वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में साहसिक कदम उठाए गए हैं और खपत के जरिये विकास को बढ़ावा देने के लिए मध्य वर्ग का बार-बार उल्लेख करने के साथ ही सरकार ने अपनी उम्मीदें निजी क्षेत्र पर टिका दी हैं। अब तक, भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए-3 सरकार ने विकास को गति देने के लिए सरकारी पूंजीगत व्यय में अपने विश्वास और संसाधनों का निवेश किया। लेकिन अब सरकार ने लोगों को अधिक धन उपलब्ध कराने के लिए राजकोषीय जेब ढीली कर दी है।
ऐसा लगता है कि सरकार में बैठे प्रचारकों ने अपना नजरिया बदल लिया है। निजी उपभोग को बढ़ावा देने के साधनों में कर दरों और संग्रह प्रक्रियाओं में बदलाव का दिलचस्प मिश्रण किया गया है। बजट में आयकर दरों में कटौती करते हुए सरकार ने 12 लाख रुपये तक की आय को कर-मुक्त कर दिया है (वेतनभोगी के लिए 12.75 लाख रुपये) और दरों में बदलाव करके एक अतिरिक्त स्लैब बनाया है, जिससे करदाताओं के हाथों में लगभग एक लाख रुपये तक की राशि बचेगी। इस कटौती से राजकोष पर करीब एक लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा और राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 प्रतिशत तक कम करने की महत्वाकांक्षी योजना पर कोई असर नहीं पड़ेगा। स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक से अधिशेष हस्तांतरण की उम्मीदें (2023-24 में 2.10 लाख करोड़ रुपये) इस अंतर को पाटेंगी।
खर्च करने के लिए धन की उपलब्धता और पहुंच में सुधार करने के लिए बजट ने संग्रह प्रक्रियाओं में बदलाव किया है और स्रोत पर कर कटौती की सीमा का विस्तार किया है। टीडीएस का उपयोग सरकारें अग्रिम कर वसूलने के लिए करती हैं, लेकिन इस बजट ने जनता को वर्ष के अंत तक आय बनाए रखने की अनुमति दी है। मैंने पहले भी सरकार को वरिष्ठ नागरिकों पर कर लगाने पर पुनर्विचार करने का तर्क दिया था, क्योंकि देश में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के 15 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं, जिनकी संख्या 2050 तक 35 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। ब्याज आय से गुजारा करने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए टीडीएस की सीमा 50,000 रुपये से बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी गई है, तथा सभी के लिए किराये से होने वाली आय पर टीडीएस 2.4 लाख रुपये से बढ़ाकर छह लाख रुपये कर दिया गया है।विकास का समीकरण सिर्फ करों में बदलाव पर निर्भर नहीं है।
आपूर्ति पक्ष पर पहल करते हुए सरकार ने कृषि के लिए ऋण का विस्तार किया है-7.7 करोड़ किसानों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा को तीन से बढ़ाकर पांच लाख रुपये किया है और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को ऋण देने का प्रावधान किया गया है। किसान क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर उद्यम क्रेडिट कार्ड एक नेक पहल है, क्योंकि कुछ अनुमानों के अनुसार, औपचारिक ऋण इस क्षेत्र के मात्र 20 प्रतिशत हिस्से को छूता है। बजट में उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत सूक्ष्म उद्यमों के लिए पांच लाख रुपये तक की सीमा वाले कस्टमाइज्ड क्रेडिट कार्ड का वादा किया गया है। हालांकि, सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक शासन नौकरशाही के जाल में फंसकर इसे कैसे आगे बढ़ाता है।
इस सप्ताह की शुरुआत में, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने आर्थिक सर्वेक्षण में स्पष्ट रूप से कहा कि विकास के लिए सरकार को उद्यमियों के ‘रास्ते से हट जाना’ चाहिए। इसके लिए बजट में सभी गैर-वित्तीय ‘विनियमों, प्रमाणन, लाइसेंस और अनुमतियों’ की समीक्षा करने की खातिर विनियामक सुधारों के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति के गठन की घोषणा की गई है। विनियामक कोलेस्ट्रॉल (बाध्यकारी बाधा) का बड़ा हिस्सा राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में है। उम्मीद है कि समिति के जनादेश में राज्य शामिल होंगे। इस बजट में बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं पर भी ध्यान दिया गया है, जिसे ट्रंप फैक्टर कहा जाता है। बजट में टैरिफ के स्तरों को स्पष्ट करने का वादा किया गया है, और महत्वपूर्ण इनपुट पर कई अधिभार और उपकर लगाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया गया है। इसने ट्रंप द्वारा घोषित टैरिफ के खतरे को दूर करने के लिए बातचीत का मार्ग तैयार किया है।
बजट में बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की घोषणा की गई है। सरकार ने परमाणु ऊर्जा अधिनियम और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम में संशोधन को आगे बढ़ाने का वादा किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने इस क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खुला रखा है। यह 20,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ डिजिटल बदलाव के लिए जरूरी छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के लिए मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ अमेरिका से परमाणु व्यापार के लिए दरवाजा खोलता है। बजट में इरादों और उद्देश्यों का दिलचस्प मिश्रण देखने को मिलता है।
सार्वजनिक पूंजीगत व्यय कार्यक्रम 11.2 लाख करोड़ रुपये पर स्थिर है (याद रखें, सरकार पिछली बार बजट में निर्धारित 11.11 लाख करोड़ रुपये में से लगभग एक लाख करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाई थी)। विशेष रूप से राज्यों में व्यवस्थागत कमियों की पहचान की गई है-यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इसे कैसे संबोधित करने की योजना बना रही है। बजट का गणित विकास पर सवाल उठाता है। इस साल, सरकार का व्यय 50.65 लाख करोड़ रुपये आंका गया है, जो केवल 3.5 लाख करोड़ रुपये अधिक है। भारत का विकास नौकरियों और आय सृजन के इरादे के क्रियान्वयन और घरेलू बाजारों के पुनरुद्धार के लिए जीएसटी दरों को युक्तिसंगत बनाने पर निर्भर करता है। बजट में विकास की आकांक्षा निजी खपत में उछाल की उम्मीद पर टिकी हुई है।