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सांविधानिक पदों से गैरजिम्मेदार बयान

Mon, 17 Nov 2014 08:02 PM IST
शंभूनाथ शुक्ल
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कश्मीर में पीडीपी के एक विधायक हैं, पीरजादा मंजूर हुसैन। हुसैन साहब ने अनंतनाग जिले में एक चुनावी सभा में कहा कि किसी हिंदू को मुख्यमंत्री बनाने के प्रयासों को सफल न होने दें। दूसरी तरफ बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने बेतिया की एक जनसभा में कहा कि सभी ऊंची जातियां विदेशी हैं और वे सीधे आर्य नस्ल से जुड़ी हैं। दोनों ही नेता सांविधानिक पद पर हैं और हमारा संविधान ऐसे किसी भी बयान को असांविधानिक और दंडनीय मानता है, जिससे जातिगत या नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा मिलता हो। अब इन दोनों (विधायक व मुख्यमंत्री) की पार्टियों के आला और समझदार नेता कह रहे हैं कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है, पार्टी लाइन नहीं।
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सवाल उठता है कि जो लोग सांविधानिक पदों पर हैं, क्या वे सार्वजनिक तौर पर इस तरह की कोई व्यक्तिगत राय रख सकते हैं। और अगर ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं, तो जाहिर है कि ये नेता कभी भी नस्लीय और जातिगत भावनाएं भड़का सकते हैं। इसलिए ऐसे नेताओं से सतर्क रहना चाहिए, न कि उन्हें ऐसे विचार प्रकट करने देना चाहिए।

ऐसे विवादास्पद बयान जीतन राम मांझी एक नहीं, अनेक बार दे चुके हैं और लगातार कह रहे हैं कि सिर्फ दलित व आदिवासी ही मूल रूप से यहां के निवासी हैं। दलित चिंतक और संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अंबेडकर मानते थे कि भारत में दलित जातियां कालांतर में नीचे की श्रेणी में रख दी गईं। वह यह भी मानते थे कि हर राज्य और स्थान में जातियों की स्थिति भिन्न-भिन्न है। मसलन, उनके अनुसार उत्तर प्रदेश और गंगा-जमना के मैदानी इलाकों के ब्राह्मण महाराष्ट्र के ब्राह्मणों की तुलना में कमतर हैं। बाद में जब पिछड़ा वर्ग आयोग बना, तो उसके अध्यक्ष काका कालेलकर ने पंजाब के ब्राह्मणों को पिछड़ा माना था। खुद मंडल आयोग ने बहुतेरी उन जातियों को पिछड़े वर्ग की श्रेणी में रखा है, जो खुद को ब्राह्मण बताती हैं। गंगा पुत्र पंडों से लेकर भाट, ब्राह्मण व गुसाईं जातियां इसी श्रेणी में हैं। ऐसे में जीतन राम मांझी कैसे यह तय करेंगे कि अमुक जाति ऊंची है और अमुक निचली?
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पीडीपी के विधायक पीरजादा मंजूर हुसैन के मुताबिक, कश्मीर एक संवेदनशील राज्य है और वहां पर किसी हिंदू को मुख्यमंत्री बनाना सूबे के हितों के विरुद्ध होगा। खुद को धर्मनिरपेक्ष और जनकल्याण में लगी होने का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टी का एक विधायक इस तरह का भेदभावपूर्ण बयान कैसे दे सकता है? अगर उन्हीं की बातों को पैमाना मान लिया जाए, तो क्या मंजूर हुसैन साहब यह बताएंगे कि फिर डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और डॉ. कलाम राष्ट्रपति कैसे बने। अथवा डॉ. मनमोहन सिंह कैसे देश के प्रधानमंत्री रहे?

ऐसे नस्लीय, जातिगत व धार्मिक भेदभाव के सवाल उठाने की कोशिश करने वाले नेताओं को तत्काल चुनाव लड़ने अथवा राजनीति में रहने से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। यही नहीं, ऐसे असांविधानिक बयान दिए जाने के अपराध में उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
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