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चंद्रशेखर की पहल पर ट्रस्ट बना जेपी का घर: दशकों पहले हुआ कायाकल्प, अब कुप्रचार का विरोध हमारा दायित्व

Tue, 03 Nov 2026 09:10 AM IST
ज्योति भास्कर हरिवंश (राज्यसभा के उपसभापति)

सार

जेपी के न रहने के बाद चंद्रशेखर ने उनके इस घर (जहां जन्म हुआ) को ट्रस्ट बनवाया। तब गांव आने-जाने का रास्ता नहीं था। न सड़क थी। एक बांध 50 के दशक में बना था। पर पर नदी के कटाव कटाव ने उसे जगह-जगह से काट दिया। गांव के बुजुर्ग बताते थे, थे, 1948 की बाढ़ भयावह थी। तब अपने घर से मोटर बोट (प्रशासन द्वारा उपलब्ध करायी गयी) से जयप्रकाश जी ने इन सारे टोलों की यात्रा की। घर-घर, गांव-गांव जा कर हालात देखे।
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जेपी की स्मृतियों से जुड़ा विशेष आलेख - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स
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विस्तार
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जेपी प्रायः गांव आते थे। उनका और उनकी पत्नी प्रभावती जी का गांव से खास लगाव था। वह गांव वालों से घुल-मिलकर भोजपुरी में बात करते। गांव के लोगों ने उनसे दो बातें कहीं। पहली, आप इतने बड़े आदमी हैं। हमारा गांव दियारा है। कहीं से आने जाने का रास्ता नहीं है। किसी से आप कह देंगे, तो कुछ आने-जाने का बंदोबस्त हो जायेगा। एक बुजुर्ग ने उनसे कहा, यह एक ही गांव, दो राज्यों के तीन जिलों में फैला है। उप्र के बलिया, जिसका मुख्यालय गांव से 54 किमी दूर है। खेत की मालगुजारी या तहसील या रेवन्यू संबंधी काम कराने के लिए हमें दोनों राज्यों के तीनों जिलों में जाना पड़ता है। सबसे नजदीक छपरा (बिहार), 19 किमी है। फिर आरा (बिहार), 27 किमी है। किसी एक जिले या राज्य में इस गांव को रखवा दें।

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जेपी ने कहा, आप सब सोचिए। अगर लोगों से मैं कहूं कि मेरे गांव में आने-जाने की सुविधा कर दीजिए, तो लोग क्या कहेंगे? देश के सभी छह लाख गांव मेरे हैं। उस अपढ़ गांव के लोगों ने कहा, हां जेपी, आप ठीक कह रहे हैं। जेपी का जवाब था कि देश तो अपना ही है। चाहे उत्तर प्रदेश में रहे या बिहार में। विकेंद्रीकरण विकास में उनका यकीन था। 1974 नवंबर-दिसंबर महीना था। बिहार आंदोलन उफान पर था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बुलावे पर वार्ता के लिए जेपी दिल्ली गये। बिहार विधानसभा को भंग करने का मुद्दा था। बातचीत विफल हो गयी। वहां से लौटकर गांव आये। गांव में विशाल सभा हुई। बहुत दूर-दूर से लोग आये। एक-एक बातें जेपी ने बतायी कि बातचीत विफल क्यों व कैसे हुई ?

चंद्रशेखर के लिए जेपी, संत परंपरा के राजनीतिज्ञ थे। जेपी के लिए व देश के सामाजिक- आर्थिक सवालों को उठाने के लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। आपातकाल में। वह अकेले थे, जो इंदिरा जी की लोकप्रियता के शिखर पर उन्हें शिकस्त दे कर कांग्रेस कार्यसमिति में चुने गये थे (शिमला में)।
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सिताबदियारा, जहां लोग दुनिया से कटे लगभग आदिम दौर में ही रहते थे, वहां विकास के लिए प्रयास शुरू हुए। जन पहल से। चंद्रशेखर ने सबसे पहले बकुल्हा-जयप्रकाश नगर बांध को ठीक करवाना शुरू किया। साथ ही जेपी के परिवार के लोगों ने, जेपी का घर दिया, जेपी ट्रस्ट बनाने के लिए। इस गांव में आवागमन या संपर्क मार्ग हो जाये, इसके लिए भी चंद्रशेखर प्रयासरत हुए। 1984-85 की बात है। 11 अक्टूबर को जेपी जयंती के लिए काफी बड़े नेता आमंत्रित हुए। जेपी ट्रस्ट पर। गांव में।

मैं कोलकाता रहता था। सपरिवार आया। पटना से जिस एंबेसडर कार से हम गांव चले, उसमें असम के पूर्व मुख्यमंत्री गोलाप बोरबोरा, विक्रम कुंवर विधायक, फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन व हमारा परिवार था। कच्ची सड़क थी। बरसात हो गयी थी। गाड़ी लगातार फिसल रही थी। पता चला, दो दिनों पहले ट्रस्ट निर्माण के लिए एक ट्रक पत्थर लेकर जा रहा था, फिसल गया। मौतें भी हुईं। पटना से शाम पांच बजे हम चले थे। रात तीन बजे, बांध पर गाड़ी खड़ी करनी पड़ी। जेपी के घर से दो-तीन किलोमीटर पहले। ड्राइवर ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। रात तीन बजे, कीचड़-कादो पार करते हुए हम सब जेपी घर, गांव पहुंचे। यह स्थिति थी, आवागमन की।

ऐसे हुआ कायाकल्प

जेपी के न रहने के बाद ही चंद्रशेखर ने ट्रस्ट बनवाने की पहल की। कर्णाटक में रामकृष्ण हेगड़े की सरकार थी। सबसे पहले उन्होंने इस ट्रस्ट को बनवाने में मदद की। 11 अक्टूबर 1985 को कर्णाटक के मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े इस गांव आये। हेगड़े जी ने कर्णाटक सरकार की ओर से 25 लाख रुपये दिए। साथ ही कहा- 'यह गांव अगर कर्णाटक में होता, तो हमारी सरकार दुनिया को दिखा देती कि जेपी का गांव कैसा हो सकता है ? यह शर्म की बात है कि यहां पहुंचने के लिए एक सड़क भी नहीं है'। 

फिर चंद्रशेखर के निजी प्रयास व जन सहयोग से यह ट्रस्ट खड़ा हुआ। जेपी की जीवन से जुड़ी एक-एक तस्वीर ढूंढ़ कर लायी गयी। देश भर से। पटना के एक छायाकार कृष्ण मुरारी किशन ने काफी तस्वीरें दीं। जेपी के घर, मंदिर, पुरानी चीजों को इसी तरह बनाये रखते हुए, उसका कायाकल्प हुआ। ट्रस्ट के निर्माण के लिए काफी पत्थर, ट्रकों से वीरेंद्र जी ने मिरजापुर से यहां भिजवाया था। जेपी की जन्मस्थली (जिसे चंद्रशेखर ने ट्रस्ट बनवाया) विभिन्न रचनात्मक कामों की जगह बनने लगी। चंद्रशेखर के प्रयास से। बच्चों का स्कूल टाटा के सहयोग से बना। लड़कियों का कॉलेज। जेपी की जन्मशती (वर्ष 2002-2003) भव्य तरीके से मनायी गयी।

कुप्रचार का विरोध हमारा दायित्व

चंद्रशेखर गंभीर रूप से बीमार हुए। पता चला कि ट्रस्ट में कुछ फेरबदल की चर्चा है। रामबहादुर राय के साथ, वीरेंद्र जी व हम, अस्वस्थ चंद्रशेखर से मिलने भोड़सी आश्रम गये। वह अत्यंत बीमार थे। बातें हुई। पर कुछ दिनों बाद पता चला कि उनके परिवार के एक सदस्य नये सचिव हो गये हैं। याद रखें, चंद्रशेखर ने जीते जी, दर्जनों से अधिक भारत यात्रा केंद्र-ट्रस्ट बनवाये। उनके जीते जी, अंग्रेजी मीडिया का कुप्रचार रहा कि उन्होंने हजारों करोड़ की संपत्ति बनायी है। भारत यात्रा केंद्र के ट्रस्ट बनवाये हैं। अपने व परिवार के नाम पर। चंद्रशेखर ने कभी सफाई नहीं दी। वह नहीं रहे, तब देश ने जाना कि भारत यात्रा ट्रस्ट के ट्रस्टी हर जगह वहां के लोकल लोग हैं।

जेपी ट्रस्ट के कामकाज के प्रति सभी पुराने जुड़े लोग उदासीन होते गये या कटते गये। इसी दौर में जेपी से जुड़े तथ्यों के साथ 'ऐतिहासिक अन्याय' होने लगा। उस पर भी यह ट्रस्ट खामोश या असहाय स्थिति में है। कारण, शायद जेपी इन लोगों के लिए महत्वपूर्ण नहीं रहे। 'ट्रस्ट', महत्पूर्ण हो गया है। जेपी के जन्म से लेकर अनेक चीजों पर गलत चर्चाएं शुरू हुईं। ऐतिहासिक तथ्य झुठलाये जाने लगे। पर सभी जगह चुप्पी। सब जानते हुए भी। हमारे आपसी मतभेद, आग्रह-पूर्वाग्रह से ऊपर है, जेपी का जीवन व उनके जीवन से जुड़े तथ्य। पर उनके नाम पर, उनसे जुड़ी संस्थाओं में काम करने वाले हम लोगों का सात्विक दायित्व क्या है ? जेपी के जीवन से जुड़े तथ्यों सच के प्रति ईमानदार बरताव व उसे आपसी विवाद, आग्रह-दुराग्रह व अहं से ऊपर रखना।

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