आज उसे पहले से कहीं अधिक उन्नत, विशाल और विविध ईरानी परमाणु कार्यक्रम का सामना करना पड़ रहा है, जो बेहद सुदृढ़ और कई अधिक जटिल चुनौतियों को भी समेटे हुए है। इन सबके बावजूद एक सफल इस्राइली अभियान न केवल एक गंभीर खतरे को बेअसर करने की ताकत रखता है, बल्कि पश्चिम एशिया के रणनीतिक परिदृश्य को नया आकार देने और क्षेत्र को अत्यधिक सुरक्षित बनाने की भी क्षमता रखता है। इस वक्त इस्राइल और अमेरिका के बीच एक दुर्लभ रणनीतिक सहयोग की संभावना है। पश्चिम एशिया में वर्षों से जो बदला लेने या जैसे को तैसा की भावना रही है, उसे कहीं अधिक प्रगतिवादी दृष्टिकोण में बदला जा सकता है : जो ईरान की घातक महत्वाकांक्षाओं और प्रयासों पर लगाम कसे, गाजा को स्थिर करे और सुरक्षा, एकीकरण और शांतिपूर्ण संबंधों पर आधारित एक नई पश्चिम एशियाई व्यवस्था की नींव भी रख सके।
1979 में इस्लामी क्रांति के बाद से ही ईरानी नेतृत्व ने इस्राइल की बर्बादी को अपनी विचारधारा का मुख्य आधार बना लिया है। क्रांति के संस्थापक अयातुल्ला रूहोल्ला खुमैनी ने इस्राइल को एक ‘कैंसरयुक्त ट्यूमर’ बताया था, जिसे हटाया जाना बहुत जरूरी है। उनके उत्तराधिकारी अयातुल्ला अली खामनेई ने उसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए एलान किया है कि 2040 तक इस्राइल का अस्तित्व मिटा देंगे। दशकों से दुनिया भर के विद्वानों और यहां तक कि सरकारी अधिकारियों ने इन धमकियों को खारिज किया है, लेकिन इस्राइल ने कभी भी ईरान की धमकियों को खोखला नहीं माना और इस बात पर जोर दिया कि वह ईरान के हर शब्द को गंभीरता से ले रहा है।
सात अक्तूबर, 2023 को हमास द्वारा इस्राइल पर किए गए हमले से पता चलता है कि ईरान अपने मुखौटों, मुख्य रूप से हमास और हिजबुल्ला के जरिये इस्राइल को नष्ट करने के अपने दीर्घकालिक दृष्टिकोण को वास्तविकता में बदलने की साजिश रच रहा था। गाजा में जब्त दस्तावेजों से पता चलता है कि हमास को भरोसा था कि उसे ईरान और हिजबुल्ला का समर्थन प्राप्त है, जो एक व्यापक योजना का हिस्सा है: इसलिए उसने इस्राइल को दबाने और नष्ट करने के इरादे से एक बहुपक्षीय आक्रमण किया था। हमास नेता याह्या सिनवार ने संभवतः योजना के उजागर हो जाने के डर से और यह भरोसा करते हुए कि ईरान का संपूर्ण प्रतिरोध समूह शीघ्र ही इसमें शामिल हो जाएगा, समय से पहले ही हमला शुरू कर दिया था। पिछले कुछ दशकों में इस्राइल के विनाश के प्रति ईरान की वैचारिक प्रतिबद्धता, इसके तेजी से बढ़ते सैन्य निर्माण, परमाणु कार्यक्रम के विस्तार और क्षेत्रीय मुखौटों को हथियार मुहैया कराने की प्रवृत्ति ने ईरान को इस्राइल के लिए सबसे बड़ा खतरा बना दिया है।
इस्राइल ने दशकों की खुफिया जानकारी जुटाकर और ईरान के मंसूबों को भांपने के बाद ही 13 जून को ईरान के परमाणु कार्यक्रम और वैज्ञानिकों, सैन्य नेतृत्व, बैलिस्टिक मिसाइलों और उन संगठनों के वरिष्ठ अधिकारियों को निशाना बनाकर हमले शुरू किए, जो इस्राइल पर छद्म हमलों को बढ़ावा देने में मदद करते थे। महज कुछ दिनों में इस्राइल ने ईरानी हवाई क्षेत्र के ज्यादातर हिस्से में परिचालनात्मक स्वतंत्रता हासिल कर ली-एक ऐसी उपलब्धि, जो उसे 1973 में योम किप्पुर युद्ध के चरमोत्कर्ष के दौरान भी अपने दुश्मनों के खिलाफ हासिल नहीं हुई थी। ईरान की सघन हवाई सुरक्षा को निष्प्रभावी करने से इस्राइली वायु सेना को विशेषकर तेहरान और प्रमुख परमाणु एवं मिसाइल स्थलों के आसपास और अन्य सैन्य लक्ष्यों पर बार-बार सटीक हमले करने में मदद मिली। राइजिंग लॉयन नामक यह अभियान ठीक उसी वक्त शुरू किया गया, जब ईरान अपनी परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को उस स्तर तक बढ़ा रहा था, जहां उन्हें तत्काल रोकना बेहद मुश्किल और खर्चीला हो जाता।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निदेशक स्पष्ट रूप से अनुमान नहीं लगा पाए थे कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन इस्राइली खुफिया एजेंसियों को इसकी पुख्ता जानकारी लग चुकी थी कि ईरान के यूरेनियम भंडार में तेजी से वृद्धि हो रही है और इसके समानांतर ही वह अपने मिसाइल और ड्रोन शस्त्रागार का काफी विस्तार और बैलिस्टिक परिसंपत्तियों को किलेबंद भूमिगत सुविधाओं में स्थानांतरित करने में तेजी ला रहा था।
लेबनान और गाजा में ईरान के छद्म लड़ाकों को बड़े स्तर पर परास्त करने के बाद ईरान में शुरू किया गया यह अभियान यरुशलम और वाशिंगटन में निर्णयकर्ताओं को सैन्य कार्रवाई को एक व्यापक कूटनीतिक पहल में बदलने का आधार प्रदान करता है, जिसका उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वापस लेने और उसके प्रॉक्सी नेटवर्क को कमजोर करने के साथ ही अमेरिका के क्षेत्रीय भागीदारों के लिए खतरों को कम करना है। हालांकि, अमेरिका ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों पर भारी बम गिराकर उसकी परमाणु हथियार बनाने की महत्वाकांक्षा को लगभग नष्ट कर दिया है।
इस्राइल को अब ईरान और हिजबुल्लाह के खिलाफ अपनी उपलब्धियों को व्यापक रणनीतिक ढांचे में रखना होगा। इस्राइली सरकार को गाजा में युद्ध को समाप्त कर सभी बंधकों की रिहाई सुनिश्चित करनी चाहिए और गाजा पट्टी में एक नए शासन ढांचे के लिए मिस्र-अरब पहल का समर्थन करना चाहिए-जो विसैन्यीकरण के साथ क्रमिक पुनर्निर्माण की शर्त रखती है। एक सुधरी और मजबूत फलस्तीनी अथॉरिटी को अंततः गाजा के शासन में भाग लेने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। ऐसा करने से इस्राइल सामान्यीकरण समझौतों और व्यापक क्षेत्रीय एकीकरण को मॉडल के लिए आधार तैयार करेगा। यह उभरता हुआ फ्रेमवर्क चरमपंथी ताकतों के खिलाफ एक स्थायी प्रतिसंतुलन पैदा करेगा और एक अधिक स्थिर, सुरक्षित और संभावनापूर्ण क्षेत्रीय व्यवस्था के द्वार खोलेगा।