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राजनीति: दोराहे पर विपक्ष और चौराहे पर विपक्षी एकता, केंद्र में राहुल

नीरजा चौधरी
Updated Fri, 24 Mar 2023 06:47 AM IST

सार

सूरत की एक अदालत का मानहानि के मामले में राहुल गांधी को दोषी ठहराने वाला फैसला क्या विपक्ष की राजनीति में निर्णायक बिंदु बन सकता है? या नेतृत्व को लेकर विपक्षी दलों में व्याप्त दरारों का फायदा भाजपा को होता रहेगा?
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विपक्ष - फोटो : ANI


भारतीय राजनीति का यह विरोधाभास है कि मजबूत राहुल भाजपा के लिए अच्छी खबर है और विपक्ष के लिए खराब खबर। अच्छी खबर इसलिए, क्योंकि 2024 के चुनाव के 'मोदी बनाम राहुल' बनने की संभावना है और आज जैसे हालात हैं, उसमें लगता है कि इससे मोदी को लाभ होगा। पूरे देश में 4,000 किलोमीटर की पदयात्रा ने राहुल का कद बढ़ाया है और यह उनकी अपनी उपलब्धि है, जिसमें परिवार के नाम का कोई योगदान नहीं है। और इसीलिए उन्हें मोदी के मुख्य विरोधी की तरह देखा जाने लगा और वह विपक्ष का 'चेहरा' बनते भी दिखे, फिर चाहे विपक्षी दल उन्हें इस रूप में स्वीकार करें या न करें।


विपक्ष की ओर से नेता कौन होगा, इसका फैसला तो 2024 के चुनावों के बाद ही होगा और यह स्थिति भी तब आएगी, जब विपक्ष सरकार बनाने की स्थिति में हो, पर अभी तो ऐसा नहीं लग रहा है। लिहाजा, मोदी बनाम विपक्ष से कौन? यह बहस भाजपा के कथानक को मदद करती है, न कि विपक्ष के एजेंडा को।

 

आज विपक्ष दो खेमों में बंटा हुआ है और उनके मतभेद इस मुद्दे के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं कि विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा। कुछ ऐसी पार्टियां हैं, जिनका अपने राज्यों में कांग्रेस के साथ गठबंधन है और वे कांग्रेस को नेतृत्व की भूमिका देने पर राजी हो सकती हैं। इनमें द्रमुक (तमिलनाडु), झारखंड मुक्ति मोर्चा (झारखंड), राजद और जनता दल (यू) (बिहार), एनसीपी और शिव सेना (महाराष्ट्र) शामिल हैं।


हाल ही में त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाली लेफ्ट पार्टियां गैर-भाजपा गठबंधन का समर्थन करेंगी, फिर कांग्रेस उसका नेतृत्व करे या न करे। इन दलों के अलावा ऐसी पार्टियां और नेता भी हैं, जो अपनी सरकार चलाने के लिए कांग्रेस पर निर्भर नहीं हैं, जिनमें ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल), अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (दिल्ली और पंजाब), के चंद्रशेखर राव की बीआरएस (तेलंगाना) शामिल हैं—और ये कांग्रेस (राहुल) का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेंगी। यहां तक कि समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी और 2024 में गांधी-नेहरू परिवार का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी से भी अपने उम्मीदवार खड़े करेगी। ये वे सीटें हैं, जहां सपा ने अपने उम्मीदवार खड़े नहीं कर अतीत में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को चुनाव जीतने में मदद की है।


पिछले हफ्ते ममता बनर्जी ने गौतम अदाणी की प्रधानमंत्री मोदी से कथित करीबी की जेपीसी जांच की कांग्रेस की मांग से प्रत्यक्ष रूप से खुद को दूर रखा था। आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति, जो कि कांग्रेस की 'बड़े भाई' की भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, कुछ अन्य पार्टियों की तरह कांग्रेस की कीमत पर ही आगे बढ़ी हैं। ये पार्टियां जानती हैं कि कांग्रेस के पुनर्जीवन की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है। लिहाजा यह सिर्फ अहंकार का मामला नहीं है, यह संकट इन क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए भी खतरा बन सकता है।


विपक्ष में गतिरोध टूटने का एक ही तरीका हो सकता है कि राहुल पीछे हट जाएं और विपक्षी एकता का मार्ग प्रशस्त करें। लेकिन ऐसा कहना आसान है, करना कठिन। यह कांग्रेस के नए जुड़े समर्थकों को हताश करने जैसा होगा, जिन्होंने भले ही अभी यह तय न किया हो कि वे किसे वोट देंगे, लेकिन राहुल को नई उम्मीद के रूप में देख रहे हैं।
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क्षेत्रीय दल अभी अपनी स्थिति को तौल ही रहे थे कि राहुल को दोषी ठहराने वाला फैसला आ गया। सूरत की अदालत के राहुल को दोषी ठहराने वाले फैसले के कुछ मिनट बाद ही राहुल के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण समर्थन आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने जताया, जबकि उन्हें विपक्ष की किसी भी अन्य पार्टी की तुलना में कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी के तौर पर देखा जाता है। यह अतीत से आगे बढ़ने का भी संकेत है; जबकि दिल्ली और पंजाब में आप को सफलता मिली ही कांग्रेस की कीमत पर है।


दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जब शराब घोटाले के सिलसिले में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, तब कांग्रेस उनके बचाव में सामने नहीं आई थी। अपने दो लेफ्टिनेंट-सिसोदिया और सत्येंद्र जैन के जेल में होने और केंद्र तथा उपराज्यपाल के साथ हर कदम पर टकराव होने के कारण केजरीवाल अलग-थलग पड़ गए हैं। यहां तक कि उनके लिए दिल्ली का बजट पारित करवाना भी मुश्किल हो गया। ऐसे में उन्हें लग रहा हो कि विपक्षी दलों को निशाना बनाने में भाजपा किसी भी हद तक जा सकती है।


अभी यह सवाल अहम है कि क्या राहुल को सजा सुनाए जाने के बाद उनकी लोकसभा की सदस्यता भी जा सकती है। आपराधिक मामलों में सजा सुनाए जाने पर सदन की सदस्यता जा सकती है और छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जा सकता है, जैसा कि लालू प्रसाद यादव के मामले में हो चुका है। गुजरात की निचली अदालत ने राहुल को गुजरात उच्च न्यायालय में अपील करने के लिए तीस दिनों का समय दिया है। लेकिन क्या उच्च न्यायालय फैसले पर स्थगन दिए बिना मामले की सुनवाई कर सकता है? दूसरे शब्दों में, राहुल को लोकसभा से अयोग्य घोषित कर दिया जाए, भले ही वह उनके मामले की सुनवाई करता रहे?


राजनीतिक मोर्चे पर अभी क्या कुछ होगा, नहीं कहा जा सकता, लेकिन क्या इससे राहुल गांधी के प्रति जनता में सहानुभूति पैदा हो सकती है-भले ही भाजपा इस मुद्दे को हवा दे रही हो? क्या राहुल 'पीड़ित' के रूप में क्षेत्रीय दलों की एकता में उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं?


विपक्षी दल विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों के दुरुपयोग की भर्त्सना कर रहे हैं, इसके बावजूद उनके मतभेद भी कायम हैं। हालांकि उनके भीतर से यह स्वर भी उठ रहे हैं कि जब भाजपा के दूसरे कार्यकाल में उन्हें मुकदमों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है, तो फिर मोदी के तीसरे कार्यकाल में क्या होगा? क्या राहुल की दोषसिद्धि विपक्षी राजनीति में निर्णायक बिंदु बन सकती है? या इसका फायदा भाजपा को होता रहेगा?

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