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मंजिलें और भी हैं: नींव मजूबत होने पर ही काम आएगा प्रशिक्षण

विनायक आचार्य Published by: विनायक आचार्य Updated Wed, 28 Aug 2019 12:12 AM IST
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विनायक आचार्य - फोटो : अमर उजाला

उस समय मैं कौशल विकास के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में ओडिशा के मलकानगिरी जिले के आदिवासी गांवों में गया था। मैंने देखा कि कौशल प्रशिक्षण के लिए आने वाले ज्यादातर युवा ऐसे थे, जो पढ़ाई में कमजोर थे। यहीं मुझे लगा कि अगर इन बच्चों को बचपन से ही गुणवत्तापरक शिक्षा मिल जाती, तो आज प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। इसके बाद ही मैंने एक खास तरह के मॉडल पर काम करना शुरू किया, जिसका नाम रखा ‘थिंकजोन’। मैं स्वयं ओडिशा का रहने वाला हूं। 

इंजीनियरिंग करने के बाद मैं बंगलूरू में विश्व बैंक के साथ ग्लोबल एजुकेशन प्रैक्टिस कंसलटेंट के तौर पर काम करता था। इसके बाद मैंने भुवनेश्वर से ग्राम प्रबंधन में एमबीए किया और कुछ समय के लिए कौशल विकास के क्षेत्र में काम किया। उसी दौरान मैंने अपने प्रोजेक्ट के लिए ओडिशा के कई क्षेत्रों की यात्राएं की। मैंने देखा कि कौशल प्रशिक्षण पूरा होने के बाद युवा सोचते थे कि उनको अच्छी नौकरी मिल जाएगी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसकी वजह थी कि ये बच्चे पढ़ाई में कमजोर थे। यहीं से से मुझे लगा कि अगर यहां के युवाओं को रोजगार से जोड़ना है, तो सबसे पहले बचपन से ही उनको अच्छी शिक्षा देनी जरूरी है, जिससे उनका आधार मजबूत हो।



हमने पहले मोबाइल और टैबलेट बेस्ड एप्लीकेशन को ऑफलाइन सुविधाओं के साथ विकसित किया, जो ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को सीखने में मदद कर रहा है। इससे प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता और सीखने की गति की मॉनीटरिंग भी आसानी से हो जाती है। इसमें हम गांव की पढ़ी-लिखी महिलाओं को शामिल करते हैं, ताकि वे बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उनकी परेशानियों को भी समझ सकें। प्रोजेक्ट से जोड़ने से पहले इन महिलाओं को ‘थिंकजोन’ डेढ़ महीने का प्रशिक्षण देता है। अभी करीब पैंतालीस महिलाएं तीन से दस साल तक के तकरीबन डेढ़ हजार बच्चों को पढ़ा रही हैं। 

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विनायक आचार्य - फोटो : अमर उजाला
उस समय मैं कौशल विकास के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में ओडिशा के मलकानगिरी जिले के आदिवासी गांवों में गया था। मैंने देखा कि कौशल प्रशिक्षण के लिए आने वाले ज्यादातर युवा ऐसे थे, जो पढ़ाई में कमजोर थे। यहीं मुझे लगा कि अगर इन बच्चों को बचपन से ही गुणवत्तापरक शिक्षा मिल जाती, तो आज प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। इसके बाद ही मैंने एक खास तरह के मॉडल पर काम करना शुरू किया, जिसका नाम रखा ‘थिंकजोन’। मैं स्वयं ओडिशा का रहने वाला हूं। 

इंजीनियरिंग करने के बाद मैं बंगलूरू में विश्व बैंक के साथ ग्लोबल एजुकेशन प्रैक्टिस कंसलटेंट के तौर पर काम करता था। इसके बाद मैंने भुवनेश्वर से ग्राम प्रबंधन में एमबीए किया और कुछ समय के लिए कौशल विकास के क्षेत्र में काम किया। उसी दौरान मैंने अपने प्रोजेक्ट के लिए ओडिशा के कई क्षेत्रों की यात्राएं की। मैंने देखा कि कौशल प्रशिक्षण पूरा होने के बाद युवा सोचते थे कि उनको अच्छी नौकरी मिल जाएगी, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसकी वजह थी कि ये बच्चे पढ़ाई में कमजोर थे। यहीं से से मुझे लगा कि अगर यहां के युवाओं को रोजगार से जोड़ना है, तो सबसे पहले बचपन से ही उनको अच्छी शिक्षा देनी जरूरी है, जिससे उनका आधार मजबूत हो।

हमने पहले मोबाइल और टैबलेट बेस्ड एप्लीकेशन को ऑफलाइन सुविधाओं के साथ विकसित किया, जो ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को सीखने में मदद कर रहा है। इससे प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता और सीखने की गति की मॉनीटरिंग भी आसानी से हो जाती है। इसमें हम गांव की पढ़ी-लिखी महिलाओं को शामिल करते हैं, ताकि वे बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उनकी परेशानियों को भी समझ सकें। प्रोजेक्ट से जोड़ने से पहले इन महिलाओं को ‘थिंकजोन’ डेढ़ महीने का प्रशिक्षण देता है। अभी करीब पैंतालीस महिलाएं तीन से दस साल तक के तकरीबन डेढ़ हजार बच्चों को पढ़ा रही हैं। 

इन बच्चों को पढ़ाने के लिए थोड़ा शुल्क भी लिया जाता है, जो इन्हीं महिलाओं को दे दिया जाता है। ये महिलाएं अपने घर, सामुदायिक केंद्रों या किसी दूसरी जगह पर इन बच्चों को इकट्ठा कर पढ़ाती हैं। हर बैच में पच्चीस से तीस बच्चे होते हैं। बच्चों की संख्या के हिसाब से ये महिला टीचर दिन में दो से तीन बैच में पढ़ाती हैं। शुरुआत में बच्चे का टेस्ट लिया जाता है और उसकी जानकारी के हिसाब से उसे पढ़ाया जाता है। इसमें बच्चे की उम्र नहीं देखी जाती है। थिंकजोन में पढ़ाई कर रहे कुछ बच्चे आंगनबाड़ी भी जाते हैं। इन बच्चों को पेंसिल पकड़ने से लेकर साफ-सफाई जैसी चीजें सीखाई जाती हैं। इसके लिए बच्चों को वीडियो भी दिखाए जाते हैं।

उन्हें खेलों के प्रति आकर्षित किया जाता है। हम अक्सर इन बच्चों का टेस्ट लेते रहते हैं, जिसमें इन बच्चों की अध्ययन क्षमता में तेजी से विकास होना पाया गया है। थिंकजोन का मॉडल इस समय ओडिशा के कटक, जगतपुर और गंजम जिले के कई गांवों में सक्रिय है। हम सबसे पहले गांव का चयन करते हैं। उसके बाद उसी गांव की उन महिलाओं को चयन में प्राथमिकता दी जाती है, जिनको पहले से बच्चों को पढ़ाने का थोड़ा-बहुत अनुभव होता है। अब हमारी योजना इस मॉडल को बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में ले जाने की है, जहां पर बच्चों की पढ़ाई का स्तर चिंताजनक है। मेरा एक ही मकसद है, आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों और बच्चियों के लिए शिक्षा का उचित वातावरण तैयार करना। मुझे लगता है कि किसी भी काम को बेहतर ढंग से करने के लिए शिक्षित होना बेहद जरूरी है। शिक्षा ही वह माध्यम है, जिसकी ताकत से अपने कौशल को और निखारा जा सकता है।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)  
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