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अंतरराष्ट्रीय: सिर्फ टैरिफ चुनौती नहीं, चीन का बढ़ता व्यापार अधिशेष भी एक बड़ा संकट

ईश्वर प्रसाद, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: Pavan Updated Sat, 28 Feb 2026 07:44 AM IST

सार

वैश्विक व्यापार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बेशक टैरिफ को माना जा रहा है, पर चीन का बढ़ता व्यापार अधिशेष भी एक बड़ा संकट है, जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। चीनी निर्यात उन देश के निर्माताओं पर भारी पड़ रहा है, जो प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी


अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व की भूमिका से पीछे हटने के बीच, चीन ने खुद को वैश्वीकरण का समर्थक और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का रक्षक बताने की कोशिश की और संयोग से, उस व्यवस्था का निर्माण करने में अमेरिका की भी अहम भूमिका रही है। चीन का आर्थिक मॉडल विकास तो लाया है, पर संतुलन के बिना। हाल के वर्षों में इमारतों, मशीनरी और उपकरणों में निवेश उसकी वृद्धि का मुख्य इंजन बना। इस भारी निवेश का नतीजा बड़े पैमाने पर उत्पादन के रूप में सामने तो आया, लेकिन घरेलू खपत उत्पादन की रफ्तार के साथ नहीं बढ़ पाई है। इसी वजह से चीनी परिवार खुलकर खर्च करने के बजाय बचत करना पसंद कर रहे हैं।


सरकार की आर्थिक प्रबंधन क्षमता को लेकर चिंताओं ने भी घरेलू भरोसे को चोट पहुंचाई है, जिससे मांग और दब गई। जब कोई अर्थव्यवस्था जितना उपभोग करती है उससे कहीं अधिक उत्पादन करती है, तो संतुलन बिगड़ता है। एक रास्ता यह होता है कि कीमतें गिरें, ताकि उपभोक्ता ज्यादा सामान खरीदें। पर अगर परिवारों को लगातार कीमतें गिरने की आशंका हो, तो वे खरीद बढ़ाने के बजाय उसे टाल देते हैं। चीन इस समय ऐसे ही मंदी-दबाव (डिफ्लेशन) का सामना कर रहा है। ऐसे में, अब एक ही रास्ता बचता है-अतिरिक्त उत्पादन को विदेशों में खपाना। चीन ठीक यही कर रहा है। उसके निर्यात तेजी से बढ़े हैं। हालांकि, ट्रंप द्वारा चीनी वस्तुओं पर लगाए गए ऊंचे शुल्कों के कारण अमेरिका को होने वाला चीन का निर्यात तेजी से घटा है।


नतीजतन, चीन अपने अन्य व्यापारिक साझेदारों को निर्यात बढ़ा रहा है। चीनी निर्यात उन देश के निर्माताओं पर भारी पड़ रहा है, जो प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ हैं। जिन देशों पर इसका दबाव पड़ रहा है, वे अब प्रतिरोध कर रहे हैं। चीन की अर्थव्यवस्था का अपनी विकास दर को बनाए रखने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होना, नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था के बिखराव को और तेज करेगा। इसमें यदि ट्रंप के टैरिफ भी जोड़ दिए जाएं, तो चीनी निर्यात का यह दबाव जो कुछ बचा है, उसे भी नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह कतई नहीं कि वैश्विक व्यापार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, लेकिन व्यापार अब ऐसे ढंग से बंटता जा रहा है, जिससे कुल लाभ कम हो रहा है। इस तरह के विभाजन का सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब अर्थव्यवस्थाओं को होगा, जो वैश्विक व्यापार में अपनी जगह बना रही हैं।


तो चीन क्या कर सकता है? वह अपने सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने जैसे सुधार कर सकता है, ताकि उसके नागरिक ज्यादा खर्च करने के लिए प्रोत्साहित हों। चीन का केंद्रीय बैंक अपनी मुद्रा को मजबूत होने की अनुमति दे सकता है, जिसका वह हाल तक विरोध करता रहा है। इससे चीनी निर्यात महंगे और आयात सस्ते हो जाएंगे और व्यापार अधिशेष घटाने में मदद मिलेगी। यदि मुद्रा का मूल्य केंद्रीय बैंक के बजाय बाजार की ताकतें तय करें, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उसकी अहमियत भी बढ़ेगी-एक ऐसा लक्ष्य, जिसे बीजिंग लंबे समय से हासिल करना चाहता रहा है। दीर्घकाल में जो कदम सबसे बेहतर होंगे, उन्हें उठाकर चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था की भी मदद कर सकता है। पर यदि ऐसा नहीं हुआ, तो चीन वैश्विक विकास को तो नुकसान पहुंचाएगा ही, नई विश्व व्यवस्था में नेतृत्व की भूमिका का कोई भी दावा खो सकता है।
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