जैसे ही जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया ने जेएनयू प्रांगण में अपना भाषण पूरा किया, उस पर प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई। अपनी अपनी तरह से। यह कहा गया कि कन्हैया को सुनना तपती रेत में वर्षा की बूंद की तरह लगा। कुछ मीडिया के लोगों के इससे पहले ही कन्हैया के साथ कुछ सेल्फी के मूड वाले हसते खिलखिलाते फोटो अंग्रेजी अखबारों में नजर आए।
कुछ नसीयत वाली प्रतिक्रिया भी थी जिसने कोर्ट के जमानत के 23 पेज वाले पत्र की याद दिलाई गई। कुछ बाग बाग हुए कि कन्हैया के लिए विश्वविद्यालय में छात्रों का जुलूस उमड गया। और कन्हैया का मामला वामपंथी पार्टियों के लिए मानों स्वाति नक्षत्र की बूंद की तरह था।
इस तरह का माहौल मानो वामपंथी धारा महज कन्हैया के जेल से बाहर आने पर फिर देश भर में लहलहाने लगी हो। यह आज का समय है जो त्वरित घटनाओं पर उत्प्रेरित हो जाता है। इसलिए अब विहिप संघ के लिए हर विपरीत बात देशद्रोह की तरह लगने लगता है।
वहीं वामपंथ कांग्रेस कन्हैया की गिरफ्तारी और फिर उसकी जमानत को नया बिगुल बजने का संकेत मान लेती है। यह किसी का अपना डर तो किसी के मुगालते हैं। देश में जिस संपूर्णता में फैली वामपंथ की जड़े बिखर गई हों वो कन्हैया के जरिए सांस पाने की कोशिश करे, इससे हास्यास्पद क्या होगा। और जो भाजपा संघ विहिप अपने विराट स्वरूप सत्ता का उद्घोष करते हैं, वो एक कन्हैया से तंग होने लगे तो इससे बचकाना और क्या होगा। और जो कांग्रेस इस बहाने ही सही कहीं केंद्र को हिलाने की संभावना देखने लगे तो इससे बड़ी लाचारी क्या होगी।
कन्हैया चाहे जो भी हो, लेकिन उसके बहाने सबकी कमजोरियां सामने आई हैं। हां मीडिया की भी। कन्हैया के लिए� कोई राजनीतिक पार्टी दांव खेले समय में आता है, लेकिन जेल से बाहर आते कन्हैया के साथ मीडिया के कुछ लोगों की मुस्कराती खिलखिलाती तस्वीरें भी कुछ कह जाती हैं।
टीवी के एक चैनल में लिखा दिखा कि कन्हैया ने मोदी सरकार को हिलाया। चुनी हुई सरकारों को हिलाना नहीं, डराना चाहिए। उनपर लोगों का अंकुश होना चाहिए। चैनल का यह अधूरी खुशी है। उसने यह नहीं बताया कि बेशक विश्वविद्यालय में कन्हैया अपने छात्रों के समूह के बीच जोशीला भाषण दे रहे हो, लेकिन कोर्ट ने संभलने और सजग रहने की नसीहतों के साथ जमानत दी है।
इसे क्रांति कहना और देश का रुझान कहना जल्दबाजी है
जेएऩयू के एक भाषण से भले सरकार न हिले, लेकिन भाजपा की केंद्र सरकार और उसके सहयोगी संगठन सबक लेने का अवसर है। जेएऩयू में देश के खिलाफ नारे लगने पर इस मामले को सरकार को संजीदगी से नियंत्रण में लेना चाहिए था। एक तरफ तीखी प्रतिक्रिया शुरू हुई दूसरी तरफ कन्हैया की गिरफ्तारी को समाधान मान लिया।
शायद सरकार किसी को यह मौका नहीं देना चाहती थी कि उसने दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में नारे लगाने वालों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। बेशक नारे लगना संगीन बात है। और अगर महज भावुकता के अलावा किसी सियासत साजिश का हिस्सा है तो और भी खतरनाक।
लेकिन पुराने तजुर्बेकार नेता जिस तरह ऐसे समय स्थितियों को नियंत्रण में करते थे, वह सब नहीं किया गया। एक दम कारवाई की गई। सरकार के लिए अच्छा होता कि वह विश्वविद्यालय छात्र संघ के नेता को बातचीत के लिए बुलाती। वहां के हालात को जानने समझने की कोशिश करती।
दूसरी तरह परिसर के मामले में कुलपति के माध्यम से जांच भी कराती। ऐसा नहीं हुआ। वहीं दूसरा पक्ष यह भी है कि कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद मीडिया के एक खास वर्ग में खतरनाक नारे लगना, वहां के माहौल का खराब होना या किसी साजिश के अंदेशे को भापंने के बजाय सब कुछ कन्हैया पर केंद्रित करा दिया गया।
पहली कोशिश यही थी कि नारे लगने को बहुत हल्की घटना के रूप में प्रचारित कर कन्हैया की गिरफ्तारी का रदार ढंग से प्रचारित किया जाए। सबके अपने अपने खेल थे। वैसे किसी विश्वविद्यालय के छात्र यूनियन का अध्यक्ष के लिए छात्रों की भीड़ जुटाना कठिन नहीं होता।
वह भी उस जेएनयू के लिए वैचारिक आंदोलन वाले जलूस जलसे पहले से आम बात रहे हो। इसलिए जहां एक तरफ भाजपा सरकार पर भी गंभीर प्रश्न हैं वहीं कन्हैया के भाषण को और छात्रों को देखकर इसे क्रांति कहना और देश का रुझान कहना जल्दबाजी है।
फिर यह और तरह का कन्हैया होगा
अब कन्हैया के भाषण पर आते हैं। कन्हैया ने लहराते बैनर और संभल कर बोले गए नारों के बीच जो सवाल उठाए हैं वह पलटकर वापस भी होंगे। उनका कहना था कि देशद्रोह गलत है लेकिन राजद्रोह गलत नहीं। आजादी का नारा नहीं था। देश में आजादी का नारा था।
भाषण को प्रहार और दार्शनिक बनाने के लिए अच्छी खासी मेहनत की गई। लेकिन उन्होंने जो कहा वो तो समाजवादी कांग्रेसी और भाजपाई भी दशकों से कहते आ रहे हैं। लेकिन जब जब इन अलग अलग वैचारिक पार्टियों को सत्ता मिली तो उनके आचरण में ये चीजें गायब हो गई।
जिन्होंने समाजवाद की सबसे ज्यादा बात की, उन्होंने परिवारवाद का खुळा मंचन किया। परिवार के नाम पर सत्ता केंद्रित की गई। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या कन्हैया को केवल केवल मोदी सरकार से ही पूछना चाहिए कि दलितों की ये हालत क्यों।
मुस्लिमों की ये हालत क्यों। उन्हें यह सवाल कांग्रेस और लालू सरकार से भी करना चाहिए। उनके भाषण की शैली से आभास होता है कि मानों सारी व्यवस्थाओं के लिए ये दो साल ही जिम्मेदार हों। किसान की आत्महत्या कब से हो रही है और क्यों हो रही है इसके विस्तार में जाना पडेगा।
फिर कांग्रेस से लेकर भाजपा और समाजवादी धडे सब लपेट में आते हैं। कन्हैया चालाकी से यह न जताए कि मई 2014 के बाद ही किसान आत्महत्या करने लगे। हां अफसोस है कि भाजपा भी किसानों की आत्महत्या को रोक नहीं पा रही। कहा यह जा सकता है कि अभी केंद्र में भाजपा सरकार है।
लेकिन क्या आने वाले समय मे इन सवालों को वह दूसरों के समक्ष भी उठाएंगे। या उनका विरोध केवल एक पार्टी तक रहेगा। अगर ऐसा है तो फिर मानना चाहिए कि केंद्रिय सत्ता को हिलाने के लिए जेएऩयू को उपकरण बनाने का प्रयास किया गया। अगर वह अपनी गरीबी, असमानता, सामाजिक भेदभाव किसानों की आत्महत्या के सवाल को सबके सामने ख़डा करते हैं, फिर यह और तरह का कन्हैया होगा। उसकी आवाज में सच्चाई होगी।
कन्हैया क्या ये सवाल कर पाएंगे
कन्हैया जिस आजादी की बात कर रहे हैं। वह बंगाल तक भी जाती है। जो सीताराम येचुरी उन्हें चुनाव में प्रचार के लिए ले जाना चाहते� हैं उन्हें उनसे पूछना चाहिए कि लोग वहां मन का वोट क्यों नहीं दे पाते। क्यों दंबग और लठैत कमजोर दबे कुचले लोगों के वोट का निर्धारण करते रहे। उन्हें येचुरी से पूछना होगा कि आपके साथ कैसे प्रचार कर सकता हूं।
कन्हैया को पूछना होगा लालू से भी कि क्यों तुम्हारे मुख्यमंत्री होते बिहार का आदमी मुंबई में पिटता रहा। उसे इतनी दूर नौकरी के लिए क्यों जाना पडा। आपके नौ बच्चों में� कोई एक मुंबई में नौकरी करने के लिए गया। कन्हैया से बेहतर कौन पूछ सकता है। सबसे ज्यादा तो उसने भोगा है। कन्हैया के रातों रात नायक की तरह उभरने पर वामपंथ के नेता अनुयायी खासे उत्साहित है। जगह जगह वामपंथी जत्थों में� बिहार के उन इलाकों की समीक्षा करने लगे है जो कन्हैया के लिए ठीकठाक सीट हो सकती है।
लेकिन क्या कन्हैया वामपंथ राजनीति से कह सकेंगे कि वह गरीबों के पक्ष में हैं। चार दशक की सत्ता में पश्चिम बंगाल को इतना लाचार गरीब क्यों बनाया। यह सवाल कन्हैया को हर शासक से करना होगा। कांग्रेस से भी। और भाजपा से भी। वामपंथ से भी। क्या कर पाएंगे।
तो कन्हैया और पुराने घाघ नेताओं में फर्क क्या
विहिप और संघ को कन्हैया फटकार सकते हैं। एक छात्र नेता का फटकारना अच्छा लगता है। कितना अच्छा हो कि कन्हैया जैसे छात्र नेता के डर के चलते अगर साक्षी महाराज, तोगड़िया, प्रज्ञा, कटारिया जैसे लोग कुछ कहने से पहले सोचे। आपत्तिजनक बयान कहीं से भी उठे उसे छात्र शक्ति को आगे बढ़कर फटकारना भी चाहिए।
लेकिन क्या वो भी घाघ नेताओं की तरह कथित मुस्लिम संगठनों, फतवा देने वाले इमामों तेज बयानवाजी वाली आजम खान, ओबेसी� के बयानों पर चुप्पी साध लेंगे। क्या सांप्रदायिकता की उनकी भी परिभाषा अपने खांचों में सिमटी होगी। कटियार के बदला लेने वाले खतरनाक बयान पर तीखी आलोचना होनी चाहिए।
मगर क्या आप पार्टी के उस विधायक पर नहीं कहा जाएगा जो एक सभा में केंद्र की सरकार को हरामखोर सरकार कह आया हो। और उसके आगे भी कुछ तीखी नसीयतें दे आया हो। समाज चारों तरफ से सुधरता है एक तरफ से नहीं। अगर कुछ संगठन ही निशाना बनेगे तो कन्हैया और पुराने घाघ नेताओं में फर्क क्या।
कहना मुश्किल है कि कन्हैया के मन में क्या है
देश में वामपंथी आंदोलन की हमेशा जरूरत रही है। वामपंथ आंदोलन मजदूर किसानों की आवाज बना है। लेकिन आवाज बना तो मजदूर किसानों ने ही उसे अपने से दूर क्यों किया। छोटे छोटे टापुओं में सिमटने की वजह यही है कि वामपंथी पार्टियों ने नारे भले दिए लेकिन समाज से दूरी बनाई।
एक अरब के भारत में एक बड़े समूह की संवेदना और भावनाओं का मजाक उड़ाया जाता रहा। प्रगतिशीलता के भाव में अतिवाद इस तरह गहराया कि वामपंथ सिमट गया। उसने कांग्रेस के पीछे चलने को अपनी नियति माना। कांग्रसियों ने करीब चार दशक तक वामपंथी राजनीति से अपने हित साधे।
वहीं वामपंथी राजनीति नए लोगों को जोड़ने में विफल रही। उनके पास जो बातें थीं वो आज के जनमानस को लुभा न सकी। लिहाजा अब भी गति वही है। वामपंथ अपनी कमजोरियों को दूर करने के बजाय कन्हैया चमत्कार के भरोसे हैं। जो वामपंथी चमत्कारों का मजाक उडाते है, वो कन्हैया में चमत्कार देखना चाहते हैं। कहना मुश्किल है कि कन्हैया के मन में क्या है।