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अंतरराष्ट्रीय: बाज, भालू और दोस्ताना... यानी अमेरिका-रूस की मित्रता के साथ संतुलन

सुरेंद्र कुमार
Updated Thu, 18 Dec 2025 07:17 AM IST

सार

राष्ट्रीय हित में जरूरी है कि भारत दोस्ताना बाज और दोस्ताना भालू, यानी अमेरिका व रूस के साथ संतुलन बनाकर चले, जो वह कर भी रहा है।
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


ऐसे समय में, जब अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर अपने प्रतिबंध बढ़ा दिए हैं और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले की वजह से पुतिन 100 से ज्यादा देशों की यात्रा नहीं कर सकते, इस यात्रा के जरिये रूस ने पश्चिमी देशों के दावों को उलट दिया कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह अलग-थलग नहीं पड़ा है। भारत ने भी यह साफ कर दिया है कि वह अपने फैसले खुद लेगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कहा कि भारत-रूस संबंध लंबे समय से दुनिया के सबसे स्थिर व मजबूत रिश्तों में से एक रहा है।


कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत आर्थिक बदलाव के अपने एजेंडे को पूरा करने और वैश्विक भूमिका निभाने के लिए अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सबसे अहम मानता है और यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ग्लोबल साउथ (वैश्विक दक्षिण) के साथ अपने रिश्तों को गहरा करने की कोशिश करता है, फिर भी रूस के साथ उसके पुराने, भरोसेमंद और समय की कसौटी पर परखे संबंध रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।


पुतिन की यात्रा से पहले ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि एसए-400 हवाई रक्षा प्रणाली के दो और प्लेटफॉर्म की आपूर्ति, एसए-500, एसयू-57 स्टील्थ फाइटर और रक्षा उपकरणों के संयुक्त उत्पादन को लेकर बड़ी घोषणाएं होंगी। भारत-रूस बिजनेस फोरम, जिसमें पुतिन और मोदी, दोनों शामिल हुए, उसमें अहम क्षेत्रों के लिए एक पंचवर्षीय रणनीतिक कार्यक्रम घोषित किया गया और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी रखा गया। इसके बावजूद कोई बड़ी या चौंकाने वाली घोषणा नहीं हुई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप की नीतियों का साया भारत व रूस पर अलग-अलग रूप में मौजूद था, जिसकी वजह से दोनों ने संतुलित रवैया अपनाना जरूरी समझा।


भारत-रूस के द्विपक्षीय व्यापार में तेल, गैस और रक्षा निर्यात का दबदबा रहा है। पिछले साल रूस से भारत को किए गए निर्यात का मूल्य करीब 64 अरब अमेरिकी डॉलर था, जबकि भारत का रूस को निर्यात सिर्फ पांच अरब डॉलर रहा, जो बांग्लादेश को भारत के निर्यात से भी कम है। वर्ष 2021 से पहले भारत द्वारा रूस से तेल आयात का मूल्य लगभग 2-3 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो बढ़कर 2022 में 25.5 अरब डॉलर, 2023 में 46.6 अरब डॉलर और 2024 में 52.7 अरब डॉलर हो गया। यह भारतीय कच्चे तेल आयात का 37.3 फीसदी है।


दोनों पक्ष इस व्यापार असंतुलन से वाकिफ हैं और द्विपक्षीय व्यापार में विविधता लाने के लिए गंभीर हैं। इसी कारण राष्ट्रपति पुतिन के साथ 60 सदस्यों वाला एक व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया था। प्रवासन व लोगों की आवाजाही, स्वास्थ्य व खाद्य सुरक्षा, समुद्री सहयोग व ध्रुवीय क्षेत्रों, उर्वरक, सीमा शुल्क और वाणिज्य, शैक्षणिक व मीडिया सहयोग से जुड़े कई समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। भारत ने रूसी पर्यटकों को 30 दिनों का मुफ्त ई-वीजा देने और रूसी पर्यटक समूहों को मुफ्त टूरिस्ट वीजा देने का फैसला किया है।


भारत के इस्तेमाल में आने वाले करीब 60-70 प्रतिशत रक्षा उपकरण-जैसे टैंक, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, विमानवाहक पोत और वायु रक्षा प्रणालियां-अब भी रूसी मूल के हैं, लेकिन रूस से रक्षा आयात में लगातार कमी आई है। 2009 में भारत के रक्षा आयात में रूस की हिस्सेदारी 76 फीसदी थी, जो 2024 में घटकर 37 फीसदी रह गई है, जिसका श्रेय ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इस्राइल और दक्षिण अफ्रीका से हमारे रक्षा आयात में विविधता को जाता है। दोनों पक्षों का लक्ष्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाना है। पुतिन ने निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति जारी रखने की बात भी कही। हालांकि, भारत रूसी कच्चे तेल के आयात को कम करना चाह रहा है, ताकि अमेरिका के 25 फीसदी दंडात्मक टैरिफ को हटवाया जा सके।
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निस्संदेह रूस ने लगातार समर्थन देकर भारत का भरोसा जीता है। फिर भी, ऊर्जा व रक्षा क्षेत्रों के अलावा रूस के पास ऐसी अहम और उभरती हुई तकनीकों की सीमित क्षमता है, जिनकी भारत को तीव्र आर्थिक विकास के लिए जरूरत है। इसलिए यह भारत के राष्ट्रीय हित में होगा कि उसके पास ‘दोस्ताना बाज’ और ‘दोस्ताना भालू’, यानी अमेरिका और रूस, दोनों हों। भारत को दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा, जिसे वह फिलहाल बेहतर ढंग से कर रहा है।
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