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बड़ी ताकतों का टकराव: क्या नैतिकता संग राजनीति असंभव है? 'यह दुनिया सभी की है' यह भरोसा बहाल करना समय की जरूरत

नंदितेश निलय, स्पीकर, लेखक और एथिक्स प्रशिक्षक Published by: शुभम कुमार Updated Fri, 25 Oct 2024 05:22 AM IST

सार

कौन फलस्तीन को समझाए, कौन इस्राइल को रोके, कौन पुतिन को बताए कि युद्ध अनवरत नहीं चलते, कौन जेलेंस्की से यह पूछे कि आम जनता को युद्ध में लगातार झोंके रहना कौन-सी नैतिक राजनीति है? संयुक्त राष्ट्र मौन है और देश सिर्फ हथियार खरीदने-बेचने में लगे हैं।
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प्रतीकात्मक - फोटो : अमर उजाला


इसे समझने के लिए चलिए, कुछेक साल पीछे लौटकर याद करते हैं अपना ही वह चेहरा, जो मास्क से ऐसे ढका रहता था, मानो मास्क ही असली इन्सानी चेहरा हो और सभी के द्वारा स्वीकार्य भी। न कोई हिंदू-मुस्लिम नजर आता था और न रंग का भेदभाव। संसार की राजनीति पहली बार राज के भाव से मुक्त होकर नीति की ओर मुड़ चली थी। सभी जीना चाहते थे, लेकिन इस शर्त पर कि दूसरा भी जिए और वह दूसरा इस दुनिया में सभी के लिए, सभी के द्वारा और सभी का था। राजनेता मौन थे, पर उनकी खामोशी में कोई डिप्लोमेटिक संदेश या चुनावी वादे नहीं गढ़े जा रहे थे, बल्कि गढ़ा जा रहा था उस मूल्य और नैतिकता को, जो उस राजनेता और राजनीति को झूठ और अविश्वास की दीवारों से मुक्त कर यह यकीन दिला चुका था कि राजनीति और नैतिकता में कोई विरोधाभास नहीं होता। महामारी के समय राजनीति का एकमात्र लक्ष्य दुनिया को बचाना था।


नैतिकता और राजनीति का साथ

लेकिन क्या पोस्ट-कोविड दुनिया फिर से उस अस्वीकृति की ओर बढ़ चुकी है, जहां नैतिकता और राजनीति का लगातार साथ रहना कुछ असंभव-सा हो गया है। क्या हम यह मानें कि पोस्ट-कोविड दुनिया की राजनीति नैतिकता के आयाम को कोई आदर्शवादी संकल्पना नहीं मानेगी और न ही प्रजातंत्र के अंतिम व्यक्ति को भी यह मानने देगी कि नैतिकता और राजनीति कोई अव्यावहारिक समाज जैसा नहीं होता, बल्कि यह वही समाज होता है, जिसकी चाह में पहले राजा भेष बदल कर जाते थे। अंतिम व्यक्ति 1947 के बाद स्वराज का वास्तविक अर्थ ढूंढ रहा है और हर बार यह यकीन करता है कि प्रजातंत्र में शक्ति आखिरकार उसके ही पास है और वह हर पांच साल बाद उस शक्ति को बैलेट बॉक्स में ढूंढता है।


बर्ट्रेंट रसले की वो किताब

बर्ट्रेंट रसेल ह्यूमन सोसाइटी इन एथिक्स एंड पॉलिटिक्स में लिखते हैं, ‘नैतिकतावादी केवल इंद्रियों के प्रलोभनों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और सत्ता के प्रलोभन को पूरी तरह से अनदेखा करते हैं, जिसके वे हमेशा शिकार बन जाते हैं। रसेल तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका को लेकर चिंतित हैं, जिसका होना उनके लिए भी लगभग तय ही था। ऐसी परिस्थिति में एक लीडर की भूमिका सर्वोपरि हो जाती है। कौन फलस्तीन को समझाए, कौन इस्राइल को रोके, कौन पुतिन को बताए कि युद्ध अनवरत नहीं चलते, कौन जेलेंस्की से यह पूछे कि आम जनता को युद्ध में लगातार झोंके रहना कौन-सी नैतिक राजनीति है? संयुक्त राष्ट्र मौन है और देश सिर्फ हथियार खरीदने और बेचने में लगे हैं।


क्या है नैतिकता का आलम

नैतिकता का तो आलम यह है कि कभी दल की आस्था देश की आस्था से भी बड़ी हो जाती है और कभी प्रभुत्व करने की ललक दल-बदल करने में कोई भी द्वंद्व नहीं पैदा होने देती। और इस दल-बदल को लेकर कोई आत्मग्लानि भी नहीं होती और जानता के विश्वास को तोड़ने जैसा भाव भी पैदा नहीं होता। आखिरकार, जनता कैसे बताए कि भरोसे को तोड़ना राजनीतिक संभावनाओं की परिधि में नहीं आता। सबको शक्ति चाहिए और राजनीति नैतिकता का नहीं, बल्कि शक्ति और प्रभुत्व का प्रतीक बनती जा रही है। और फिर ऐसी परिस्थिति में किसी लाल बहादुर शास्त्री, किसी महात्मा गांधी, किसी मार्टिन लूथर किंग, किसी विवेकानंद, किसी आंबेडकर, किसी भगत सिंह, किसी जयप्रकाश, किसी अब्दुल कलाम को आना पड़ता है, सिर्फ उस विश्वास की रक्षा करने के लिए कि राजनीति नैतिकता को जनता से जोड़े रखती हैं।


मार्कस हॉल्डो का शोध

मार्कस हॉल्डो अपने शोध पत्र हाउ कैन वी ट्रस्ट अवर लीडर में लिखते हैं, ‘नागरिक राजनीति और सार्वजनिक क्षेत्र में नेताओं पर भरोसा कर सकते हैं, यदि वे ईमानदार और सच्चे हैं, क्योंकि यही लोकतंत्र को काम करने में मदद करता है। यानी एक अच्छा नेता वह व्यक्ति है, जिसके पास सद्गुण हैं, जो मूल्यों के साथ चलता है और वह व्यक्ति, जो युद्ध के बजाय शांति को बढ़ावा देता है। अगर ग्लोबल वार्मिंग, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, आतंकवाद, अर्थव्यवस्था, अशिक्षा, भूख के संकट हर जगह मंडरा रहे हों, तो अरस्तु के अनुसार, एक अच्छा नेता कोई और नहीं, बल्कि एक अनुयायी होता है, जो अनुसरण करता है अपनी जनता की जरूरतों और इच्छाओं का।


मेटा और ब्लू टिक पर ज्यादा फोकस

आधुनिक दुनिया में अनुसरण शब्द केवल मेटा और उन ब्लू टिक के आसपास दिखाई देता है। लेकिन आज उन आत्म-संदर्भित पहलुओं और ब्लू टिक ने वह जगह नहीं बनाई, जहां एक आम आदमी के दर्द और दुर्दशा की उन सूक्ष्म और स्थूल छवियों को पर्याप्त जगह मिल सके और उनकी गिनती हो सके। एक अच्छा नेता अपने पदचिह्नों से राजनीति और नैतिकता का एक साथ चलना संभव कर सकता है। आज भी कुछेक ऐसे लीडर हैं, जो अपनी विनम्रता और ज्ञान से सभी पार्टियों और जन समाज में स्वीकार्य हैं और राजनीति को स्वस्थ करना भी चाहते हैं।  
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चलिए पहले इस उदाहरण को समझिए

राजीव गांधी चुप रहकर अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज के लिए अमेरिका भेजते हैं, लाल बहादुर शास्त्री रेल दुर्घटना से व्यथित होकर नेहरू के मना करने के बावजूद इस्तीफा देते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी एक वोट की कमी से प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ना पसंद करते हैं, लेकिन राजनीतिक संभावनाओं को नहीं तलाशते, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शांति का पैगाम लिए अमेरिकी वर्चस्व के बावजूद अपने मित्र देश रूस को नहीं छोड़ते तथा युद्ध के बीच जेलेंस्की से मिलने से भी नहीं चूकते।


आज की दुनिया का सच

आज जरूरत है उस भरोसे की कि यह दुनिया सभी की है और अपने देश और दुनिया के प्रति निष्ठा रखना भी इन्सानी इकबाल ही है। गर दुनिया का नेतृत्व राजनीति और नैतिकता को एक अच्छी दुनिया का साथी माने और अपने देश को मानवीयता के भाव में रखना चाहे, तो फिर पृथ्वी मनुष्य की नैतिकता के लिए स्वर्ग बन जाएगी और फिर फिरदौस की आवाज कुछ यों प्रतिध्वनित होगी गर फिरदौस बर रूए जमीं अस्त, हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं।
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