गांवों को हमने हमेशा भारत की सभ्यता-संस्कृति का केंद्र समझा। इसमें कोई दो राय नहीं कि वे आज भी भारतीय संस्कृति के वाहक हैं। लेकिन आजादी के बाद उनकी लगातार उपेक्षा होती रही है। शहर की तुलना में गांवों की सुख-सुविधाएं लगातार कम होती रहीं। नतीजा यह रहा कि आज गांव खाली हो रहे हैं। पूरे देश के रुझान बताते हैं कि गांवों से पलायन में निरंतर वृद्धि हो रही है। जबकि शहरों को संभालना दुष्कर होता जा रहा है।
इसी समस्या के मद्देनजर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने जून के अंतिम सप्ताह में ‘बैक टु विलेज’ यानी एक बार फिर गांव की ओर नाम से एक नायाब कार्यक्रम चलाया। ऐसा नहीं कि इस तरह के कार्यक्रम पहले कहीं नहीं हुए। उत्तराखंड में कुछ साल पहले ‘हिटो पहाड़’ नाम से ऐसा ही कार्यक्रम चलाया गया था। चौधरी देवीलाल ने ‘पचास प्रतिशत बजट गांवों को’ नाम से अभियान चलाया था। चौधरी चरण सिंह ने भी अपने जमाने में उत्तर प्रदेश में कुछ योजनाएं गांवों को मजबूत करने के लिए चलाई थीं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इसे भाषणों से बाहर निकाल कर सचमुच अंजाम देने की कवायद हुई।