `राम और श्याम' तथा `सीता और गीता' जैसी कालजयी फिल्में दीं।
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झुंपा लाहिड़ी के साथ 'इंटरप्रेटर ऑफ मैलेडीज' और `नेमसेक' जैसे बहुचर्चित उपन्यासों का नाम जुड़ा है। उसी श्रृंखला की नवीनतम कड़ी 2013 में रैंडम हाउस ने छापी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस कृति की अनुशंसा में उन्हें असाधारण प्रतिभा का धनी और शिल्प का चितेरा कहा। `तलछट' एक त्रासदी है। इसमें दो भाई बंधे हैं- सुभाष और उदयन। पृष्ठभूमि पिछली शताब्दी के सातवें दशक में उपजे नक्सलवाद की है। उस असफल आंदोलन की मिसाल आज भी दी जाती है। केवल 15 महीनों के अंतर पर पैदा हुए सुभाष और उदयन एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे थे। कोलकाता के मशहूर टालीगंज में पले-बढ़े। स्वभाव से दो ध्रुव। उनका भविष्य झंझावातों से भरा था। उदयन करतबी और चंचल। जवानी में ही उसे नक्सलवाद ने अपनी गोद में खींच लिया और वह अपने क्रांतिकारी विश्वासों के प्रति समर्पित हो गया। इसके विपरीत सुभाष एक आज्ञाकारी पुत्र और अपने भाई उदयन की राजनीति का प्रतिपक्षी। उसका रुझान वैज्ञानिक शोध की ओर था। यह ललक उसे सात समंदर पार अमेरिका ले गई।

अमेरिका में अपनी दुनिया में मस्त सुभाष को भाई की नक्सली गतिविधियों ने विचलित कर दिया। जब उसे यह खबर मिली कि उदयन को बंगाल पुलिस ने दिन-दहाड़े उसके घर के बाहर और घर वालों की आंखों के सामने गोलियों से भून दिया है, तो वह भागा चला आया। वहां वक्त से पहले मां-बाप बुढ़ा गए थे। सूनी आंखें, गुमसुम चेहरे। उदयन की पत्नी गौरी के पेट में बच्चा। मां-बाप सुभाष के अमेरिका जाने से नाखुश थे। उसके लौटने की भी उन्हें कोई खुशी नहीं थी। उनका जीवन से मोहभंग हो चुका था। सुभाष को समझ नहीं आ रहा था कि कहां से शुरू करे।
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बहू गौरी को सुभाष की मां अभिशप्त मानती थी। सास को बहू की तरफ देखना भी गवारा नहीं था। गौरी ने इसे अपनी नियति मान लिया था। उसके मन में अपने सास-ससुर के प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी। वह घर का चौका-बासन सब संभालती थी। उसे विश्वास था कि बेटी पैदा होगी। वही हुआ। बेटी के जन्म से पहले ही उसका नाम सोच लिया था-बेला।

उदयन 26 बरस की उम्र में चला गया था। बचपन में उसे इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्जों से बड़ा लगाव था। वह उन पर सफल प्रयोग करता रहता था। मसलन, भाई से तार जोड़कर बात करना, बिजली पैदा करना वगैरह। उसने इतिहास में पढ़ा था कि वैज्ञानिक मारकोनी ने 26 साल की उम्र में महत्वपूर्ण खोज की थी। जब उसका ध्यान नक्सलवाद की ओर मुड़ा, तो उसे याद आया कि लैटिन अमेरिकी क्रांतिकारी चेग्वेरा 26 वर्ष की आयु में अपने विचारों के लिए भून दिया गया था। क्या इसे संयोग कहा जाएगा कि वह भी 26वें वर्ष में पुलिस का निशाना बना।

उदयन के जाने के बाद सुभाष ने कोलकाता लौटकर गौरी को संभाला। उनके रिश्ते गहरे और गाढ़े होते गए। पहले प्यार में तब्दील हुए, फिर विवाह में। पहले से ही आतंकित बूढ़े मां-बाप को यह अनहोनी कतई नहीं भायी। वे यकीन कर बैठे थे कि गौरी अभिशप्त है। पहले उदयन को खा गई और अब सुभाष के पीछे पड़ी है।

सुभाष और गौरी ने इसे वस्तुस्थिति मानकर स्वीकार कर लिया। सुभाष ने घर लौटकर अपनी पढ़ाई जारी रखी और गौरी को पढ़ते रहने के लिए भी प्रेरित किया। वक्त आने पर बेला का जन्म हुआ। गौरी की व्यस्तता बढ़ गई। सुभाष ने उसे अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर लिया। बेला भी उसे अपना पिता और गौरी को मां मानकर बड़ी होती गई। उन दिनों नक्सलवादी आंदोलन अपने उफान पर था। लूटपाट, गोलीबारी, पुलिस दमन, सब एक-साथ समानांतर चल रहा था। सुभाष और गौरी ने उदयन की विरासत को संजोकर रखा था। गौरी एक क्षण के लिए भी नहीं भूली थी कि उदयन क्यों शहीद हुआ था। उनके मन में उदयन के विचारों को लेकर एक रूमानियत थी, लेकिन यह आंदोलन असफल था। जिंदगी गोल-गोल घूम रही थी। पहले गौरी फिर सुभाष केवल उदयन की याद को श्रद्धाजंलि देने के लिए नक्सलवाद की ओर आकर्षित हुए।

वक्त आने पर बेला का विवाह हुआ। बेटी भी आई- मेघना। बेला अपने जीवन को लेकर भ्रमित थी। वह मेघना के सुखद भविष्य की कामना करती थी। वह सुभाष को अपना पिता मानती थी। एक दिन सुभाष ने ही रहस्य खोला कि बेला असल में उदयन की बेटी है।
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