इस बीच देवताओं के सामने भयानक संकट मंडरा रहा था। नमुचि असुर के पुत्र तारकासुर ने तीनों लोकों में आतंक फैला रखा था। उसे ब्रह्मा से वरदान मिला था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र से संभव है। परंतु शिव सृष्टि से विमुख होकर तपस्या में लीन थे। ऐसे में शिव के पुत्र की उत्पत्ति असंभव ही थी। तब देवताओं ने एक योजना बनाई।
वे हिमवान की पुत्री पार्वती के पास पहुंचे। पार्वती ही पूर्वजन्म में सती थीं। पार्वती ने संकल्प लिया कि वह शिव को फिर पति रूप में प्राप्त करेंगी। उन्होंने इसके लिए कठोर तपस्या की। किंतु शिव ध्यान में इतने लीन थे कि उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं था। तब देवताओं ने कामदेव का आह्वान किया और उनसे आग्रह किया कि वह शिव की तपस्या को भंग करके उन्हें पार्वती की ओर आकर्षित करें।
कामदेव जानते थे कि यह अत्यंत जोखिम भरा है। फिर भी उन्होंने देवताओं और सृष्टि के कल्याण के लिए इस कार्य को करना स्वीकार किया। उनकी पत्नी रति ने रोकने की कोशिश की। उसने कहा, ‘स्वामी, क्या आपने सुना नहीं कि शिव जब क्रोधित होते हैं, तो संहार कर डालते हैं?’ लेकिन कामदेव मुस्कराए और बोले, ‘यदि प्रेम के लिए प्राण देना पड़े, तो वह मृत्यु नहीं, परम सौभाग्य होगा।’
बसंत ऋतु के साथ कामदेव कैलाश पहुंचे। उन्होंने चारों ओर फूलों की वर्षा की, सुगंध फैलाई, कोयलों की मधुर कूक से वातावरण आलोकित किया। पूरी सृष्टि प्रेम से गूंज उठी। कामदेव ने पुष्प-बाण धनुष पर चढ़ाया और निशाना साधा। जैसे ही प्रेम-बाण शिव के हृदय में लगा, शिव का ध्यान भंग हो गया।
एक क्षण के लिए शिव की दृष्टि पार्वती पर ठहर गई। उनके हृदय में हलचल हुई, किंतुु उसी क्षण उन्हें बोध हो गया कि किसी ने उनकी तपस्या भंग करने का दुस्साहस किया है।
शिव के भीतर क्रोध की ज्वाला भड़क उठी। उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उस नेत्र से निकली अग्नि की ज्वाला सीधे कामदेव पर पड़ी और क्षणभर में कामदेव का शरीर जलकर भस्म हो गया। प्रेम, जो कुछ क्षण पहले तक हवा में सुगंध बनकर बिखर रहा था, सहसा भस्म में परिवर्तित होकर उड़ गया।
सारी सृष्टि स्तब्ध रह गई। रति विलाप करने लगीं। वह शिव के चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं, ‘हे महादेव, मेरे स्वामी ने यह कार्य सृष्टि के कल्याण के लिए किया था। आपने उन्हें भस्म कर दिया। मैं अब किसके सहारे अपना जीवन व्यतीत करूंगी?’
कुछ देर बाद शिव का क्रोध शांत हुआ, तो वह करुणा से भरकर रति से बोले, ‘रति, कामदेव का शरीर भस्म हो चुका और वह तो वापस नहीं आ सकता, किंतुु मैं तुम्हें वचन देता हूं कि कामदेव, प्रत्येक जीव के हृदय में भाव बनकर अदृश्य रहेगा तथा प्रेम एवं करुणा के रूप में अभिव्यक्त होता रहेगा। अपने समस्त अंग खो देने के कारण अब से कामदेव का एक नाम ‘अनंग’ होगा!’
समय बीता। पार्वती ने शिव को भक्ति और प्रेम से प्राप्त किया। फिर दोनों का विवाह हुआ और आखिर शिव एवं पार्वती ने एक अत्यंत तेजस्वी, बलवान और विज्ञ पुत्र को जन्म दिया। उस बालक का नाम था-कार्तिकेय। अपने जन्म के कुछ ही समय बाद कार्तिकेय ने भीषण युद्ध करके तारकासुर का वध कर दिया। तारकासुर के अंत के साथ ही सृष्टि में सदाचार और संतुलन की फिर से स्थापना हो गई।
इस प्रकार, शिव की क्रोधाग्नि ने कामदेव के शरीर को तो भस्म कर दिया, परंतु उसकी आत्मा को प्रेम की अदृश्य शक्ति के रूप में अमरता भी प्रदान कर दी। यही अनंग प्रेम, सृष्टि का मूल और जीवन का स्पंदन कहलाता है।