इकतालीस साल पहले अक्तूबर के महीने में ही अरब देशों ने तेल का निर्यात रोक दिया था। इस प्रतिबंध में शामिल देश ओपेक के सदस्य थे, जिसका गठन अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों के साथ सौदेबाजी की अपनी क्षमता मजबूत करने के लिए इन देशों ने किया था। प्रतिबंध से अमेरिका में पेट्रो पदार्थों की जबर्दस्त किल्लत हो गई। और जब यह प्रतिबंध खत्म हुआ, तब तक तेल की कीमत तीन डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 12 डॉलर प्रति बैरल हो चुकी थी।
पेट्रो पदार्थों की कीमतें स्वयं बढ़ने से अधिक महत्वपूर्ण था नई वैश्विक व्यवस्था को समझना, जो प्रतिबंध की वजह से उपजी थी। फॉरेन पॉलिसी नामक वैश्विक पत्रिका में लिखे अपने लेख में एमी मायर्स जैफी और एड मोर्स कहते हैं, प्रतिबंध 'असल में ऐसी भू-राजनीतिक परिस्थितियों में लगाया गया, जिसमें ओपेक को वैश्विक तेल उत्पादन करने और विशाल अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों से मूल्य निर्धारण करने का अधिकार मिल गया। नतीजतन अत्यधिक तेल कीमतों वाले युग की शुरुआत हुई।' द एंड ऑफ ओपेक शीर्षक से प्रकाशित लेख में जैफी और मोर्स ने लिखा है कि अगर अमेरिका अपने पत्ते सही जगह फेंकता है, तो ओपेक का प्रभुत्व खत्म किया जा सकता है। मगर लगता है कि वह दिन समय से पहले आ गया है।
मोर्स और जैफी ने पिछले वर्ष जब वह लेख लिखा था, तब तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक थी। आज यह 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। यह कीमत ओपेक सदस्य देशों के लिए अपर्याप्त है। अपनी बजटीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक कीमतों पर तेल बेचना वेनेजुएला की जरूरत है। अरब स्प्रिंग ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे ओपेक सदस्यों को भी मजबूर किया है कि वे अपनी जनता को 'शांत' रखने के लिए बजट खर्च बढ़ाएं।
ज्यादा वक्त नहीं बीता है, जब वेनेजुएला ने उत्पादन घटाने के लिए ओपेक की आपात बैठक का आग्रह किया था। इराक ने उस बैठक को गैरजरूरी बताया था, जबकि सऊदी अरब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह तेल बाजार में अपनी हिस्सेदारी खोना नहीं चाहता, लिहाजा ओपेक सदस्यों की जरूरतों की परवाह किए बिना तेल का निर्यात करता रहेगा। ओपेक की अगली बैठक में इसकी संभावना कम है कि इस संदर्भ में कोई समझौता हो सकेगा।
आखिर ओपेक इन झंझावातों में कैसे फंस गया? जवाब स्पष्ट है, मांग से ज्यादा जरूरी है तेल का अनवरत निर्यात होना, और ओपेक ने तेल निर्यात को नियंत्रित करने की अपनी क्षमता खो दी है। इसकी एक वजह वैश्विक मांग में कमी भी है। चीन की अर्थव्यवस्था सुस्त हो गई है, जबकि जापान प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा पर अपनी निर्भरता बढ़ा रहा है। लेकिन इस परिस्थिति की एक मुख्य वजह उत्तर अमेरिका की 'शेल रिवोल्यूशन' (शेल से निकलने वाली गैस) भी है, जिसने मांग और आपूर्ति का पूरा ढांचा ही बदल दिया है। अनुमान है कि शेल क्रांति की वजह से अगले कुछ वर्षों में रूस और सऊदी अरब को पछाड़कर अमेरिका दुनिया का सबसे ज्यादा तेल उत्पादन करने वाला देश बन जाएगा। ऐसे में मोर्स के इन शब्दों पर गौर करना समीचीन है कि, हम शुक्रिया कहें शेल क्रांति का, जिसने ओपेक को अब कागजी शेर बना दिया है।