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मुद्दा: विकसित भारत हरित भारत भी हो इसके लिए शुद्ध शून्य उत्सर्जन को देनी होगी प्रमुखता

डॉ. अरुणाभ घोष Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 04 Feb 2025 06:45 AM IST

सार

वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के प्रयासों के केंद्र में शुद्ध शून्य उत्सर्जन को रखना होगा।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : adobe stock


बीते साल मानसून में देश ने असम से लेकर बिहार, गुजरात से आंध्र प्रदेश तक विनाशकारी बाढ़ देखी। इससे पहले उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा था। साल 2025 के भी वैसा ही रहने की आशंका है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के एक अध्ययन के अनुसार, 75 प्रतिशत भारतीय जिले बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी चरम जलवायु घटनाओं के प्रमुख केंद्र हैं। जैसे-जैसे चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और सघनता में बढ़ोतरी हो रही है, उसे देखते हुए तत्काल सुभेद्यताओं के बारीक आकलन से लेकर मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन योजनाओं को विकसित करने की जरूरत है। हालांकि, देश के कुछ हिस्सों में इस पर काम शुरू हो गया है।


भारत की स्वच्छ ऊर्जा की कहानी सराहनीय है। गैर-जीवाश्म ऊर्जा की स्थापित क्षमता 205.5 गीगावाट (नवंबर 2024 तक) पहुंच चुकी है, जो कुल स्थापित क्षमता का लगभग 45 प्रतिशत है। हालांकि, कुल ऊर्जा मिश्रण में बड़ी परियोजनाओं पर आधारित अक्षय ऊर्जा क्षमता को अधिक मात्रा में जोड़ने के लिए नवाचारयुक्त पूर्वानुमान व ऊर्जा भंडारण, लचीलेपन और बाजार तंत्र की जरूरत होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में सोलर ड्रायर (फलों व सब्जियों को सुखाकर मूल्यवर्धन करने के लिए) और सोलर लूम जैसे विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा के लिए व्यापक अवसर मौजूद हैं। सीईईडब्ल्यू के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत में आजीविका को सशक्त बनाने वाली स्वच्छ ऊर्जा तकनीक के लिए 50 अरब डॉलर से ज्यादा का बाजार अवसर उपलब्ध है। ऊर्जा सुरक्षा निर्माण व परिवर्तन को गति देने के लिए भारत कम कार्बन उत्सर्जन वाली प्रौद्योगिकियों से जुड़ी सप्लाई चेन के स्वदेशीकरण और विविधीकरण लगातार पर ध्यान दे रहा है।


2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) में कार्बन उत्सर्जन घटाने पर नए सिरे से ध्यान देना चाहिए। सरकार को व्यापार, कौशल विकास और निर्यात लचीलेपन की सरलता के लिए एक डिजिटल एमएसएमई डाटाबेस बनाना चाहिए। इसके अलावा, भारत के इनोवेशन इकोसिस्टम को भी व्यापक प्रोत्साहन की जरूरत है। उत्सर्जन कटौती के लिहाज से सख्त माने जाने वाले क्षेत्रों (स्टील, सीमेंट, उर्वरक या एल्यूमीनियम जैसे भारी उद्योग) को डीकार्बनाइज करने के लिए शोध एवं विकास पर व्यय में प्रमुखता से वृद्धि की जानी चाहिए। इसमें ग्रीन हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन व स्टोरेज (सीसीयूएस) जैसी नई और उभरती प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।


उक्त परिवर्तनों को जमीन पर उतारने के लिए जरूरी है कि वित्तीय संसाधनों की कमी को अतिरिक्त, कम जोखिम, कम लागत और दीर्घावधि के वित्तपोषण के माध्यम से दूर किया जाए। सीईईडब्ल्यू के सेंटर फॉर एनर्जी फाइनेंस के 2021 के एक आकलन के अनुसार, भारत को 2070 तक अपना नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए 10,100 अरब डॉलर (2020 मूल्य पर) की जरूरत होगी। इतनी मात्रा में वित्तपोषण के लिए ग्रीन बॉन्ड, मिश्रित वित्तपोषण, प्रकृति संरक्षण कार्य के लिए ऋण की अदला-बदली और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान जैसे विभिन्न उभरते हुए वित्तपोषण उपायों व तंत्रों को अपनाने की जरूरत है।


कुल मिलाकर, विकसित भारत का अर्थ है कि सभी सहभागी एक विकासोन्मुखी, हरित और सतत भविष्य की दिशा में मिलकर आगे बढ़ें। इसमें स्थानीय कार्रवाइयों के लिए स्थानीय समुदाय व स्थानीय सरकारें और राज्यस्तरीय योजनाएं, ऊर्जा सुरक्षा के लिए केंद्र का नीति निर्माण, कार्बन उत्सर्जन कटौती के लिए निजी क्षेत्र की विस्तृत भूमिका और सतत निवेशों को गति देने व जोखिम घटाने के लिए रणनीतिक फिलैंथ्रॉपी शामिल है। एक बेहतर भविष्य का अनुमान करने का सबसे अच्छा उपाय उसे आकार देना है।  (लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के सीईओ हैं।)

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