राहुल गांधी का अध्यक्ष बनना निश्चित होने के साथ ही कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र का प्रश्न तेजी से उठा है। उनके नामांकन के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे बड़ा कटाक्ष किया। उन्होंने वंशवादी नेतृत्व की बात करते हुए इसकी तुलना शाहजहां और औरंगजेब से कर दी। निस्संदेह, प्रधानमंत्री की इस तुलना को देश के बड़े बौद्धिक वर्ग ने उचित नहीं माना है। यदि देश से राजतंत्र खत्म हो गया, हमने संसदीय प्रणाली वाला लोकतंत्र अपना लिया, तो फिर किसी दल के नेतृत्व पर एक परिवार का एकाधिकार कैसे हो सकता है? किंतु यही हो रहा है। राहुल गांधी यदि नेहरू-इंदिरा परिवार के सदस्य नहीं होते, तो उनको अध्यक्ष बनाने को लेकर शायद ही ऐसी सर्वसम्मति दिखती। यही स्थिति 19 वर्ष पहले सोनिया गांधी के साथ थी। एक वंश से नेतृत्व का चयन किसी पार्टी के चतुर्दिक क्षरण का प्रमाण है। इसका अर्थ है कि पार्टी वैचारिक, सांगठनिक और नेतृत्व, तीनों स्तरों पर क्षरित हो चुकी है। किंतु प्रश्न है कि क्या कांग्रेस इस मायने में अकेली है। क्या आंतरिक लोकतंत्र की समस्या केवल कांग्रेस की है और भारत की अन्य पार्टियां शत-प्रतिशत आंतरिक लोकतंत्र का पालन करती है?
ईमानदारी से इन दोनों प्रश्नों का उत्तर तलाशें, तो निश्चय ही निराशा हाथ लगेगी। आज भारत की एक पार्टी का नाम बता दीजिए, जिसके बारे में कहा जाए कि उसने अपने ही संविधान की निर्धारित प्रक्रिया से निचली इकाई से लेकर ऊपर तक चुनाव कराया है? भाजपा भी इसका अपवाद नहीं है। ज्यादातर पार्टियों में अध्यक्ष का नाम पहले तय हो जाता है तथा बाद में संविधान की प्रक्रिया का पालन करने के लिए राज्यों से नामों के प्रस्ताव मंगाए जाते हैं एवं राष्ट्रीय परिषद में उसका अनुमोदन करवा दिया जाता है। लोकतंत्र का मतलब है, नीचे से निर्वाचित होते हुए ऊपर पहुंचना। यहां ऊपर से नामित होकर व्यक्ति नीचे पहुंचता है।
यह भारत के सियासी दलों में आम प्रवृति हो चुकी है। हमारा लोकतंत्र दलीय प्रणाली पर आधारित है और जब दलों में ही लोकतंत्र का इस तरह सरेआम मखौल उड़ाया जा रहा हो और किसी को भी इसमें कुछ असामान्य नहीं लगता, तो फिर इसे क्या कहा जाए?
जहां तक वंशवाद का प्रश्न है, तो एक समय देश में कांग्रेस के खिलाफ यह बड़ा मुद्दा था। डॉ लोहिया से लेकर राजनारायण वंशवाद विरोध के प्रबल प्रतीक थे। बाद में जयप्रकाश नारायण भी इसका अंग बने। जनसंघ ने भी इसे मुद्दा बनाया था। किंतु आज लोहिया और जयप्रकाश को आदर्श मानने वाली पार्टियां ही वंशवाद का शिकार हैं। समाजवादी पार्टी में आज इसकी कल्पना नहीं की जा सकती कि मुलायम परिवार के बाहर का कोई अध्यक्ष होगा या अगर होगा तो वह उनकी सहमति से होगा तथा उसकी स्थिति केवल एक आदेशपालक की होगी। क्या लालू यादव के राजद में उनकी सहमति के बगैर कोई किसी पद पर विराज सकता है? क्या शिवसेना में आप ठाकरे परिवार से बाहर के किसी अध्यक्ष की कल्पना कर सकते हैं? क्या तेलुगू देशम में चंद्रबाबू नायडू के रहते उनके अलावा कोई नेता हो सकता है? क्या बीजू जनता दल में नवीन पटनायक की यही स्थिति नहीं है? द्रमुक में करुणानिधि परिवार की भूमिका ऐसी ही नहीं है? अन्नाद्रमुक को देख लीजिए, जयललिता की मृत्यु के बाद कितनी मारधाड़ मची और वह अभी तक खत्म नहीं हुई है।
तो इससे ज्यादा क्षरण किसी देश के राजनीतिक प्रतिष्ठान का और क्या हो सकता है? जाहिर है, हमारी राजनीति में आमूल बदलाव की आवश्यकता है। यह कैसे आएगा, इस पर विचार करना होगा।