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टाइम मशीन: धूल, धुएं और धुंध में घुटता रहा है दुनिया का दम; आज भारत में यही हाल

अंशुमान तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार Published by: पवन पांडेय Updated Sun, 04 Jan 2026 08:12 AM IST

सार

भारत आज जो झेल रहा है, उसे अन्य देश भी देख और भुगत चुके हैं। 1935 के दशक में जहां अमेरिका ब्लैक ब्लिजार्ड के धूल भरे बवंडरों से परेशान था, वहीं दिसंबर 1952 में लंदन घने स्मॉग के कोहरे में घुट रहा था, लेकिन दोनों ने उस पर काबू पाया। जनवरी, 2013 में बीजिंग भी दिल्ली की तरह धुएं की कब्र बन गया था। लेकिन आक्रामक प्रदूषण नियंत्रण नीति अपनाकर उसने अपना पूरा पर्यावरण बदल दिया और इलेक्टि्रक वाहन, सोलर सेल, बैटरी के विशाल उद्योगों के साथ अगले पांच साल में दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन तकनीक निर्यातक बन गया। जो उन्होंने कर दिखाया, वह हम क्यों नहीं!
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दिल्ली में प्रदूषण - फोटो : ANI / अमर उजाला


यह 1930-40 का दशक है। हमारा पहला पड़ाव है अमेरिका का पश्चिम या दक्षिणी इलाका, जिसे प्रेयरी कहा जाता है। 1862 में होमस्टेड एक्ट आने के बाद इस अर्ध शुष्क इलाके में लोगों की आमदरफ्त बढ़ने लगी थी। यहां घास के मैदान हैं, जिन्हें प्रेयरी कहा जाता है। यहां शुष्क भूमि पर गेहूं की खेती शुरू हुई। प्रथम विश्वयुद्ध में राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने नारा दिया-फूड विल विन द वार, यानी अनाज उगाकर युद्ध जीतने की ललकार। अनाज उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दिए गए। किसान परिवारों के युवा सेना में भर्ती हो गए, तो मशीनों ने जमीन चीर कर गेहूं निकाल लिया। टाइम मशीन अब 1935 के दशक में है। आपको अपने नाक-मुंह ढकने होंगे, क्योंकि आपका सामना होगा ब्लैक ब्लिजार्ड से। इधर पहले बड़े युद्ध के बाद आई महामंदी अमेरिका को मथ रही है, तो दूसरी तरफ प्रेयरी के मैदानों में मौसम बदल रहा है। ड्राइ लैंड फार्मिंग से मिट्टी की नमी उड़ चुकी है। बारिशें रुकीं, तो काली धूल के बवंडर उठने लगे हैं। 1932 से 1933 में ऐसे 55 तूफान आए, जिन्हें ब्लैक ब्लिजार्ड कहा जा रहा है।


यह 1935 का साल है। मिडवेस्ट से उठी हजारों टन धूल उड़कर राजधानी वाशिंगटन तक आ गई है। इन तूफानों को एक नाम मिल गया है। यह डस्ट बाउल है। 1939 तक अमेरिका का 75 फीसदी हिस्सा और 140 लाख हेक्टेयर खेती इन धूल भरे तूफानों से प्रभावित होगी। अपना मास्क संभालिए और नोट कीजिए कि इस वक्त अमेरिका की करीब आधी आबादी खेती पर निर्भर है। इन बवंडरों से पश्चिम और दक्षिण में खेती तबाह हो गई है। पलायन शुरू हो गया है। जॉन स्टेनबेक का प्रसिद्ध उपन्यास द ग्रेप्स ऑफ रैथ जरूर पढ़िएगा, जो डस्ट बाउल के दौरान प्रवासियों के पलायन की दर्दनाक कहानी है। अब शुरू हो रहा है, अमेरिकी पर्यावरण के लिए इतिहास का सबसे विशाल कार्यक्रम। राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने 30 लाख लोगों की फॉरेस्ट आर्मी बनाकर विशाल पौधारोपण शुरू किया है। 1942 तक कनाडा से टेक्सास तक पेड़ों की एक नहीं, कई दीवारें या बेल्ट बनाई जाएंगी। इन्हें 21वीं सदी में उत्तरी डकोटा से लेकर टेक्सास तक देखा जा सकता है।


टाइम मशीन अब अपने दूसरे पड़ाव, यानी लंदन पहुंच रही है। दिसंबर 1952 का लंदन। कड़ाके की ठंड है। ब्रिटेन अभी राशनिंग के दौर में है। कोयला महंगा, लेकिन जरूरी है। लंदनवासी दिसंबर की ठंड से बचने के लिए चिमनियां जला रहे हैं। कृपया बाहर निकलने से पहले मास्क लगा लें। लंदन को एक स्मॉग ने घेर लिया है। स्मॉग इतना घना है कि सड़क पार नहीं दिखाई देता। इंद्रियां उलट जाती हैं। स्मॉग को पांच दिन बीते हैं। लोग दीवारें टटोलकर काम पर जा रहे हैं। लंदन एक दुर्लभ पर्यावरण तबाही को देख रहा है। स्मॉग ने ठंडी हवा को जमीन के पासे में फंसा लिया है। उस घुटन भरी चादर में 35 लाख कोयले की चिमनियां जलती हैं, पांच बड़े बिजली घर व गाड़ियां धुआं उगलती हैं। हवा पीली-भूरी, सल्फर डाइऑक्साइड से भरी है, जिससे सड़े अंडों की बदबू आती है। कपड़ों और त्वचा पर कालिख इतनी है कि लोग एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते। अब तक 4,000 मौतें दर्ज हुई हैं, ज्यादातर रेस्पिरेटरी फेलियर से। आगे जब एपिडेमियोलॉजिस्ट दिसंबर,1952 से मार्च, 1953 के डेथ सर्टिफिकेट्स देखेंगे, तो मौतों की संख्या 12,000 होगी। 1666 की ग्रेट फायर से ज्यादा।


यह 1956 का साल है। सरकार ने क्लीन एयर एक्ट पारित किया है, जो दुनिया का पहला पर्यावरण कानून है। अगले एक दशक में लंदन अपनी शानदार आबोहवा से दुनिया के अमीरों का ठिकाना हो जाएगा। टाइम मशीन अब 2013 के बीजिंग पर मंडरा रही है। यह 10 जनवरी, 2013 की तारीख है। बीजिंग मानो धुंए की कब्र बन गया है-एक्यूआई, 993 पर। इसके साथ महाशक्ति की साख भी धुआं-धुआं हो रही है। यह लंदन के पांच दिन का स्मॉग नहीं है, न यह डस्ट बाउल की धीमी घुटन है। यहां लोग बाकायदा दुनिया को बता रहे हैं कि इस शहर की हवा कैसे उन्हें तिल-तिल कर मार रही है। फोटो जर्नलिस्ट जोउ जुकसियन रोज एक ही छत से तस्वीरें ले रहे हैं। उनका #BeijingAirNow वीबो पर 2.4 करोड़ बार देखा गया। बीजिंग का परिदृश्य किसी दूसरे ग्रह-सा हो गया है। एपल, जेपी मॉर्गन, होंडा ने अपने कर्मचारियों को मास्क बांटे हैं, ताकि जान बचे और काम चले। बच्चे बीमार पड़ रहे हैं। खबर है कि जियांग्सू में एक आठ साल की बच्ची चीन की सबसे युवा लंग कैंसर पेशेंट बन गई है। यह चीन का एयरोकैलिप्स है। मगर यहां अमेरिका के डस्ट बाउल और लंदन के स्मॉग से कुछ अलग हो रहा है। चीन की सरकार ने वार ऑन पॉल्यूशन घोषित कर दिया है। 2017 तक दुनिया का सबसे आक्रामक प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम चलेगा।


अब हम 2017 में हैं। चीन ने अपना पूरा पर्यावरण बदल दिया और साथ ही बदल दी अर्थव्यवस्था भी। ‘ग्लोबल पॉल्यूटर’ चीन इलेक्टि्रक वाहन, सोलर सेल, बैटरी के विशाल उद्योगों के साथ अगले पांच साल में दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन तकनीक निर्यातक हो जाएगा। टाइम मशीन अब दिल्ली के स्मॉग में लौट रही है। जो उन्होंने कर दिखाया, वह हम क्यों नहीं! गुलजार के इस शेर के साथ इस धुएं में उतरिए-काली लकीरें खींच रहा है फजाओं में/बौरा गया मुंह से क्यूं खुलता नहीं धुंआ/आंखों को पोंछने से लगा आग का पता/यूं चेहरा फेर लेने से छिपता नहीं धुआं। फिर मिलते हैं अगले सफर पर...

 
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