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मोदी 2.0 में जापान से दोस्ती : एक-दूसरे का सहयोग कर आगे बढ़ा सकते हैं अपने विकल्प

रूपकज्योति बोरा Published by: Raman Singh Updated Wed, 09 Oct 2019 06:57 AM IST
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रूपकज्योति बोरा

ओसाका में हुए जी-20 के शिखर सम्मेलन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने दूसरे कार्यकाल में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ अपने विचारों को साझा करने का एक और अवसर प्रदान किया था। अबे और मोदी इससे पहले भी कई बार मिल चुके हैं और दोनों देशों प्रधानमंत्री स्तरीय द्विपक्षीय वार्षिक शिखर बैठक करते रहे हैं। अपनी बढ़ती निकटता के संकेत में, भारत और जापान इस साल के अंत में दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच द्विपक्षीय वार्षिक शिखर सम्मेलन से पहले अपने विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच 2+2 बैठक करेंगे।



आखिर वह क्या चीज है, जो दोनों देशों को इतना निकट लाती है? शीतयुद्ध के बाद ही दोनों देशों के बीच नजदीकी बढ़नी शुरू हुई। लेकिन भारत और जापान के बीच संबंध दोनों नेताओं के नेतृत्व में बहुत तेजी से आगे बढ़े हैं, क्योंकि दोनों के बीच व्यक्तिगत रिश्ते बहुत अच्छे हैं। दूसरा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र के क्षेत्रीय माहौल ने दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। दोनों देशों को करीब लाने में चीन के उदय की भूमिका प्रमुख है। तीसरा, अबे भारत जैसे देशों में पहुंच रहे हैं, जो उसकी योजना में फिट बैठते हैं। उल्लेखनीय है कि जापान को भारत के पूर्वोत्तर इलाके में निवेश की अनुमति दी गई है, जिसकी अनुमति अन्य देशों को नहीं है।


अंडमान और निकोबार में भी अन्य देशों को निवेश की अनुमति नहीं है, लेकिन भारत और जापान वहां डीजल ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए काम कर रहे हैं। चौथा, अपनी विशाल आबादी और बढ़ते मध्यवर्ग के कारण भारत जापान की कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है। भारत के व्यस्त मुंबई-अहमदाबाद खंड में जापानी बुलेट ट्रेन चलाने के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। जापान अन्य देशों में भी बुलेट ट्रेन टेक्नोलॉजी का निर्यात करना चाहता था, लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली। आखिरी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भारत भारी निवेश चाहता है और जापान एक प्रमुख निवेशक है। विकासशील देश होने के नाते भारतीय शहरों के लिए आबादी एक गंभीर मुद्दा है, जिसमें जापान की हरित प्रौद्योगिकी मददगार हो सकती है।


इसके बावजूद कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जहां दोनों देशों के बीच दूरी है। मसलन, दोनों देशों के बीच व्यापार अब भी भारत-चीन के व्यापार की तुलना में कम है। नई दिल्ली और टोक्यो के बीच वर्ष 2017-18 में द्विपक्षीय व्यापार मुश्किल से 15.71 अरब डॉलर का था, जबकि भारत-चीन के बीच राजनीतिक तनाव के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार 2017 में 84.44 अरब डॉलर का था। भारी संभावनाओं के बावजूद भारत और जापान रक्षा क्षेत्र में सहयोग करने में असमर्थ रहे हैं।


नई दिल्ली गंभीर बाहरी दबाव का सामना कर रही है और जापान हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आैर उससे आगे उसका पसंदीदा साझेदार हो सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत में जापान के साथ घनिष्ठ संबंधों को सभी पार्टियों का समर्थन है। ऐसे दौर में जब चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है, भारत और जापान एक दूसरे का सहयोग करके अपने विकल्पों को आगे बढ़ा सकते हैं। वाशिंगटन के साथ नई दिल्ली की बढ़ती नजदीकी ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समीकरणों को बदल दिया है। जापान और भारत के बीच कोई बड़ा हितों का टकराव नहीं है और टोक्यो के हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण के साथ भारत की ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी अच्छी तरह से फिट बैठती है।


(लेखक टोक्यो में स्ट्रैटेजिक स्टडीज के लिए जापान फोरम के रिसर्च फेलो हैं)

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