आईपीएल में फिक्सिंग के जिस विशाल तंत्र का खुलासा हो रहा है, उसे खेल नहीं, विकृति ही कहना चाहिए। इसमें क्रिकेट तलाशने वाले ठगे से नजर आ रहे हैं।
क्रिकेट के नाम पर जितना तमाशा होना है, वह तो चल ही रहा है, लेकिन परत दर परत चीजें जिस तरह बाहर आ रही हैं, उसके बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि इसे क्रिकेट क्यों कहा जाए।
क्या क्रिकेट की गरिमा को फिक्सिंग के कीचड़ में डुबो देने के पीछे कोई सोची-समझी रणनीति है? यह वह क्रिकेट नहीं है, जिसमें खिलाड़ी पिच पर रोमांच और सौंदर्य का प्रतिमान बनाते थे।
आज का क्रिकेट ऐसे लोगों के चंगुल में है, जिन्हें क्रिकेट की तहजीब का पता नहीं। उन्हें बस अकूत पैसा और ग्लैमर चाहिए। दुर्भाग्य से आईपीएल क्रिकेट के नाम पर यही सब मुहैया करा रहा है।
आईपीएल की शुरुआत से ही आशंकाएं गहराने लगी थीं और कहा जाने लगा था कि क्रिकेट में अंकुश रहना चाहिए। लेकिन आईपीएल टीमों को लाइसेंस जिस तरह दिया जाने लगा, वह अजब था।
लाइसेंस देते समय शायद ही कभी यह देखा गया हो कि संबंधित व्यक्ति का क्रिकेट से कोई सरोकार है भी या नहीं। इसमें पैसा ही देखा गया, फिर चाहे वह व्यक्ति कोई भी हो।
अचानक फिल्म, राजनीति और अकूत पैसे वाले लोग इसमें कूद पड़े। ये लोग व्यवसायी की तरह इसमें आए।
खिलाड़ियों की नीलामी की प्रक्रिया की जितनी भी निंदा की जाए, कम होगी। कई बार कुछ ऐसे खिलाड़ियों को भी भारी कीमत मिल गई, जो इसके लायक नहीं थे। दूसरी ओर कई नामचीन खिलाड़ियों को खरीदार नहीं मिले।
यह भी देखा गया कि मालिकों को अपनी टीम के किसी बड़े क्रिकेटर को डांटने-फटकारने से परहेज नहीं है। कई बार हित भी टकराए।
मसलन, यह कहा ही गया कि श्रीसंत को टीम में रखने के मामले में राजस्थान रॉयल्स में ही कई तरह के ऊपरी दबाव काम कर रहे थे। क्रिकेट को बिगाड़ने का काम हर तरह से चला। खेल में देर रात तक चलने वाली पार्टियों का क्या काम?
आईपीएल खेलने के लिए मध्यम और गरीब परिवारों के क्रिकेटर भी आए। इस ग्लैमर और चकाचौंध को देखकर उनका फिसलना अस्वाभाविक नहीं है। जो कम चर्चित क्रिकेटर फिक्सिंग के जाल में धरे गए हैं, वे बखूबी जानते हैं कि वे कभी टेस्ट नहीं खेल सकते। लिहाजा उनके पास पैसे कमाने का यही समय है।
आईपीएल का उद्देश्य बताया गया था कि यह नए खिलाड़ियों की तलाश और पहचान का मंच बनेगा। इससे बड़ा झूठ दूसरा नहीं है। जरा बताइए, आईपीएल से अब तक किस बड़े खिलाड़ी की तलाश कर पाए हैं? बल्कि इसका नुकसान यह हुआ कि गांव-गांव में बच्चे अब आड़े बल्ले से क्रिकेट खेलने लगे हैं।
जबकि पहले के युवा सुनील गावस्कर और विश्वनाथ की शैली में बल्ला पकड़ते थे। आईपीएल में अकूत पैसा है, बल्कि फिक्सिंग के जरिये मोटी कमाई का रास्ता भी खुला हुआ है। ऐसे में कौन क्रिकेटर देश के लिए खेलना चाहेगा?
आईपीएल में फिक्सिंग की जो सनसनीखेज सच्चाई सामने आई है, उसके बाद क्रिकेट के दिग्गजों को भी अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए। अब सवाल कई तरह से उठ रहे हैं।
बीसीसीआई के मुखिया एन श्रीनिवासन के दामाद तक अगर फिक्सिंग की आंच पहुंची है, तो राष्ट्रीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की पत्नी की बुकी के बगल में बैठी हुई तसवीर सामने आई है।
लाजिमी तो यही है कि श्रीनिवासन और धोनी, दोनों सामने आकर सच्चाई बताएं। जितना इसे छिपाने की कोशिश होगी, शक बढ़ता ही जाएगा।
तथ्य यह है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मुखिया और टीम इंडिया के कप्तान के आईपीएल में साझा व्यावसायिक हित हैं। एन श्रीनिवासन की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी हैं।
ऐसे में वे दोनों राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिकाओं के साथ कितना न्याय कर पाएंगे? सवाल बीसीसीआई के आय-व्यय के बारे में गोपनीयता पर भी उठता है। देश को इसके बारे में पता क्यों नहीं होना चाहिए?
आईपीएल में राजनेताओं और फिल्मी दुनिया के लोगों की दिलचस्पी भी हैरान करने वाली है। राजनीति या फिल्म, दोनों विधाएं अपने क्षेत्र के लिए भरपूर समय मांगती हैं।
आश्चर्य होता है कि किसी राजनेता को क्रिकेट के लिए भरपूर समय देने में दिक्कत नहीं होती। फिल्मकारों के लिए एक-एक पल का समय निर्धारित होता है, पर आईपीएल के लिए टीम जोड़ने और मैच के दौरान घंटों स्टेडियम में उन्हें देखा जा सकता है।
इसी फिल्मी दुनिया से कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अप्रत्यक्ष तौर पर इससे अकूत कमाई कर रहे हैं। विंदू दारा सिंह का मामला जिस तरह सामने आया है, वह चौंकाता नहीं है। बल्कि इस तरह का आभास पहले से ही होने लगा था कि चीजें बहुत विपरीत दिशा में जा रही हैं।
यह केवल क्रिकेट को बचाने का नहीं, हमारे संस्कारों को बचाने का भी संकट है। क्रिकेट के अंदर नेताओं की जिस तरह भूमिका बढ़ी है, रहस्य उतने ही गहराए हैं।
पानी अब सिर के ऊपर से बहने लगा है, लिहाजा सरकार को भी सक्रिय होना होगा। वह इस पूरे मामले में बीसीसीआई की स्वायत्तता का हवाला देकर चुप नहीं रह सकती। क्रिकेट और बीसीसीआई की साख गिरती है, तो उसका असर पूरे देश पर पड़ता ही है।
सरकार को ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण रखना चाहिए, जिससे खेल पर दांव लग जाता है। सवाल यह भी है कि स्वायत्तता की आड़ में बीसीसीआई कब तक छलावा करती रहेगी।
इससे पहले कि भद्र लोगों के इस खेल से हमारा विश्वास पूरी तरह उठ जाए, सरकार को इसकी विश्वसनीयता बहाल करने के लिए कदम उठाना होगा।