यह देखकर शर्मिष्ठा ने कहा, ‘राजकुमारी के वस्त्र पहन लेने से तुम कोई राजकुमारी नहीं बन जाओगी। तुम्हारे पिता, मेरे पिता के सेवक हैं, इसलिए तुम भी मेरी सेविका हो।’ इस पर दोनों में बहस हो गई और शर्मिष्ठा ने देवयानी को सूखे कुएं में धकेल दिया और महल में लौट आई। इधर, कुएं में फंसी देवयानी सहायता के लिए पुकारने लगी। संयोगवश उसी समय राजा ययाति वहां से गुजर रहे थे। ययाति ने देवयानी की आवाज सुनी, तो उसे कुएं से बाहर निकाल लिया। दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए थे। शुक्राचार्य की सहमति से दोनों का विवाह हो गया।
इसी बीच शुक्राचार्य को पता चला कि शर्मिष्ठा ने देवयानी को कुएं में गिरा दिया था। उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने वृषपर्वा को संदेश भेजा कि शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनकर ययाति के महल में रहना होगा, अन्यथा वह असुर-गुरु का पद त्याग देंगे। शुक्राचार्य के बिना असुरों का पतन निश्चित था। इसलिए शर्मिष्ठा ने दासी बनकर रहना स्वीकार कर लिया। एक दिन शर्मिष्ठा का उद्यान में ययाति से सामना हो गया। ययाति शर्मिष्ठा का अनुपम सौंदर्य देखकर मुग्ध हो गए। परंतु शुक्राचार्य के कोप का भय उन्हें सता रहा था। आखिर दोनों ने चुपचाप गंधर्व विवाह कर लिया।
कुछ दिन बाद देवयानी के दो पुत्र हुए–यदु और तुर्वसु। उधर ययाति से शर्मिष्ठा के भी तीन पुत्र हुए-द्रुह्यु, अनु और पुरु। इन तीनों का रूप-रंग ययाति जैसा ही था, जिसे देखकर देवयानी को संदेह हो गया। उसने पता किया, तो इसकी पुष्टि हो गई कि शर्मिष्ठा के तीनों पुत्रों के पिता भी ययाति ही थे। देवयानी ने इसकी जानकारी पिता शुक्राचार्य को दी। क्रोधित शुक्राचार्य ने ययाति को शाप दे दिया, जिसके फलस्वरूप ययाति तत्काल वृद्ध हो गए।
लेकिन ययाति का मन भोग से भरा नहीं था। उन्होंने शुक्राचार्य से शाप वापस लेने की विनती की। शुक्राचार्य ने ययाति से कहा-मेरा शाप वापस नहीं हो सकता। परंतु तुम्हारा कोई भी पुत्र यदि चाहे, तो अपना यौवन तुम्हें देकर बदले में तुम्हारा बुढ़ापा ले सकता है। तब तुम फिर से युवा हो जाओगे।
यह सुनकर ययाति बड़े प्रसन्न हुए। वह अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु के पास गए और उससे यौवन मांगा, लेकिन यदु ने मना कर दिया। इसी प्रकार तुर्वसु, अनु और द्रुह्यु ने भी ययाति के आग्रह को अस्वीकार कर दिया।
अंत में ययाति अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु के पास गए...पुरु ने सहर्ष अपने पिता का अनुरोध स्वीकार करके उन्हें अपना यौवन देकर उनका बुढ़ापा ले लिया। अगले ही क्षण ययाति युवा हो गए और पुरु वृद्ध बन गए। ययाति ने अगले सौ वर्ष तक यौवन का आनंद लिया, फिर भी संतुष्ट नहीं हुए। पुरु ने अपने पिता ययाति से यौवन का कुछ और समय उपभोग करने को कह दिया, किंतु ययाति समझ चुके थे कि वासना का कोई अंत नहीं है। वह भोग से और बढ़ती है। फिर ययाति ने पुरु को उसका यौवन लौटा दिया। ययाति अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु की उदारता और पितृभक्ति से बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने पुरु को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को शाप दिया कि उसके वंशज कभी राजा नहीं बनेंगे।
इसके बाद पुरु को राजसिंहासन सौंपकर ययाति ने देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ वानप्रस्थ ले लिया। कालांतर में ययाति के पांचों पुत्रों से पांच वंश उत्पन्न हुए। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुह्यु से भोज, अनु से म्लेच्छ और पुरु से पौरव वंश की उत्पत्ति हुई।