अमेरिका के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों की एक के बाद एक भारत यात्रा दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में आ रहे सुधार का संकेत है। विदेश मंत्री जॉन केरी और वाणिज्य मंत्री पेनी प्रिट्जकर के दौरे के महज दस दिनों के बाद ही अमेरिकी रक्षा मंत्री चक हैगल दिल्ली पहुंच रहे हैं। एक वक्त था, जब औसतन तीन से पांच वर्ष के बाद ही कोई अमेरिकी कैबिनेट मंत्री भारत दौरे पर आता था। लिहाजा इन तीन वरिष्ठ मंत्रियों का भारत आना बताता है कि आगामी दिसंबर में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा को लेकर ओबामा प्रशासन कितना गंभीर है। इससे एक संकेत यह भी मिलता है कि मोदी की यात्रा न सिर्फ दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों पर गहरा असर डालेगी, बल्कि क्षेत्र की भू-राजनीतिक परिस्थितियों को भी गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
बहरहाल, बृहस्पतिवार को संपन्न पांचवीं भारत-अमेरिका सामरिक वार्ता ने दोनों देशों की जरूरतों को कमोबेश रेखांकित किया है। रक्षा, आतंकवाद-निरोध और तकनीक अधिग्रहण जैसे मुद्दों को भारत ने जोर-शोर से उठाया, जबकि निवेश के बेहतर मौके और व्यापार अमेरिका की बातचीत का हिस्सा थे। लेकिन सवाल यही है कि क्या इन कवायदों से दोनों देश अपनी भू-राजनीतिक चिंताओं को पहचानने में सक्षम होंगे। भारत के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी चिंता का सबब हैं, क्योंकि पिछले दो वर्षों से इन दोनों देशों के जेहादी गुट मजबूत हो रहे हैं और उनका निशाना भारत ही है। लिहाजा आतंकवाद जैसे मुद्दे को भारत नजरंदाज नहीं कर सकता।
दूसरा मुद्दा चीन का तेजी से बढ़ना है। पारंपरिक रूप से यह माना जाता है कि भारत के साथ अमेरिका बेहतर संबंध का इसलिए पक्षधर रहा है, क्योंकि वह इस बहाने चीन की बढ़ती ताकत को साधना चाहता है। हमें भी, चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता के मद्देनजर मित्रों की दरकार है। लेकिन कोई पक्ष चीन को मुद्दा नहीं बनाना चाहता, लिहाजा हमें भी सार्वजनिक रूप से इसके इजहार से बचना होगा।
दरअसल, भारत-अमेरिका संबंधों की प्रमुख विशेषता दोनों देशों की विषमता है। एक देश (अमेरिका) दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति का स्वामी है, तो दूसरा (भारत) दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाला और गरीब विकासशील देश है। लेकिन हकीकत में भू-राजनीति और भू-आर्थिक संबंध ही दोनों देशों को एक-दूसरे की ओर खींचते हैं। यह यों ही नहीं था कि दिसंबर, 2000 में न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी की बैठक को संबोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत और अमेरिका को 'स्वाभाविक सहयोगी' बताया था। तभी से ऐसी भावना हमारे नेताओं के बयानों में दिखती रही है। और इसी भावना का एक शक्तिशाली पक्ष था कि तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत के साथ एक असैन्य परमाणु समझौता किया, यह जानते हुए भी कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है। हालांकि बुश की विदाई और भारत में यूपीए-दो की सरकार आने के बाद संबंधों में गिरावट आई, लेकिन अब जबकि भारत में नई सरकार पूर्ण बहुमत में है, वाशिंगटन एक बार फिर नई दिल्ली के साथ अपने रिश्तों में गर्माहट लाने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है।
अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के रिश्तों में आई ठंडक की वजह 'विश्वास की कमी' है। लेकिन हकीकत में यह असली समस्या पर पर्दा डालने की कोशिश है। असली वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है, जिसे दूर करके ही दोनों देश संबंधों को नई ऊंचाइयां दे सकते हैं।
हमसे अमेरिका के हित इसलिए जुड़े हैं, क्योंकि यह संबंध उसकी भ-ूराजनीतिक जरूरतें पूरी करने के साथ ही चीन को भी थाम सकता है। उसे भारतीय बाजार की ताकत का भी एहसास है, और इसे अपनी कंपनियों के लिए अनुकूल बनाने के लिए वह स्वाभाविक तौर पर हमसे हाथ मिलाना चाहता है। वैसे भारत भी इस दोस्ती का इच्छुक होगा, क्योंकि अमेरिकी निवेश और तकनीक की चाहत हमें भी होगी। इतना ही नहीं, प्रौद्योगिकी आपूर्ति करने वाले संगठनों में भी शामिल होने के लिए भारत को अमेरिकी मदद की दरकार होगी। ये हैं- परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण क्षेत्र, पारंपरिक हथियार और माल तथा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण संबंधी वसेनार व्यवस्था और ऑस्ट्रेलियाई समूह, जो कि विनिर्माण क्षेत्र की बड़ी ताकत बनने में भारत के मददगार हो सकते हैं। सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के साथ दोस्ती जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप जैसे अन्य देशों के साथ संबंध आगे बढ़ाने के लिए लाभप्रद है।
लेकिन जब बात निवेश की आती है, तो अमेरिकी सरकार के हाथ बंधे दिखते हैं। वहीं दूसरी तरफ, चीन और जापान जैसे देशों के पास तकनीक के साथ ही पैसे भी हैं। इसी की बानगी है कि नॉर्थ-साउथ इंडस्ट्रियल ऐंड फ्रेट कॉरिडोर के लिए ही जापान सरकार ने हमें 10 अरब अमेरिकी डॉलर की मदद की है, साथ ही कई अन्य प्रोजेक्ट के लिए भी उसने हमें अरबों डॉलर दिया है। चीन ने भी संकेत दिया है कि वह भारत के बुनियादी ढांचे के निर्माण में मदद करना चाहता है और आने वाले दिनों में 300 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता दे सकता है।
निस्संदेह विज्ञान और तकनीक, रक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में हम अमेरिकी मदद से सुधार कर सकते हैं। शिक्षा और कृषि के आधुनिकीकरण में अमेरिका ने हमारी मदद की है। लेकिन आज ऐसी कोई कल्पनाशील और स्वीकार्य प्रतिबद्धता नहीं दिख रही, जो हमारे नए रिश्तों का प्रतीक हो।
हमें यह समझने की जरूरत है कि दोनों देशों में विषमता इसलिए कायम है, क्योंकि हम अधिक से अधिक देने के बदले अधिक से अधिक लेने में विश्वास करते हैं और इसलिए हमारे हाथ भी बंधे हैं। हमें इस मानसिकता से जल्दी ही बाहर निकलने की जरूरत है। लिहाजा भारत को अपनी ताकत बढ़ाने और कमजोरी से पार पाने के लिए एक रणनीति बनाने की आवश्यकता है। यह कुछ वैसा ही होना चाहिए, जैसा चीन और कोरिया ने क्रमशः अमेरिका और जापान के साथ हाथ मिलाने से पहले सफलतापूर्वक किया है। क्या हमारी सरकार ऐसा करने के लिए तैयार है?