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पत्थर पर सोना उगाया

Sat, 05 Mar 2016 10:49 AM IST
वेद विलास उनियाल/ अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • बिहार की चाची का अचार बना मिसाल
  • लिज्जत पापड़ जीवटता के साथ शुरुआत
  • केरल के दंपति को भा गया भारत
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सकारात्मक सोच का विकास
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विस्तार
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दूर दूर तक पसरे नकारात्मक माहौल में कुछ अच्छी सूकून देने वाली बातें भी सामने आई हैं। इसी समाज में कुछ लोग या समूह हैं जिन्होंने बिना शोर शराबे के अपना काम किया, अपनी मंजिल हासिल की। वे दूसरों के लिए प्रेरणा बने हैं। उन्होंने जो कुछ किया उसका फायदा समाज को मिला। भले ही उन्होंने काम को छोटे छोटे स्तर से शुरू किया हो लेकिन वह पूरी लगन से अपने काम में जुटे रहे। और एक मुकाम हासिल किया। देखते ही देखते मुंबई में डिब्बेवालों का काम दुनिया में शोहरत पा गया। इजराइल के अविराम रोजिन भारत आए और महज तेरह साल में बंजर जमीन पर 18 हजार पेड़ उगा दिए। गुजरात के एक स्कूल निदेशक ग्रीन स्कूल के प्रेरणा बन गए।
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बिहार की चाची का अचार बड़े बड़े ब्रांडो को फेल कर रहा है। बिहार के मुजफ्फरनगर जिले के आनंदपुर गांव की राजकुमारी देवी को अब कोई इस नाम से नहीं जानता। उन्हें लोग किसान चाची के नाम से जानते हैं। नब्बे के दशक में किसान चाची के सामने जीवन यापन की समस्या थी। वक्त ऐसा भी आया कि पति से अलग रहना पड़ा। उनके पास कुछ जमीन थी वही एक सहारा था। लेकिन किसान चाची के मन में अजब हौसला था। सबसे पहले यही सोचा कि सब्जी उगाकर जीवन चलाऊंगी। थोड़ी बहुत जानकारी लेकर वह इस काम में जुट गई। सब्जी होने लगी। पपीता भी उगा। इससे जीवन थोड़ा संभला। फिर उन्हें लगा कि क्यों न सब्जी का अचार बनाया जाए। यह फार्मूला काम कर गया। किसान चाची के अचार में कुछ खास बात थी। बडे बड़े ब्रांडो को छोडकर लोग इसे अपनाने लगे।


कारोबार बढ़ने लगा तो उन्होंने महिला समूह तैयार किए। वह साइकिल पर जाकर अपने अचार की ब्रिकी करती थी। लेकिन महिलाओं के समूह से तो यह मेहनत रंग लाई। आज उनके पास चालीस सहायता समूह है। उनकी तपस्या का फल है कि कई परिवार इससे चल रहे हैं। उनके हुनर का डंका चारों ओर बजने लगा। किसान चाची पर फिल्म भी बनी है। आज की रात है जिंदगी ग्रैंड फिनाले में वह टीवी के पर्दे पर अमिताभ बच्चन के साथ नजर आई। किसान चाची को कुछ प्रतिष्ठित अवार्ड मिल चुके हैं। कई संस्थाएं विश्वविद्यालय उन्हें अपने यहां आमंत्रित करना चाहते हैं लेकिन उनका कहना है कि अचार से फुर्सत मिले तब तो जाएं। हाल में देहरादून में यूथ आइकन अवार्ड में भी किसान चाची आई थी। अपनी सीधी सच्ची बातों से उन्होंने श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। देर तक तालिया बजती रही।
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गुजरात में ग्रीन स्कूल का बनना भारत में पर्यावरण की दिशा में उल्लेखनीय काम है। वीरेंद्र रावत इस तरह की ग्रीन स्कूल के प्रणेता है। ग्रीन स्कूल यानी ऐसी इमारत जिसमें प्रकृति के नियमों का पूरी तरह पालन किया जाए। कुछ समय पहले जब गुजरात के भोड़ासा में वह नई स्कूल की बिल्डिंग बना रहे थे तो उनके मन में ख्याल आया कि क्या इमारत को ग्रीन बिल्डिंग के रीप में बनाया जा सकता है। उनके निर्देश पर यह उल्लेखनीय काम हुआ। उनकी इच्छा का अनुरूप आर्किटेक्स ने उस इमारत को ऐसा गोलाकार बनाया कि हर कक्षा में ताजी हवा महसूस की गई। उनके ग्रीन स्कूल की कल्पना इतनी शानदार रही कि अब अमेरिका के दो स्कूलों को ग्रीन स्कूल बनाने का प्रस्ताव उनके सामने आया है। इसी तरह अबू धाबी में भी इस पहल को साकार कर चुके हैं।

ग्रीन स्कूल का दर्शन यह है कि इसमें पांचों तत्व की अवधारणा पर काम हो सके। वीरेंद्र रावत पर्यावरण के लिए कई दिशाओं में काम कर रहे हैं। उन्होंने स्कूल में बरसाती पानी को इकट्ठा करने की मुहीम चलाई। धीरे धीरे यह प्रयोग इतना सफल होने लगा कि 50 से 60 फीसदी बरसाती पानी का उपयोग किया जाने लगा। स्कूल में बिजली की खपत कम करने के लिए जहां एक तरफ बच्चों को सिखाया गया कि� कहीं भी अनावश्यक बिजली जलती हुई न दिखे। वहीं बच्चे मिट्टी के फिल्टर का पानी उपयोग करने लगे। यह स्वास्थ्य के लिहाज से भी बहुत अच्छा रहा। और पेड़ लगाना भी अहम था। स्कूल परिसर को इतना हरा भरा किया गया कि हर पच्चीस विद्यार्थियों के अनुपात में एक पेड़ है। पेड़ हैं तो ताजी हवा होगी आक्सीजन होगा। स्कूल में इतना ही नहीं कपोंस्टिंग के जरिए खाद भी तैयार की गई।

पेडों के पत्ते काम आते रहे। बच्चों को आदेश दिया गया कि वह पौधों पर पानी देते रहें। ग्रीन स्कूल की अवधारणा यही है कि बच्चों ही नहीं शिक्षकों में भी पर्य़ावरण के प्रति चेतना फैले। उन्हें साबित करके दिखाया गया कि पर्यावरण के लिए पहल करके केवल प्रकृति और व्यक्ति के स्वास्थ्य पर ही असर नहीं पडता बल्कि वह आर्थिक दृष्टिकोण से भी लाभदायक है। ग्रीन स्कूल में बच्चों को सिखाया गया कि� गमलों के पौधों का ख्याल रखे। बहुत से लोग छुट्टियों में कहीं जाते हैं। ऐसे समय में स्कूल के छात्र उनके गमले ले जाते हैं उनकी देख भाल करते हैं। एक तो उनका फूल पौधों से अपनापन होता है दूसरा लोग इसके एवज में उन्हें ईनाम भी देते हैं। यह पहल भी कारगर रही। अब इसी तर्ज पर अमेरिका में भी स्कूलों में काम शुरू किया गया है। पर्यावरण के लिए यहअपनी तरह की एक शानदार पहले है। जिससे कोई भी परिचित होता है तो उसे अपनाने की कोशिश करता है। ग्रीन स्कूल के लिए वीरेंद्र रावत कई प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित हो चुके हैं।

सन 2000 में इजराइल में रहने वाले अविराम रोजिन और उनकी पत्नी वोरिटो भारत आए। केरल की सुंदरता ने उन्हें रोमांचित कर दिया। इसके बाद वह तमिलनाडु के आरोविले पहुंचे। केरल की ताजी हवा यहां नहीं थी। यहां बंजर जमीन थी और इसकी वजह से तेजी से पलायन हो रहा था। तब उन्होंने सोचा कि यहां की भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए कुछ करना चाहिए। तीन साल बाद नौकरी छोड़कर वह फिर भारत आए। सबसे पहले करीब 64 एकड़ बंजर जमीन खरीदी। उसमें स्थानीय लोगों की मदद से पेड़ लगाए। करीब एक दशक के बाद आज इसी क्षेत्र में हरा भरा जंगल उग आया है। केरल के इलाकों की तरह यहां भी शुद्ध हवा बहने लगी है। इसके पीछे अविराम रोजिन उनके परिवार और स्थानीय लोगों का हाथ है। उन्होंने भी इस बात का ध्यान रखा कि यहां जिस तरह की आबादी को बसाया जाए वह पूरी तरह इको फ्रेंडली हो। यहां सोलर ऊर्जा से बिजली उपलब्ध होती है। और अब यहां इको फ्रैंडली खेती हो रही है। इसी तरह कई लोगों की उलब्धियां सामने आई हैं। जिन्होंने जिंदगी के हालातों में शिकायतों के बजाय अपनी धारा को खुद मोड़ा। नैनीताल में एक महिला ने इसी तरह पहाड़ी उत्पादों के साथ नमकीन बनाया। आज वो फलता फूलता व्यवसाय है। इसी तरह लिज्जत पापड़ भी इसी तरह जीवटता के साथ शुरू किया गया। भागती दौडती मुंबई में जीवन टिफिन वालों का कारोबार भी खूब फैल गया है।
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