असामान्य आंकड़े
हालांकि, एसआईआर के कुछ पहलू न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर आते हैं। लेकिन एसआईआर से जुड़ी कुछ चीजें चिंताजनक हैं। पहली बात, नामकरण। पहले की पुनरीक्षण प्रक्रियाएं ‘स्पेशल रिवीजन’ या ‘समरी रिवीजन’ कहलाती थीं। दूसरी बात है इसका समय। इससे पहले कभी लोकसभा या विधानसभा चुनाव से मात्र चार महीने पहले इस तरह की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। तीसरी चीज है समय सीमा। ‘पुनरीक्षण’ केवल 30 दिनों में पूरा कर दिया गया और ‘आपत्तियों व दावों’ का निपटारा अगले 30 दिनों में किया जाएगा।
चौथी बात है इसका दायरा। पहले की पुनरीक्षण प्रक्रियाओं में पिछली मतदाता सूची को आधार मानकर केवल ‘नाम जोड़े’ या ‘हटाए’ जाते थे, लेकिन एसआईआर ने 2024 की मतदाता सूची को पूरी तरह निरस्त कर दिया और बिहार के लिए नई मतदाता सूची बनाने का दावा किया (स्रोत: पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा)। पांचवीं बात है असमान्य तरीके से नामों को हटाने पर जोर और नाम के जोड़े जाने के मामले पर पूर्ण चुप्पी।
किसी को कुछ नहीं पता
मृत्यु या जन्म स्वाभाविक है। यह बात भी सही है कि मृत व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाने चाहिए, लेकिन क्या निश्चित तिथि को 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाना चाहिए? बिहार की जन्म दर को देखते हुए, 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वालों की संख्या निश्चित रूप से कुछ लाख में होगी। क्या उन्हें शामिल किया गया है? चुनाव आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया है।
यह निष्कर्ष चुनाव आयोग ने कैसे निकाला कि 36 लाख लोग ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ हो गए हैं या उनका ‘पता नहीं चल रहा’ है? क्या चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर सर्वेक्षण किया था? क्या संबंधित लोगों ने स्वीकार किया कि वे स्थायी रूप से बिहार से बाहर किसी स्थान पर चले गए हैं? क्या चुनाव आयोग ने उन 36 लाख लोगों के ठिकानों की जांच कराई? चुनाव आयोग ने न्यायिक रूप से व्याख्या किए गए ‘सामान्य निवासी’ के मानदंड को कब और क्यों त्याग दिया और उसके स्थान पर ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ जैसे बहुअर्थी मानदंड को लागू कर दिया?
एसआईआर में विश्वसनीयता, पारदर्शिता और तर्कपूर्ण निष्कर्षों का अभाव है। ऐसा लगता है कि एसआईआर की शुरुआत पूर्वधारणाओं के आधार पर की गई है और उन्हीं मान्यताओं को सही ठहराने के लिए यह कवायद की गई है। ऐसे देश में, जिसकी जनसंख्या प्रतिवर्ष 0.89 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, मतदाता सूची में किसी भी संशोधन का परिणाम मतदाताओं की संख्या में वृद्धि होना ही है, लेकिन बिहार में एसआईआर का विपरीत प्रभाव पड़ा है। ऐसा लगता है कि एसआईआर का मकसद लोगों को मताधिकार से वंचित करना है। एसआईआर ने बिहार के लोगों के मन में यह डर पैदा कर दिया है कि अक्टूबर में उनमें से हजारों लोग अपने मत का उपयोग नहीं कर पाएंगे। अगर एसआईआर को अन्य राज्यों में भी लागू किया जाता है, तो बिहार के नतीजों को देखते हुए, सबसे संभावित परिणाम यही होगा कि वहां भी लाखों नागरिकों को मताधिकार से वंचित होना होगा।
कर्नाटक चुनौती
कर्नाटक से एक और चौंकाने वाली कहानी सामने आई है। बंगलूरू सेंट्रल कर्नाटक के 28 संसदीय क्षेत्रों में से एक है। इसमें आठ विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। आइए एक नजर बंगलूरू सेंट्रल के लोकसभा चुनाव परिणामों डालते हैं। फिलहाल विधानसभा क्षेत्र महादेवपुरा - को अलग रखते हैं। कांग्रेस उम्मीदवार चार विधानसभा क्षेत्रों में और भाजपा उम्मीदवार तीन विधानसभा क्षेत्रों में आगे चल रहे थे। इन सातों निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवार को कुल 82,178 मतों की बढ़त मिली। महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार 1,14,046 मतों से आगे थे। इससे 82,178 वोटों की कुल बढ़त खत्म हो गई और भाजपा उम्मीदवार 31,868 वोटों से आगे हो गया। डाक मतपत्रों को जोड़ने पर भाजपा उम्मीदवार 32,707 वोटों से विजयी घोषित किया गया। हालांकि, 32,707 वोटों के अंतर को कांग्रेस उम्मीदवार और उनकी टीम द्वारा जुटाए गए उन जबरदस्त प्रथम दृष्टया सबूतों के साथ जोड़ कर देखना होगा। उन लोगों ने मतदाता सूचियों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया और इसमें कई गंभीर त्रुटियां पाईं : एक ही घर में पंजीकृत विभिन्न मतदाताओं की असामान्य संख्या, मतदाता कार्डों में पिता का नाम अस्पष्ट शब्दों में लिखा होना और मतदाता कार्डों में उम्र ‘0’ या ‘124’ लिखा होना, ऐसी प्रथम दृष्टया त्रुटियों की संख्या हजारों में थी।
सवाल यह है कि अगर पहली नजर में ऐसे सबूत मौजूद हैं तो क्या इसकी जांच जरूरी नहीं है? एक सामान्य व्यक्ति कहेगा, ‘हां, बिल्कुल’, लेकिन चुनाव आयोग अब एक सामान्य व्यक्ति या संस्था की तरह व्यवहार नहीं करता। वह खुद को स्वतंत्र मानता है। वह निष्पक्ष चुनावों में प्राथमिक हितधारकों - मतदाताओं, उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के प्रति जवाबदेह नहीं है। चुनाव आयोग एक ‘न्यायालय’ की तरह व्यवहार करते हुए संसद के दोनों सदनों में इस पर चर्चा की अनुमति देने के लिए दोनों पीठासीन अधिकारियों की इच्छा के विरुद्ध हलफनामों और शपथों की मांग करता है!
महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची की विश्वसनीयता का केंद्रीय मुद्दा शोरगुल में नहीं खोना चाहिए तथा बहस को बाहरी मुद्दों की ओर नहीं मोड़ना चाहिए।
मैं फिर से कहना चाहूंगा कि एसआईआर पर उठे विवाद का मुख्य मुद्दा मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता है, चाहे वह महादेवपुरा विधान सभा क्षेत्र हो या बिहार राज्य। चुनाव आयोग को आज नहीं तो भविष्य में इसका जवाब देना होगा।