फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

नकद इनाम में असमानता

मनोज चतुर्वेदी Updated Wed, 05 Sep 2018 06:56 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
मनोज चतुर्वेदी

इंडोनेशिया में भारत 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य के साथ कुल 69 पदक जीतकर आठवें स्थान पर रहा। यह एशियाई खेलों में भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। आजकल पदक विजेता खिलाड़ियों को राज्यों द्वारा नकद इनाम देने की घोषणाओं का दौर चल रहा है। पर इन घोषणाओं में इतनी असमानता है कि पदक जीतने वाले कुछ खिलाड़ियों में हीन भावना आ सकती है कि वे किसी राज्य विशेष से ताल्लुक क्यों नहीं रखते, क्योंकि वहां ज्यादा नकद इनाम मिलता है। यह देश में खेलों की प्रगति से लिहाज से अच्छा नहीं है।



हरियाणा और ओडिशा के खिलाड़ियों के लिए पदक जीतना किस्मत बदलने वाला साबित हो रहा है, जबकि पश्चिम बंगाल, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों की किस्मत पदक जीतने पर भी नहीं बदल पा रही। स्वर्ण पदक विजेताओं बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट को हरियाणा सरकार ने तीन-तीन करोड़ रुपये देने की घोषणा की है। वहीं दुती चंद के 100 और 200 मीटर दौड़ में रजत पदक जीतने पर ओडिशा सरकार ने प्रति पदक डेढ़ करोड़ यानी कुल तीन करोड़ रुपये देने की घोषणा की। पर हेप्टाथलान में स्वर्ण पदक जीतने वाली स्वप्ना बर्मन को पश्चिम बंगाल सरकार ने 10 लाख रुपये और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है।


कई बार घोषणाओं के बाद भी अमल होने में समय लग जाता है। इस बार 3,000 मीटर स्टीपल चेज में रजत पदक जीतने वाली रायबरेली की सुधा सिंह को उत्तर प्रदेश सरकार ने 30 लाख रुपये और राजपत्रित अधिकारी की नौकरी देने की घोषणा की। सुधा सिंह ने 2010 के ग्वांग झू एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। तब उन्होंने सरकार को नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र दिया था। पर नौकरी संबंधी उनकी पुरानी फाइल सरकारी गलियारों में घूम रही है और अब नौकरी की नई घोषणा हो गई है!


सबसे कम उम्र में स्वर्ण जीतने वाले निशानेबाज सौरभ चौधरी को उत्तर प्रदेश सरकार ने 50 लाख रुपये देने की घोषणा की, तो एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला निशानेबाज राही सरनोबत को भी महाराष्ट्र सरकार ने 50 लाख रुपये देने की घोषणा की। साफ है कि कुछ रजत पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को मिले नकद इनाम से भी कम राशि स्वर्ण पदक विजेताओं को मिल रही है।


इनामी राशि में असमानता पहली बार नहीं हो रही। 2016 के रियो ओलंपिक में पीवी सिंधु ने रजत और साक्षी मलिक ने कांस्य जीता था। दीपा करमाकर ने जिम्नास्टिक में चौथा स्थान हासिल कर इतिहास रच दिया था। सिंधु को आंध्र प्रदेश ने तीन करोड़ रुपये और एक प्लॉट दिया, तो तेलंगाना ने भी मोटी राशि दी। ऐसे ही साक्षी को हरियाणा सरकार से करोड़ों रुपये मिले। पर त्रिपुरा से ताल्लुक रखने वाली दीपा कुछ लाख में ही सिमट गईं। इस साल भारत के अंडर-19 विश्व कप जीतने पर सभी खिलाड़ियों को 30-30 लाख रुपये दिए गए। पर यहां तो कई स्वर्ण पदक जीतने वालों को भी इतनी रकम नहीं मिली।


खिलाड़ियों के सम्मान के लिए इस असमानता को पाटना बहुत जरूरी है। केंद्र सरकार ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के लिए इनामी राशि जिस तरह तय की है, वैसी ही नीति सभी राज्यों द्वारा बनाने की जरूरत है। यह नीति समान हो, अन्यथा खिलाड़ियों में हीन भावना पनप सकती है। इंडोनेशिया में पदक जीतने वाले ज्यादातर खिलाड़ी गरीबी में गुजर-बसर कर अपने जज्बे के बूते इस मुकाम तक पहुंचे हैं। इसलिए उनके जज्बे को तोड़ने वाला कोई काम नहीं होना चाहिए। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next