वर्ष 2015 में प्रकाशित पुस्तक ट्रैक्स ऑफ चेंज : रेलवेज ऐंड एवरीडे लाइफ इन कॉलोनियल इंडिया की लेखिका के तौर पर मेरा मानना है कि इस सवाल का जवाब 19वीं शताब्दी के विशाल बुनियादी ढांचे संबंधी परियोजनाओं में निहित हैं, जिनकी नींव औपनिवेशिक इच्छाओं व पूंजीवादी जरूरतों के मेल से पड़ी थी। आज भी रोजाना करीब 2.3 करोड़ यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती भारतीय रेल परिवहन की रीढ़ बनी हुई है। कोरोना से पहले के वित्त वर्ष (2018-19) में भारत में 7.7 अरब लोगों ने रेल यात्राएं की थीं। इसकी तुलना हवाई यात्रा से करें, तो महामारी के बाद 2022 में हवाई यात्रा करने वाले कुल यात्रियों का आंकड़ा महज 12.5 करोड़ ही रहा।
1840 के दशक में जब भारत में पहली बार रेलवे की योजना बनाई गई, तो इसका मुख्य उद्देश्य माल और पशुओं की ढुलाई था। ईस्ट इंडिया कंपनी दरअसल व्यापारिक एकाधिकार की एक व्यवस्था थी, जिसने ब्रिटिश ताज के अधीन रहते हुए धीरे-धीरे भारत के एक बड़े हिस्से पर कब्जा और उस पर शासन किया। कंपनी के निदेशकों को भारतीयों में रेल यात्री बनने की संभावना नहीं दिखती थी। जबकि अनेक लोग न सिर्फ भारतीयों के गतिहीन होने के ब्रिटिश तर्क से असहमत थे, बल्कि अपने समर्थन में वे समुद्री रास्तों से भारतीयों के व्यापार के समृद्ध इतिहास की याद दिलाते थे।
इसके बावजूद ब्रिटिश कालीन रेलवे नीति इस औपनिवेशिक सोच पर आधारित थी कि भारत के लोग गरीबी- तंगहाली से ग्रस्त, छोटे-छोटे गांवों में अलग-थलग रहने वाले और धार्मिक रूढ़ियों से घिरे हैं और यात्राएं करने में सक्षम नहीं हैं। यह विचार हालांकि उस औपनिवेशिक सोच से गुंथा था कि रेल नेटवर्क से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को ताकत मिलेगी। रेलवे के विकास का विचार औपनिवेशिक व्यापारिक आधिपत्य की व्यवहारिक जरूरतों से भी जुड़ा था, जो अंग्रेजी उद्योगों के लिए जरूरी कपास जैसे कच्चे माल की आपूर्ति के लिए आवश्यक थीं। भारत के अंदरूनी क्षेत्रों से कच्चे माल को बंदरगाह वाले शहरों तक तेजी व कुशलता के साथ पहुंचाने के लिए रेल व्यवस्था जरूरी थी।
तृतीय श्रेणी के कूपों का किराया कम रख भारतीयों को ललचाने की कोशिश की गई, जो बेशक पूंजीवादी उद्यम के लाभ कमाने के उद्देश्य के उलट थी। पर ब्रिटिश पूंजीपतियों व अंशधारकों को रेलवे से लाभ की चिंता करने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि सरकार ने भारतीय करदाताओं की कीमत पर इन कंपनियों को अपने निवेश पर पांच फीसदी वार्षिक रिटर्न देना सुनिश्चित किया था।
तमाम संदेहों के बावजूद भारतीय रेलवे ने बड़ी संख्या में यात्रियों को आकर्षित करना शुरू किया था। 1854 में जब रेल मार्गों पर संचालन शुरू हुआ, तब करीब पांच लाख लोगों ने रेल यात्रा की थी। वर्ष 1875 में यह संख्या 2.6 करोड़, वर्ष 1900 में 17.5 करोड़ और 1919-20 में 52 करोड़ तक पहुंच गई। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के समय रेलयात्रियों की वार्षिक संख्या 100 करोड़ से ज्यादा हो गई थी। लोगों से ठसाठस भरी उस समय की रेलगाड़ियों की तस्वीरें दरअसल विभाजन के समय के भयावह हालात का प्रतीक थीं।
उस भीड़ का 90 फीसदी हिस्सा तृतीय श्रेणी के यात्रियों का था। रेलयात्रियों की बढ़ती संख्या के बाद भी किराये में कमी नहीं की गई, न भारी भीड़ और गंदगी वाली तृतीय श्रेणी की यात्रा में सुधार के प्रयास किए गए। तृतीय श्रेणी में भारी भीड़ होने का बड़ा कारण रेल डब्बों का आयात न होना था। जानवरों के डब्बे में इंसानों को ले जाया जाता था। अंग्रेजों का मानना था कि ट्रेनों में भीड़ भारतीयों की अजीब आदतों की वजह से होती है और उन्हें भेड़ों के झुंड की तरह खचाखच भरी ट्रेनों में सफर करना ही अच्छा लगता है। वर्ष 1929 में एक अंग्रेज पत्रकार एच. सदरलैंड स्टार्क ने लिखा था कि समस्या रेल व्यवस्था में नहीं है, बल्कि भारतीय यात्रियों में ही समझदारी से यात्रा करने की जरूरी मानसिक तैयारी और प्रक्रियाओं को समझने का अभाव है। स्टार्क ने रेलवे की समस्याओं के समाधान के लिए तब यात्रियों को शिक्षित किए जाने की वकालत की थी। ऐसा कहने वाले वह अकेले नहीं थे। 1910 के दशक में तृतीय श्रेणी के यात्रियों की परेशानियों को लेकर रेल प्रबंधन की निंदा करते हुए नागरिकों का एक निकाय बनाने के लिए रेल यात्रियों को शिक्षित करने की जरूरत पर खुद महात्मा गांधी ने भी बल दिया था।
एक सदी से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। 12 मार्च, 2005 को द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक आलेख में इस लेखिका ने दिल्ली मेट्रो की सराहना करते हुए लिखा था कि 'इनमें हॉकरों और भिखारियों जैसे अराजक वर्ग नहीं हैं, जो कि अमूमन भारतीय रेल की पहचान माने जाते हैं, न ही दरवाजों से लटकते हुए मुसाफिर दिखाई देते हैं।'
ओडिशा में हुई ताजा दुर्घटना पर लौटें, तो इसके बाद यह बहस तेज हो गई है कि भारत की रेल आधुनिकीकरण की परियोजनाओं में क्या सुरक्षा को पीछे धकेल दिया गया है। शुरुआती विश्लेषण बताते हैं कि सिग्नल का फेल होना ओडिशा में हुए रेल हादसे की वजह हो सकता है। शायद यह अतिशयोक्ति लगे, लेकिन 1947 में भारतीय रेलवे की तस्वीरें जिस तरह तत्कालीन बदहवासी का रूपक बनीं, उसी तरह ओडिशा में हुई ट्रेन दुर्घटना को भी पश्चिम में समकालीन भारत के मूल्यांकन के प्रतीक के तौर पर पेश किया जाए, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। (कन्वर्सेशन)
-लेखिका नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर हैं।