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मुद्दा: क्या जरूरी है चिकित्सा सेवा कैडर का गठन, समुदाय में इसलिए है नाराजगी

विजय त्रिपाठी
Updated Mon, 08 Dec 2025 07:03 AM IST

सार

तकनीकी विशेषज्ञता वाले विभाग में नौकरशाह की तैनाती का विरोध हो रहा है और मामला हाईकोर्ट तक चला गया है।
 
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क्या चिकित्सा सेवा कैडर का गठन जरूरी है - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


उत्तर प्रदेश में सरकार की ओर से स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवा और चिकित्सा शिक्षा विभाग, दोनों के वरिष्ठतम पदों पर लगातार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तैनाती की जा रही है। इससे चिकित्सकों में निराशा और आक्रोश है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में महानिदेशक के तीन पद हैं। तीनों पदों पर प्रांतीय चिकित्सा सेवा (पीएमएस) संवर्ग के वरिष्ठतम चिकित्सक को तैनात किया जाता रहा है। यहां वर्ष 1985 तक अपर निदेशक-प्रशासन का पद भी पीएमएस संवर्ग का था, लेकिन नियमावली में बदलाव कर इस पद पर आईएएस या पीसीएस की तैनाती का रास्ता खोल दिया गया है।


अब इस पद का नाम बदल कर निदेशक (प्रशासन) कर दिया गया है। इसी तरह सचिवालय स्तर पर पीएमएस कोटे से विशेष सचिव के दो पद हैं, लेकिन इन दोनों पदों पर भी प्रशासनिक सेवा के अधिकारी काबिज हो गए हंै। चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय (डीजीएमई) मेडिकल कॉलेजों के संचालक की भूमिका में है। चिकित्सा जगत का तर्क है कि चूंकि यह तकनीकी पद है, इसलिए चिकित्सा शिक्षा के जानकार को ही इस पर बिठाना चाहिए, ताकि वह कॉलेजों का संचालन ही नहीं, पाठ्यक्रम निर्धारण, संशोधन, शोध आदि को बढा़वा दे सके, लेकिन इस पद पर आईएएस काबिज हो गए हैं। नौकरशाही ने अन्य पदों को भी अपने दायरे में ले लिया है। चिकित्सा शिक्षा विभाग में अपर निदेशक के दो पद हैं, इस पर भी महानिदेशक मनमाने ढंग से नियुक्ति करते हैं। अभी तक इसकी नियुक्ति प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है।


चिकित्सा शिक्षा जैसे तकनीकी क्षेत्र में प्रशासनिक अधिकारियों को बिठाने से कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि इस पद के दायित्व निर्वहन में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ तकनीकी ज्ञान भी जरूरी है। चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण महानिदेशालय चिकित्सक, नर्सेज और पैरामेडिकल स्टाफ को भी तैयार करता है। फिर भी इतने महत्वपूर्ण संस्थान में करीब 30 साल से कार्यवाहक डीजीएमई ही तैनात किया जा रहा है। जब भी नियमित तैनाती हुई, तो यह पद आईएएस अफसरों को दे दिया गया। आरोप है कि आला अफसर नहीं चाहते हैं कि डीजीएमई स्वतंत्र रूप से काम करे।


सरकार का पक्ष आम तौर पर यह रहा है कि ये नियुक्तियां प्रशासनिक सुविधा या अन्य सरकारी नीतियों के तहत की जाती हैं। डीजीएमई पद पर आईएएस की नजर बहुत पहले से ही लगी है। साल 1995 में पहली बार आईएएस एसके खरे को इस पद पर बिठाया गया, लेकिन कोर्ट के आदेश पर उन्हें हटाना पड़ा था। बीच का वक्त कभी प्रधानाचार्यों का रहा, पर अब एक बार फिर आईआईएस काबिज है। हाल में कोरोना काल से आईएएस को कार्यवाहक महानिदेशक की जिम्मेदारी देने की शुरुआत की गई। जब प्रधानाचार्यों ने विरोध तेज किया, तो जून 2023 में कैबिनेट ने महानिदेशक पद की नियमावली बदल कर इस पद पर आईएएस की तैनाती की अनुमति दे दी और इसे 19 मई, 2021 से लागू माने जाने का शासनादेश जारी कर दिया गया। इस आदेश में यह प्रावधान था कि अगर प्रधानाचार्य न हो, तो सचिव स्तर के आईएएस को महानिदेशक बनाया जा सकता है। लेकिन अब योग्य प्रधानाचार्य होने के बावजूद सरकार महानिदेशक पद पर आईएएस को तैनात कर रही है।


हाईकोर्ट ने सरकार से इस मामले पर विचार करने को कहा है। उप मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक का कहना है कि महानिदेशक के पद पर आईएएस की तैनाती को कैबिनेट ने मंजूरी दी है। इसमें कुछ गलत नहीं है। नियमानुसार ही महानिदेशक के पद पर नियुक्ति की जा रही है। हाईकोर्ट के आदेश का अध्ययन किया जाएगा।


इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी ऐसी नियुक्ति पर आपत्ति जताई है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष कहते हैं कि विवाद जैसी कोई स्थिति नहीं है। डीजीएमई पद पर नियुक्ति शासन स्तर से की गई है। निदेशालय पूरी तत्परता से कार्य कर रहा है। चिकित्सा शिक्षक संघ के महासचिव प्रोफेसर संतोष कुमार का कहना है कि अन्य विभागों की तरह की प्रधानाचार्यों को अनिवार्य रूप से यह मौका दिया जाना चाहिए, वरना सभी प्रधानाचार्य जिस पद पर नियुक्त हुए, उसी पद से सेवानिवृत्त हो जाएंगे। इस बहस में आईएएस लॉबी की दलील है कि प्रशासन में व्यापक भूमिकाओं के कारण उन्हें कभी-कभी उन विभागों का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया जाता है, जिनमें तकनीकी कार्य शामिल होते हैं, जिससे 'तकनीकी पदों पर कब्जा' करने जैसा संदेश चला जाता है।  बहरहाल, इन बहसों का तब तक कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा, जब तक कि सरकार या अदालत कोई सर्वमान्य व्यावहारिक फैसला नहीं लेती, वरना चिकित्सा शिक्षा के डगमगाने का खतरा है।
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