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क्या प्रश्न ही राजनीतिक उत्तर है

शंकर अय्यर
Updated Mon, 24 Dec 2018 07:09 PM IST
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सोशल मीडिया

सोशल मीडिया की चमत्कारिक और अनौपचारिक विशेषताओं में से एक यह है कि इसे समझना लगभग असंभव है कि यह समाज में विमर्श का कारण है या इसका नतीजा। तार्किक रूप से यह थोड़ा-थोड़ा दोनों है और इसके गुणक प्रभाव के कारण समाज के वर्गों में विचारों का शोर है। सुनकर बोलने के बजाय अब संसद व समाज में बिना सुने बोलने का सामाजिक मानदंड बन गया है और सोशल मीडिया पर इसे बिना सोचे साझा किया जा रहा है। राजनीतिक विमर्श में बिना जाने-समझे राय देने का प्रचलन हो गया है। अब रोजगार के ही मुद्दे को ले लीजिए। तथ्य यह है कि 2.5 करोड़ लोगों (ऑस्ट्रेलिया की आबादी से ज्यादा) ने रेलवे की 90,000 नौकरियों के लिए आवेदन किया, जो रोजगार संकट की भयावहता दर्शाता है। स्थानीय लोगों के लिए इसमें आरक्षण होना चाहिए या नहीं, यह एक राजनीतिक सवाल है और इस संदर्भ में इसका उत्तर परिवर्तनशील है। विमर्श 'क्यों' पर होना चाहिए, लेकिन उसे 'कौन' के नारे से अपहृत किया जा रहा है।



बीते हफ्ते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि निवेशकों को आर्थिक प्रोत्साहन इस शर्त पर दिया जाएगा कि वे 70 फीसदी नौकरी स्थानीय लोगों को देंगे, क्योंकि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग ज्यादातर नौकरियां लपक लेते हैं। इस बयान से ऑनलाइन और ऑफलाइन नाराजगी फैल गई। कमलनाथ राजनीति में ठाकरे की लाइन को लागू करने वाले पहले मुख्यमंत्री शायद ही हों।


कई राज्यों में भूमिपुत्र को नौकरी की शर्त एक पसंदीदा चुनावी राजनीतिक विकल्प है। फरवरी, 2018 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की कि सभी नए उद्योगों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 80 प्रतिशत कर्मचारी स्थानीय हों। सितंबर, 2018 में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने घोषणा की कि स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से 80 फीसदी नौकरी देने के लिए राज्य में एक प्रस्ताव पारित किया जाएगा।


कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों में स्थानीय लोगों के लिए 95 फीसदी नौकरियों की मांग की जा रही है। विदेशों में काम करने वाले लोगों से 80 अरब डॉलर रेमिटेंस प्राप्त करने वाले देश के नेताओं और सरकारों को संवेदनशील होकर सोचना होगा। हालांकि ऐसा नहीं है। दिल्ली समेत लगभग हरेक राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को नौकरी छीनने का दोष देते हैं। शिवसेना ने तो इन राज्यों के अभ्यर्थियों का पीछा किया और पीटा भी था।

 

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जिसने देश को नौ प्रधानमंत्री दिए, जिसमें पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी शामिल हैं। यहां से लोकसभा के लिए 80 और राज्यसभा के लिए 31 सांसद चुने जाते हैं तथा राज्य विधानसभा में 400 से ज्यादा विधायक हैं। लेकिन क्या यहां के चुने हुए प्रतिनिधि लोगों और उनके मुद्दों का प्रतिनिधित्व करते हैं?


उत्तर प्रदेश और बिहार के राजनेताओं का विरोध करना स्वाभाविक है। यह चकित करने वाला सवाल है कि उत्तर प्रदेश और बिहार रोजगार सृजन में क्यों पिछड़ गए। लेकिन नाराजगी में यह सवाल गायब रहता है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2003-04 में प्रति व्यक्ति आय उत्तर प्रदेश में 11,458 रुपये, जबकि नवसृजित राज्य उत्तराखंड में 20,312 रुपये थी। 2017-18 में उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय 1,73,820 रुपये है, जबकि उत्तर प्रदेश की 55,339 रुपये है, जो राष्ट्रीय औसत (1,12,835 रुपये) के आधे से भी कम है।

 

अब ग्रामीण संकट की बात करें, जिस पर इस हफ्ते जोशपूर्ण बहस छिड़ी थी। यह किसानों के लिए राष्ट्रीय ऋण माफी की संभावना से उपजी है। आम तौर पर यह बहस दो लाइनों पर विभाजित है। कर्ज माफी, उच्च समर्थन मूल्य और आय समर्थन विचार के खिलाफ बात करने वाले लोग राजकोषीय घाटे और बैंकिंग व्यवस्था पर पड़ने वाले इनके प्रतिकूल प्रभाव का हवाला देते हैं। वे उद्योगों को प्रोत्साहन देने का समर्थन करते हैं, पर किसानों को सब्सिडी देने के विरोधी हैं। वे दस लाख करोड़ रुपये के बुरे कर्ज को उचित ठहराने के लिए हस्तक्षेप करते हैं। कर्ज माफी समस्या का समाधान नहीं है, इस पर सभी सहमत हैं, पर बहस भी समस्या का समाधान नहीं है।
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इस पर विचार नहीं होता कि क्यों राज्य-दर-राज्य और सरकार-दर-सरकार इस भीषण संकट का हल करने के बजाय शॉर्टकट अपनाते हैं। आखिरकार 49 फीसदी कार्यबल 15 फीसदी राष्ट्रीय आय पर जीती है, यानी 151.82 लाख करोड़ रुपये में से 22.77 लाख करोड़ रुपये पर। यह नौ फीसदी विकास दर की आकांक्षा के लिए अपर्याप्त है। जिस सवाल पर बहस करने की जरूरत है, वह यह कि जब ज्यादातर सांसद खुद को किसान कहते हैं, तो कृषि क्षेत्र में ऐसा संकट क्यों है? 4,000 से ज्यादा विधायक राज्यों में कृषि से संबंधित मुद्दों पर कितना समय देते हैं? एपीएमसी का विघटन, पट्टा समझौतों की शुरुआत या अनुबंध खेती जैसे सुधारों का राज्यों द्वारा विरोध क्यों किया जाता है?


अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में मई, 2017 में नीति आयोग ने 208 पृष्ठों का एक त्रिवर्षीय ऐक्शन एजेंडा जारी किया था। यह मालूम नहीं कि उस एजेंडे का क्या हुआ। इस हफ्ते नीति आयोग ने स्ट्रेटजी फॉर इंडिया @ 75 पेश की है। मुख्य रूप से उसमें यह आकांक्षा जताई गई है कि वर्ष 2022 तक भारत की अर्थव्यवस्था चालीस खरब डॉलर की हो जाएगी। यह विकास के लिए बचत और निवेश बढ़ाने की जरूरत को सूचीबद्ध करता है, पर रणनीति गायब है।


ये उदाहरण सार्वजनिक बहस में व्यापक तस्वीर के अभाव को दर्शाते हैं। मसलन, सरकार द्वारा अब किसी भी कंप्यूटर का डाटा खंगालने के लिए दस एजेंसियों को अधिकृत करने के आदेश के मुद्दे को ही लीजिए। बहस इस पर नहीं थी कि नागरिकों की निजता के गोपनीयता के लिए इसका क्या मतलब है, बल्कि इस बात पर केंद्रित थी कि इसके लिए किसे दोषी बताया जाए। नोबेलजयी हर्बर्ट सिमोन का कहना है कि जो पीढ़ी बयानबाजी में धनी होती है, वह कार्रवाई और ध्यान केंद्रित करने के मामले में निर्धन होती है।

 

-लेखक आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के विजिटिंग फेलो हैं।

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