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सत्ता का संग्राम: चुनावी ‘पावर प्ले’ में बयानों की गुगली... भारतीय मतदाता तर्क-कुतर्क नहीं, बेहतर के हकदार

शंकर अय्यर
Updated Wed, 01 May 2024 06:54 AM IST

सार

भारत बेहतर का हकदार है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 96 करोड़ से अधिक मतदाता सिर्फ तर्क-कुतर्क के नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी विचारों के परिदृश्य के भी हकदार हैं। क्षमता और अवसर की विषमताओं से निपटने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
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राहुल गांधी-नरेंद्र मोदी (फाइल) - फोटो : अमर उजाला


अब तक घोषणा पत्र मूलतः चुनाव प्रचार के लिए 'आइटम सॉन्ग' होते थे, पर आश्चर्यजनक रूप से घोषणा पत्र जन अभियान रैलियों के 'थीम सॉन्ग' के रूप में उभरे हैं। कांग्रेस को शायद अपने राजनीतिक वादे में लोगों की इतनी दिलचस्पी की उम्मीद भी नहीं होगी, इसके न्याय पत्र को शायद भारी संख्या में डाउनलोड किया गया होगा। 


मीडिया में चर्चा है कि क्या न्याय पत्र में पुनर्वितरण के लिए निजी संपत्ति को जब्त करने का स्पष्ट उल्लेख है या नहीं। मुश्किल यह है कि पहचान के उपकरणों के रूप में प्रयुक्त व्यंजना (मंगलसूत्र, घुसपैठिया और ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले) को रेखांकित किया गया, जिसके चलते ध्रुवीकरण हुआ है। कांग्रेस इस बात पर बहस कर सकती है कि स्पष्ट रूप में क्या कहा गया है, लेकिन तेजी से बढ़ते चुनावी चक्र में राजनीति अंतर्निहित मान्यताओं की धारणाओं पर आधारित होती है। पिछले दो हफ्ते में नैरेटिव में आया बदलाव स्पष्ट है। अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक के बाद आम धारणा थी कि 2024 के चुनाव का नतीजा तय है। फरवरी में 'अबकी बार 400 पार' का नारा सामने आया और भाजपा ने अपने दम पर 350 का आंकड़ा पार करने का दावा किया। पिछले हफ्ते की घटनाओं ने धारणाओं को तो नहीं बदला है, पर 400 पार के आंकड़े पर समर्थकों के बीच भी सवाल उठने लगे हैं।


जिस बात पर चर्चा हो रही है, वह राजनीतिक तथ्यों के चरित्र पर कम और बयानबाजी के कारणों पर ज्यादा है। लोकप्रिय धारणा इसे पहले चरण में कम मतदान पर प्रतिक्रिया के रूप में परिभाषित करती है और यह अटकलों से भरा हुआ है। बहस का विषय यह है कि क्या यह जुबानी जंग मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिए है या ऐसे संदेश भेजने का उद्देश्य कार्यकर्ताओं को मतदान के लिए प्रेरित करना था? 


यह समझने में गलती नहीं करनी चाहिए कि भाजपा की अगुआई वाले राजग और विपक्षी गठबंधन की क्षमताओं में भारी असमानता है और यह क्षमता कांग्रेस के कारण और खराब हुई है। भाजपा का घोषणा पत्र आकांक्षाओं का दस्तावेज है-सब अमृत काल के विचारों में समाहित है। कांग्रेस का घोषणा पत्र महज वचन पत्र है। इसके कुछ वादों को यथोचित विस्तार दिया गया है, जबकि कुछ हिस्से पेचीदा हैं। इसमें बिना किसी स्पष्टीकरण के जातिगत और वित्तीय सर्वेक्षण की घोषणा ने दावों का पिटारा खोल दिया है, जिसका भाजपा ने लाभ उठाया। सैम पित्रोदा का वीडियो कांग्रेस की स्थिति को और कमजोर कर रहा है। हैरानी नहीं कि बहस विरासत-कर पर केंद्रित हो गई है-जिसे भाजपा ने जोर-शोर से उठाया और कांग्रेस विरासत-कर लागू करने से इन्कार कर रही है। असमानता एक जटिल विषय है। इतिहास हमें बताता है कि भारत में धन और संपत्ति पर कर लगाने की कोशिश की गई और फिर उन्हें खारिज कर दिया गया। 


प्रणालीगत असमानताओं को दूर करने का कोई भी प्रयास नीतियों में अंतराल को पाटने के साथ शुरू होना चाहिए। मसलन, कृषि को अधूरे आर्थिक मॉडल के अभिशाप से मुक्त करना। निश्चित रूप से, जाति जनगणना दोषों को उजागर कर सकती है, लेकिन क्षमता और अवसर की विषमताओं से निपटने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है—स्वास्थ्य में निवेश, प्राथमिक शिक्षा में सुधार और कौशल के लिए स्टाइपेंड आधारित ढांचे का निर्माण।


बहस वास्तविकताओं पर केंद्रित होनी चाहिए। क्या धन को नियंत्रित और पुनर्वितरित किया जा सकता है और किया जाना चाहिए? या क्या अभाव को करों से एकत्रित राजस्व से वित्त पोषित किया जाना चाहिए? क्या अरबों डॉलर रखने वाले धनाढ्यों के अप्रत्याशित लाभ पर कर लगाने की गुंजाइश है? ये ऐसे प्रश्न हैं, जो अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों को प्रभावित करते हैं। और यह स्वीकार करना चाहिए कि सरकारें पुनर्वितरण में लगी हुई हैं-और यह भारत की बैलेंस शीट पर दिखाई देता है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर भारत पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। 81.3 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य कवरेज, आवास, किसानों और महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण-सभी करों के रूप में मिलने वाले राजस्व से होता है।
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भारत की गरीबी के बारे में सच्चाई एक आंकड़े में अंतर्निहित है—कृषि में लगे लगभग आधे कार्यबल को राष्ट्रीय आय के छठे हिस्से पर निर्भर रहना पड़ता है। इस कॉलम में पहले भी भारतीय अर्थव्यवस्था के राजनीतिक भूगोल को चित्रित किया गया था-बिहार के शिवहर और तेलंगाना के हैदराबाद में प्रति व्यक्ति आय में अंतर बहुत बड़ा है। क्षेत्रीय और भौगोलिक विचलन और नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता से बचा नहीं जा सकता है। निश्चित रूप से भारत को शैक्षिक, डिजिटल या आय जैसे कई अंतरों को पाटना चाहिए। ये मुद्दे एक मजबूत बहस की मांग करते हैं। दिक्कत यह है कि विपक्ष बिखरा हुआ है। लगता है कि प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस के पास अपना नुकसान करने की प्रतिभा और भाजपा को फायदा पहुंचाने की अद्भुत क्षमता है। 


भारत बेहतर का हकदार है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 96 करोड़ से अधिक मतदाता सिर्फ तर्क-कुतर्क के नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी विचारों के परिदृश्य के भी हकदार हैं।

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