भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अंग्रेजियत का विरोध क्या किया, इस बहाने हिंदी को दोयम ठहराने और उनके बयान को राजनीतिक ठहराने की कोशिश शुरू हो गई है। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि देश को भारत और इंडिया में बांटने वाली अंग्रेजी भाषा और उसके जरिये समाज में लगातार अपना दखल बना रही अंग्रेजियत पर ईमानदारी से विचार होता, लेकिन हो रहा ठीक इसका उलटा है।
राजनाथ सिंह के बयान में शशि थरूर ने राजनीति ढूंढी है, जिन्हें हिंदी की जरूरत ही नहीं रही। विरोध तो तब होना चाहिए था, जब दिल्ली के अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय और सोनिया गांधी के घर के सामने 225 दिनों से हिंदी और भारतीय भाषाओं में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही कराने की मांग को लेकर धरना दे रहे श्यामरूद्र पाठक की गिरफ्तारी हुई और तिहाड़ भेज दिया गया। विरोध तब भी होना चाहिए था, जब देश के सर्वोच्च अफसरों को चुनने वाली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में हिंदी और भारतीय भाषाओं के बजाय अंग्रेजी और अंग्रेजियत को बढ़ावा देने वाली प्रणाली लागू की जा रही थी।
विवाद तब भी होना चाहिए था, जब गुजरात उच्च न्यायालय ने तीन साल पहले एक फैसले में कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा है ही नहीं। वैसे शशि थरूर अंग्रेजियत विरोध के खिलाफ खड़े होकर कोई नया काम नहीं कर रहे। हमारे प्रधानमंत्री ऑक्सफोर्ड में अंग्रेज महानुभावों और उनके देश इंग्लैंड को इस बात के लिए धन्यवाद दे ही आए हैं कि उन्होंने हमें सबसे बड़ा जो तोहफा दिया है, वह अंग्रेजी है।
भारत में कहा जाता है कि दुनिया को देखने की खिड़की अंग्रेजी है। यह बात और है कि लैटिन अमेरिका और पूर्वी यूरोप समेत दुनिया के ज्यादातर इलाके में अंग्रेजी की तुलना में स्पेनिश ज्यादा बोली जाती है और वह कार्य-व्यापार की भाषा है। अंग्रेजी की 'औकात' देखनी हो, तो आप इटली, फ्रांस और जर्मनी चले जाइए। जल्दी कोई रास्ता बताने वाला भी नहीं मिलेगा। इसके बावजूद अंग्रेजी की श्रेष्ठता बोध वाली मान्यता के आधार पर भारतीय शिक्षा पद्धति में एक वर्ग ऐसा पैदा किया गया, जिसने अंग्रेजी माध्यम के जरिये शिक्षा हासिल की और देश का प्रभुवर्ग बन गया।
रोजी-रोजगार के मोर्चे पर हिंदी लगातार पिछड़ती चली गई। इसका असर यह हुआ कि देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी माध्यम के स्कूल बढ़ने लगे। हालांकि इसके बावजूद आज भी महज दो फीसदी लोग ही अंग्रेजी बोल पाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जनतंत्र की बात करने वाली ताकतें इन्हीं दो फीसदी लोगों की वकालत करने में हिचक नहीं दिखातीं। उन ताकतों को वाराणसी में करीब एक सौ आठ साल पहले नागरी हिंदी प्रचारिणी सभा की बैठक को संबोधित करते हुए लोकमान्य तिलक ने जो कहा था, उस वक्तव्य पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा था, मैं समझता हूं कि हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को पूरे देश के लिए एक आम भाषा की जरूरत है। एक आम भाषा का होना राष्ट्रीयता का महत्वपूर्ण तत्व है। वह आम भाषा ही होती है, जिसके द्वारा आप अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाते हैं। इसलिए यदि हम देश को एक साथ लाना चाहते हैं, तो हम सबके लिए एक आम भाषा से बढ़कर दूसरी कोई ताकत नहीं हो सकती और यही सभा (नागरी हिंदी प्रचारिणी सभा) का उद्देश्य भी है।
आजाद भारत के नियंता तिलक के उस बयान को याद करते रहे कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे। लेकिन हिंदी से संबंधित उनके बयान को वैसी तवज्जो नहीं मिली, जिसका वह हकदार था। दुर्भाग्यवश जैसे ही अंग्रेजीयत के विरोध के सुर उठते हैं, उसे हिंदी के समर्थन से जोड़ दिया जाता है। लेकिन सवाल सिर्फ हिंदीयत का नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं के जनतंत्र से भी जुड़ा है। हम अंग्रेजी के वर्चस्व की संकीर्ण मानसिकता से उबर नहीं पा रहे हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं उस लोकतंत्र का नकार भी छिपा है, जो भारतीय भाषाभाषी है।
सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा वे लोग करते हैं, जो देश में कमजोर से कमजोर तबके के लोकतांत्रिक अधिकारों की वकालत करते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि उनकी यह अपील महज दिखावा है...भारतीय भाषाओं के विरोध और अंग्रेजियत के समर्थन से संकेत तो यही मिलते हैं।