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घिर रहा है इस्राइल!

Fri, 07 Feb 2014 07:02 PM IST
थॉमस एल फ्रीडमैन
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ताज्जुब की बात है कि काफी समय से पश्चिमी तट पर तीसरे फलस्तीनी इंतिफदा (विद्रोह) की घटना देखने में नहीं आई है। ऐसे पहले विद्रोह ने जहां ओस्लो शांति समझौते के लिए राह बनाई थी, वहीं दूसरा विद्रोह इस्राइल की तरफ से भारी गोलाबारी और फलस्तीनी फिदाइन दस्तों की कार्रवाइयों के चलते ओस्लो समझौते के भंग होने का गवाह बना।
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इस पर फलस्तीनियों की ओर से तमाम रोचक तर्क भी सुनने को मिले। मसलन, बताया गया कि वे बेहद गरीब, थके और विभाजित समाज हैं। या उन्हें एहसास है कि इन विद्रोहों (खासकर दूसरे) से उन्हें नुकसान ही ज्यादा उठाना पड़ा है। पर हालात देखकर लगता है कि तीसरा इंतिफदा अब दूर नहीं है। पत्थरों या आत्महंता दस्तों के जरिये होने वाले इंतिफदा से निपटना इस्राइल को आता है, पर उसे डर अहिंसक प्रतिरोध और आर्थिक बहिष्कार का है। और आशंका है कि यही दोनों तीसरे इंतिफदा के हथियार बनने जा रहे हैं।

लेकिन इस तीसरे इंतिफदा की डोर रामल्ला में फलस्तीनियों के हाथों में न होकर यूरोपीय संघ और पश्चिमी तट पर इस्राइली कब्जे के विरोधी देशों के हाथों में होगी। इस इंतिफदा की शुरुआत चाहे कहीं से भी हो, लेकिन लगता है कि बदली हुई स्थिति में इस्राइल के साथ बातचीत फलस्तीन के लिए फायदेमंद साबित होने जा रही है।
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हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने इस्राइल को सार्वजनिक तौर पर चेतावनी दी थी कि यदि शांति वार्ता विफल रही, तो उसके सामने बहिष्कार और वैधता का संकट खड़ा हो सकता है। इससे खफा होकर इस्राइल ने भी खुलेआम केरी के खिलाफ रोष जताया था। लेकिन इस मामले में केरी का पक्ष सही है। इस्राइल के वित्त मंत्री येर लैपिड भी कह चुके हैं कि अगर इस्राइल और फलस्तीन को दो स्वतंत्र राज्य बनाने पर समझौते नहीं हो पाया, तो हर इस्राइली की जेब पर बोझ बढ़ेगा।

दरअसल, इस्राइल की अर्थव्यवस्था यूरोप को होने वाले तकनीक और कृषिगत निर्यात पर निर्भर है। इसके अलावा यहां के हाई टेक उद्योगों में यूरोप का भारी-भरकम निवेश भी है। इस्राइल का अगर आंशिक बहिष्कार भी होता है, तो यूरोपीय निर्यात 20 फीसदी घट जाएगा। इससे इस्राइल को सालाना पांच अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान होने की आशंका है। इसके अलावा इस्राइल में काम करने वाले हजारों लोगों की नौकरियां भी छिन जाएंगी। इसीलिए वह कहते हैं, 'इस्राइल की नीतियां धमकियों से प्रभावित होने वाली नहीं। पर इसका मतलब इस तरह की टिप्पणियां करना भी नहीं हैं कि इन धमकियों में कोई दम नहीं है या इनका कोई वजूद नहीं है।'

हाल ही में इस्राइली अखबार हार्रेज की एक खबर सुर्खियों में रही। इसमें कहा गया कि पेंशन फंड का प्रबंधन करने वाली नीदरलैंड की सबसे बड़ी कंपनी पीजीजीएम ने पांच सबसे बड़े इस्राइली बैंकों में अपने सारे निवेशों से हाथ खींच लिए हैं। इसकी वजह यह है कि इन बैंकों की पश्चिमी तट पर शाखाएं हैं। वहीं यरूशलम पोस्ट अखबार लिखता है कि डेनमार्क के सबसे बड़े बैंक ने कानूनी और नैतिक वजहों से इस्राइल के सबसे बड़े बैंक 'हेपोलिम' का बहिष्कार कर दिया है।

मेरे ख्याल से इस तीसरे इंतिफदा के नतीजे दूरगामी होंगे। इसकी वजह है कि पहले दो इंतिफदा के विपरीत यह फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के प्रस्ताव के अनुरूप है, जिसमें उन्होंने 1967 के फॉर्मूले के अनुरूप, चरणबद्ध ढंग से अपनी सेना को वापस बुलाने के लिए इस्राइल को पांच वर्ष की मोहलत दी थी। उसके बाद इस्राइल के लिए पैदा होने वाले फलस्तीनी खतरे को दूर करने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में नाटो सेना वहां मोर्चा संभालेगी।

यह तीसरा इंतिफदा इस्राइल को रणनीतिक तौर पर सुरक्षित, लेकिन नैतिक तौर पर असुरक्षित करेगा। पहले दोनों इंतिफदा की नाकामयाबी की वजह यह थी कि उनमें इस्राइल और फलस्तीन को अलग-अलग राज्य बनाने और सुरक्षा बंदोबस्तों का खाका नहीं खींचा गया था। वे महज अवैध कब्जे के खिलाफ लोगों के स्वतःस्फूर्त विरोध के प्रतीक थे। दरअसल रणनीतिक तौर पर असुरक्षित और नैतिक दृष्टि से सुरक्षित एहसास कराकर इस्राइल को परेशान नहीं किया जा सकता। यह तथ्य न समझ पाने की वजह से ही हमास को बार-बार मुंह की खानी पड़ती है।

नेल्सन मंडेला और ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के रूप में दो बड़े वैश्विक नेताओं के परिदृश्य से हटने की वजह से भी तीसरे इंतिफदा को ताकत मिल रही है। अहमदीनेजाद इस्राइल के लिए मुसीबत थे। पर उनकी जगह लेने वाले हसन रोहानी को संभालना इस्राइल के लिए ज्यादा कठिन साबित हो रहा है। हां, मंडेला के निधन के बाद उनके अनुयायियों में उनकी परंपरा जारी रखने की इच्छा जरूर है। जबकि इस्राइल समझता है कि कुछ लोग मंडेला के समर्थन की आड़ में यहूदियों के खिलाफ माहौल तैयार कर रहे हैं।

अगर इस्राइल अपने खिलाफ चलाए जा रहे बहिष्कार अभियान को रोकना चाहता है, तो उसे यह घोषणा करनी होगी कि जब तक केरी समझौते की कोशिशें कर रहे हैं और उनके कामयाब होने की जरा भी उम्मीद बाकी है, तब तक वह अपनी तरफ से अवरोध पैदा नहीं करेगा। हालांकि ऐसी पहल की उम्मीद कम ही है। पर केरी को लेकर इस्राइली मंत्रियों ने जो रवैया अपनाया है और फलस्तीनियों पर लगाम कसने को लेकर उनकी जो मांग है, उससे यूरोप या अमेरिका में इस्राइल के हितैषियों की संख्या नहीं बढ़ेगी, यह तय है। इससे केवल उसके खिलाफ चल रहा बहिष्कार अभियान और मजबूत ही होगा।
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