यह तो हद हो गई प्यारे। जिसे देखो वही वित्त मंत्री की खिल्ली उड़ा रहा है। हर किसी की शिकायत है कि बजट से महंगाई बढ़ेगी। आम आदमी और भी फटेहाल हो जाएगा।
दरअसल, लोग नादान होते हैं। जैसा मीडिया या बुद्धिजीवियों ने दिखा-बता दिया, बस उसे ही ‘अंतिम सच’ मान लेते हैं। अब खुद ही सोच-समझकर बताइए कि इत्ती बड़ी आबादी को संतुष्ट कर पाना क्या संभव है? जब हाथ-पैर की उंगलियां एक समान नहीं हो सकतीं, तो कैसे मान सकते हैं कि वित्त मंत्री से हर वर्ग का हर बंदा खुश ही होगा! वैसे असहमति जताना जरूरी भी है, ताकि पता चल सके कि कित्ते लोग संतुष्ट हैं, कित्ते असुंतष्ट।
हर किसी की शिकायत महंगाई को लेकर है। लेकिन प्यारे, महंगाई हमारे लिए कोई नई-नवेली दुल्हन थोड़े है कि पहली दफा उसका मुंह देखेंगे। महंगाई तो हमें मय दुल्हन दहेज में मिली है। तब के जमाने में तब जैसी महंगाई थी और अब के जमाने में अब जैसी महंगाई है। महंगाई के साथ-साथ सिर्फ चेहरे-मोहरे बदले हैं, उसका रंग-ढंग वैसा ही है।
वैसे आम आदमी बहुत होशियार है। महंगाई के बीच खुद को कैसे एडजस्ट करके चलना है, उसे मालूम है। खर्च दो हजार कमाने वाला भी कर रहा है और दो लाख कमाने वाला भी। हां, यह कहा जा सकता है कि थोड़ा कम, थोड़ा ज्यादा। किंतु जुगाड़ के साथ सबने खुद को ढाल रखा है। और फिर बाजारों में आती भीड़ देखिए। प्यारे, यह भीड़ कोई आसमान से थोड़े टपकी है, हमारे बीच से ही तो निकलकर आती है। तो फिर कैसी महंगाई?
इत्ती महंगाई है, तो भी इत्ते खरीदार हैं। अगर न होती, तो क्या होता! लेकिन इत्ती-सी बात लोगों के भेजे में कहां आती है! उन्हें तो बस यही लग रहा है कि वित्त मंत्री ने महंगाई को बढ़ाया है। शौकीनों के शौकों पर जब महंगाई की गाज गिरती है, तो वे ऐसे ही चिल्लाते हैं। यदि महंगाई से इत्ती ही तकलीफ है, तो फिर क्यों नहीं सादा भोजन खाते? क्यों नहीं खादी के वस्त्र पहनते?
मतलब आम आदमी सुविधाएं सारी चाहेगा और जब सरकार उन पर टैक्स का बोझ डालेगी, तो कांय-कांय करेगा। यह कहां तक उचित है प्यारे। अरे, हमें तो शुक्रिया अदा करना चाहिए कि वित्त मंत्री ने सबको खुश रखने का प्रयास किया। बावजूद उनके इस प्रयास के, जो खुश नहीं हुए उसका क्या करें। आप खुश रहेंगे, तो महंगाई के दर्द का एहसास न होगा।