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बेहतर बदलाव की ओर उच्च शिक्षा

Thu, 23 May 2013 09:25 PM IST
श्यौराजसिंह बेचैन
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इन दिनों देश में, खासकर नई दिल्ली में अकादमिक राजनीति चरम पर है। इसकी वजह है, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम की समयावधि बढ़ाकर चार वर्ष करना।
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बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय ने जब विभिन्न पाठयक्रमों को रचनात्मक और रोजगारपरक बनाने का निर्णय लिया और सभी संकायों के विषय विशेषज्ञों के साथ दो-ढाई माह की लंबी कसरत के बाद इस विविधतापूर्ण पाठ्यक्रम को लागू करने की प्रक्रिया आरंभ की, तो नए को हमेशा ही नापसंद करने वालों ने विरोध करना आरंभ कर दिया। किसी ने कहा कि यह जल्दबाजी है, तो किसी ने कहा कि यह अमेरिका की नकल है।

विश्वविद्यालय ने पाठ्यक्रम में सुधार कार्य आरंभ किया, तो जनाधार हीन नेताओं को चर्चा में रहने का एक बहाना मिल गया। दुखद तो यह है कि जिन छात्रों के हित में सुधार की कोशिश हुई, उन्हें भी बरगलाया जाने लगा।
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मसलन, चार वर्षीय स्नातक कोर्स में दो वर्ष बाद डिप्लोमा, तीन वर्ष बाद डिग्री और चार वर्ष बाद ऑनर्स की उपाधि दी जा रही है।

इस पर एक वर्ष का समय और धन की बर्बादी का आरोप गलत है। तीन साल के वर्तमान ढांचे में किन्हीं कारणों से बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले खासकर पिछड़े एवं दलित बच्चों की संख्या अधिक होती है।

वे बिना कोई प्रमाणपत्र पाए घर बैठ जाते हैं। एक साल के बढ़ते समय के साथ रोजगार की संभावनाएं और उसके लिए अपेक्षित कौशल विकसित करने के मौके बढ़ रहे हैं।

चार वर्षीय पाठ्यक्रम में किसी को अगर दो साल पढ़कर निकलना पड़ रहा है, तो विश्वविद्यालय उसे खाली हाथ बाहर नहीं कर रहा। वह उसे दो साल का डिप्लोमा दे रहा है। साथ ही उसे पुनः प्रवेश की एक सुविधा भी दे रहा है।

इसमें छात्र दस साल तक कभी भी अपनी छोड़ी हुई पढ़ाई फिर से जारी कर सकता है। तीन वर्षीय स्नातक व्यवस्था में यह सुविधा नहीं है।

दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के अभिभावकों को यह कहकर बरगलाया जा रहा है कि यह समय और धन का बोझ आप ही पर पड़ने वाला है। जबकि कमजोर वर्गों के छात्रों का विश्वविद्यालय ने कई स्तर पर ध्यान रखा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में 60-70 फीसदी छात्र दलित एवं कमजोर वर्गों से आते हैं। जाहिर है कि इनकी जरूरतों को ध्यान में रखकर बने पाठ्यक्रम को संभ्रांत वर्ग अपने गले नहीं उतार पा रहा।

अब तक विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति-जनजाति का दाखिला केंद्रीकृत था। इसके तहत छात्र न तो अपनी मर्जी का कॉलेज चुन सकते थे, न कोर्स बदल सकते थे।

पर चार वर्षीय पाठ्यक्रम लागू होने के साथ ही इन छात्रों पर से बंदिश हटा ली गई है। अब उन्हें कोर्स और कॉलेज बदलने की अनुमति है।

इतना ही नहीं, यदि अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्रों के अंक सामान्य के बराबर या उनसे अधिक आते हैं, तो उन्हें आरक्षित श्रेणी में दाखिला पाने की जरूरत नहीं, उनका दाखिला सामान्य श्रेणी में होगा।

हर पेपर में 40 प्रतिशत अंक पाने की अनिवार्यता की जगह औसत 40 प्रतिशत अंक में छात्रों को पास किया जा रहा है।

चार वर्षीय पाठ्यक्रम में अनुसूचित जाति-जनजाति और गरीब छात्रों को लैपटॉप दिए जाने हैं। सूचना तकनीक, गणितीय ज्ञान या विश्लेषण दक्षता, व्यक्तित्व विकास, संचार कौशल, स्वास्थ्य और अनुसंधान तत्व का विकास आज की जरूरतें हैं। चार वर्षीय कोर्स में प्राध्यापकों की संख्या भी बढ़ने जा रही है।

कला विषयों में इतिहास, साहित्य और राजनीतिक विषयों के ज्ञान में विविधता और लोकतांत्रिक सहभागिता बढ़ाने की गुंजाइश भी चार वर्षीय पाठ्यक्रम में ही संभव है। हिंदी में दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श को जगह मिलनी शुरू हो चुकी है।

इसी तरह कॉमर्स के छात्रों को कॉलेज से निकलने से पहले ही इनकम टैक्स रिटर्न भरने, बही-खाता तैयार करने जैसे कार्य सिखा दिए जाएंगे।

जाहिर है कि सुरुचि और रोजगारपरक शिक्षा युवाओं में बढ़ती निराशा और उन्हें आपराधिक प्रवृत्तियों की ओर जाने से रोकेगी। यह कोर्स विदेश की नकल पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चुनौतियों को देखते हुए अस्तित्व में आया है, ताकि हमारी उच्च शिक्षा हमारे विविधतापूर्ण समाज की जरूरतों से जुड़ सके।
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