फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

भ्रष्टाचार: आखिर इस मर्ज की दवा क्या है, अति प्रतिक्रियाशीलता के कैसे कम होगा नुकसान

विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील Published by: Pavan Updated Sat, 28 Feb 2026 07:32 AM IST

सार

सोशल मीडिया में व्यंग्य बन रहे हैं कि किताब पर रोक लगाने के बाद अब न्यायपालिका से भ्रष्टाचार खत्म हो गया है। न्यायिक प्रशासन की स्वतत्रंता और जजों का सम्मान बढ़ाने के लिए भ्रष्टाचार पर आंख मूंदने के बजाय इस पर स्वस्थ बहस और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
विज्ञापन
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI


सामान्य तौर पर इस किताब को कुछ हजार छात्र ही पढ़ते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, सभी राज्यों को नोटिस, प्रधानाचार्यों की जवाबदेही और मीडिया में सुर्खियों की वजह से पूरे देश में इस मुद्दे पर बहस होने लगी है। अति प्रतिक्रियाशील होकर न्यायिक आदेश देने के बजाय यदि प्रशासनिक तरीके से किताब की गलतियों को ठीक कर दिया जाता, तो जजों और न्यायिक व्यवस्था को इस विवाद से हो रहे नुकसान से बचाया जा सकता था।


वर्ष 2020 में जारी नई शिक्षा नीति के अनुसार एनसीईआरटी की किताबों में बड़े बदलाव हुए हैं। उसके अनुसार, कक्षा सात और आठ की किताब में सरकार और जन-प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार से जुड़े अध्याय पहले से शामिल थे। न्यायपालिका से जुड़े नए अध्याय में लंबित मुकदमों का बोझ, जजों की नियुक्ति प्रणाली के साथ पूर्व चीफ जस्टिस गवई के बयानों के अनुसार, भ्रष्टाचार से जुड़ी विषयवस्तु शामिल की गई थी। कुछ अन्य न्यायिक घटनाओं के जरिये विवादित किताब से जुड़े विषय को सही ढंग से समझा जा सकता है।


पिछले साल होली के समय दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के बंगले में नोटों के बंडल जलने का सनसनीखेज मामला आया था। तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ समेत अनेक लोगों ने वर्मा के खिलाफ पुलिस या सीबीआई में एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। उन्हें ट्रांसफर करके मामले को जांच समिति के हवाले कर दिया गया, जिसके अध्यक्ष बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अब रिटायर भी हो रहे हैं। कंडक्टर के 10 रुपये के भ्रष्टाचार के मामले में सख्त रवैया अपनाने वाली न्यायपालिका ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। ऐसे अनेक मामलों से सोशल मीडिया में जजों के खिलाफ असंतोष और गुस्सा बढ़ रहा है। मर्ज को ठीक करने के बजाय इलाहाबाद हाईकोर्ट में दो जजों की पीठ ने सोशल मीडिया में बढ़ रही अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मामला शुरू करने की चेतावनी दी है।


सरकार और नेताओं की तरह न्यायपालिका में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को पिछले कई दशकों से स्वीकारा जा रहा है। वर्ष 1997 में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सामूहिक तौर पर 16 सूत्री प्रस्तावों से न्यायपालिका में निष्पक्षता, पारदर्शिता और ईमानदारी के प्रति वचनबद्धता को दोहराया था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस भरुचा ने वर्ष 2002 में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि 80 फीसदी जज ईमानदार हैं, लेकिन बकाया भ्रष्ट जजों की वजह से न्यायिक व्यवस्था बदनाम हो रही है। वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट के जज काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की पीठ ने न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद और बढ़ते भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए लिखित न्यायिक आदेश पारित किया था। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने हलफनामे में अनेक जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, लेकिन उन्हें अवमानना के तहत दंडित नहीं किया गया।


सुप्रीम कोर्ट के अधिकांश जज रिटायरमेंट के बाद भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ बोलते हैं। स्कूली किताब पर विवाद के दौरान ही अन्य मामले में वर्तमान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने ट्रिब्यूनल्स की कार्यप्रणाली पर कठोर टिप्पणी करते हुए उन्हें बोझ और झंझट बताया है। सनद रहे कि अधिकांश ट्रिब्यूनल में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज मुखिया और न्यायिक सदस्य नियुक्त होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के प्रशासनिक मुखिया चीफ जस्टिस हैं। मुकदमों की लिस्टिंग में अनियमितता पर नाराजगी जताते हुए चीफ जस्टिस ने कहा है कि रजिस्ट्री के कामकाज में त्वरित और बड़े सुधारों की जरूरत है।


कॉलेजियम सिस्टम में सुधार के लिए मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल में एनजेएसी का कानून बनाया था। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने उसे निरस्त कर दिया था। उस मामले में जज कुरियन जोसेफ ने फैसले में लिखा था कि कॉलेजियम प्रणाली से जजों की मनमानी नियुक्ति से न्यायिक व्यवस्था में बढ़ रही सड़ांध को रोकने के लिए पेरिस्त्रोइका (पुनर्निर्माण) और ग्लासनोस्त (खुलेपन) की जरूरत है। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में हजारों जजों की नियुक्ति हो गई, लेकिन उस सड़ांध को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट या संसद ने ठोस कदम नहीं उठाया।
विज्ञापन


संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी अब तक किसी भी जज को महाभियोग के तहत हटाया नहीं गया है। संसद में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार, जजों के खिलाफ आठ हजार से ज्यादा शिकायतें आई हैं। संविधान के अनुसार, जल्द न्याय लोगों का मौलिक अधिकार है। जजों से अन्य वर्गों की अपेक्षा ज्यादा ईमानदारी की अपेक्षा रहती है, इसलिए उन्हें महामहिम के सम्मान के साथ अनेक सांविधानिक संरक्षण मिले हैं। इसके बावजूद जजों के खिलाफ शिकायतों के निवारण और कार्रवाई के लिए पारदर्शी और ठोस प्रणाली नहीं है।


अन्ना आंदोलन के बाद लोकपाल को भ्रष्टाचार के विरुद्ध वरदान बताया गया था, लेकिन वह अपने मकसद में पूरी तरह से विफल हो गया। संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए न्यायिक व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी, निष्पक्ष और ईमानदार बनाने की जरूरत है। सोशल मीडिया में व्यंग्य बन रहे हैं कि किताब पर रोक लगाने के बाद अब न्यायपालिका से भ्रष्टाचार खत्म हो गया है। न्यायिक प्रशासन की स्वतंत्रता और जजों का सम्मान बढ़ाने के लिए भ्रष्टाचार पर आंख मूंदने के बजाय इस पर स्वस्थ बहस और ठोस कार्रवाई की जरूरत है।


अनेक जज नाबालिग बच्चों की यौन शिक्षा और सहमति से संबंधों के पक्षधर हैं। इसलिए अफसरों और नेताओं के साथ जजों के भ्रष्टाचार के बारे में भी बच्चों को स्वस्थ तरीके से जागरूक करने पर विवाद करना ठीक नहीं है। इंटरनेट और डार्क वेब की दुनिया में किताबों के अध्ययन से जागरूक बच्चे जिम्मेदार नागरिक बनकर सुशासन से गणतंत्र को मजबूत करने के साथ विकसित भारत का सपना साकार कर सकते हैं। -edit@amarujala.com
विज्ञापन
विज्ञापन
Next