परमात्मा के धाम भी अनगिनत हैं। कहीं वे विष्णु रूप में विराजते हैं, कहीं शिव रूप में, कहीं शक्ति के रूप में, तो कहीं बालक, योगी या राजा बनकर। इन धामों में वे अपने-अपने पार्षदों के साथ ऐसी दिव्य लीलाएं करते हैं, जो बुद्धि से परे हैं, पर भक्त के हृदय को छू लेती हैं। देखने में ये धाम अनेक प्रतीत होते हैं, पर तत्त्व एक ही है-एक ही परम सत्य, एक ही अनंत चेतना।
भगवान का स्वरूप सच्चिदानंद कहा गया है। सत् (जो कभी नष्ट नहीं होता), चित् (जो ज्ञान व प्रकाश का अनंत स्रोत है) और आनंद (जो सीमाओं से परे तथा अखंड है)। इसी सच्चिदानंद स्वरूप में परमात्मा निराकार भी हैं और साकार भी।
- लोग प्राय: प्रश्न करते हैं कि ‘जो निराकार है, वह देह कैसे धारण कर सकता है?’ परंतु यह प्रश्न स्वयं सीमित बुद्धि से जन्म लेता है। जो संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना कर सकता है, क्या वह स्वयं साकार रूप नहीं रच सकता?
साकार होना उसकी बाध्यता नहीं, अपितु लीला है। शास्त्र कहते हैं कि जीवों के कल्याण के लिए वही शुद्ध चैतन्य ब्रह्म स्वेच्छा से सगुण रूप धारण करता है। सृष्टि के सभी जीव परमात्मा के अंश हैं। मुख्यत: पांच तरह की योनियां होती हैं-उद्भिज, स्वेदज, अंडज, पिंडज और जरायुज, किंतु प्रत्येक में चेतना समान रूप से प्रकट नहीं होती। मनुष्य योनि में चेतना सबसे अधिक विकसित हो सकती है, इसलिए उसे कर्मयोनि कहा गया है। सामान्य मनुष्य में पांच या छह कलाएं जाग्रत होती हैं। असाधारण प्रतिभाओं में सात, और विरले महापुरुषों में आठ कलाएं प्रकट होती हैं। जब किसी दिव्य देह में नौ, दस या उससे अधिक कलाएं प्रकाशित होती हैं, तो उसी को परमात्मा का अवतार कहते हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण ऐसे ही पूर्णावतार थे, जिनमें दिव्यता पूर्ण रूप से व्यक्त हुई। अवतार भी कई प्रकार के होते हैं-अंशांशावतार (जैसे मरीचि आदि ऋषि), अंशावतार, (ब्रह्मा, नारद आदि), आवेशावतार (परशुराम और पृथु आदि), कलावतार (कपिल, वराह तथा वामन आदि)। और भी कई तरह के अवतार होते हैं। वास्तव में हर जीव ईश्वर का अंश है, किंतु कलाओं की प्रखरता से ही दिव्यता प्रकट होती है।
गीता में भगवान कहते हैं-साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रकट होता हूं। भक्तों की दृष्टि में अवतार का रहस्य इससे भी गहरा है। निर्गुण ब्रह्म जब सगुण रूप धारण करता है, तब भक्त का हृदय स्वतः प्रेम से भर जाता है। नारायण, शिव, शक्ति, सूर्य और गणेश-ये ‘पंचदेव’ एक ही परम तत्त्व के पांच स्वरूप हैं। इन्हीं के माध्यम से धर्म की पुनः स्थापना होती है। विष्णु के चौबीस अवतार बताए गए हैं, जिनमें दशावतार विशेषकर प्रसिद्ध है। फिर भी ईश्वर की उपस्थिति केवल अवतारों तक सीमित नहीं है। जहां कहीं असाधारण बल, बुद्धि, सौंदर्य या करुणा दिखाई देती है, वहां ईश्वर की विभूति समझनी चाहिए। कभी वे स्वयं उतरते हैं, कभी किसी संत, महात्मा या गुरु में अपना तेज प्रतिष्ठित कर देते हैं। अवतार-तत्त्व का सार यही है कि ईश्वर करुणामय हैं। जब-जब जीव संकट में होता है, धर्म डगमगाता है और भक्ति क्षीण पड़ती है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में प्रकट होकर मार्ग दिखाते हैं। मनुष्य रूप में आकर वे हमें यही सिखाते हैं कि प्रेम, भक्ति और धर्म ही जीवन के परम लक्ष्य हैं।