उस समय मैं कौशल विकास के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में ओडिशा के मलकानगिरी जिले के आदिवासी गांवों में गया था। मैंने देखा कि कौशल प्रशिक्षण के लिए आने वाले ज्यादातर युवा ऐसे थे, जो पढ़ाई में कमजोर थे। यहीं मुझे लगा कि अगर इन बच्चों को बचपन से ही गुणवत्तापरक शिक्षा मिल जाती, तो आज प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। इसके बाद ही मैंने एक खास तरह के मॉडल पर काम करना शुरू किया, जिसका नाम रखा ‘थिंकजोन’। मैं स्वयं ओडिशा का रहने वाला हूं।
इंजीनियरिंग करने के बाद मैं बंगलूरू में विश्व बैंक के साथ ग्लोबल एजुकेशन प्रैक्टिस कंसलटेंट के तौर पर काम करता था। इसके बाद मैंने भुवनेश्वर से ग्राम प्रबंधन में एमबीए किया और कुछ समय के लिए कौशल विकास के क्षेत्र में काम किया। उसी दौरान मैंने अपने प्रोजेक्ट के लिए ओडिशा के कई क्षेत्रों की यात्राएं की। मैंने देखा कि कौशल प्रशिक्षण पूरा होने के बाद युवा सोचते थे कि उनको अच्छी नौकरी मिल जाएगी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसकी वजह थी कि ये बच्चे पढ़ाई में कमजोर थे। यहीं से से मुझे लगा कि अगर यहां के युवाओं को रोजगार से जोड़ना है, तो सबसे पहले बचपन से ही उनको अच्छी शिक्षा देनी जरूरी है, जिससे उनका आधार मजबूत हो।