मुझे लगता है कि महत्वाकांक्षा के अजगर के साथ इस संघर्ष को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है, यदि इसे पांच घटक संघर्षों में विभाजित कर दिया जाए-
शिल्प और उपलब्धि के बीच संघर्ष
अपने 1941 के उपन्यास, व्हाट मेक्स सैमी रन? में बड शुलबर्ग एक उग्र, आत्म-केंद्रित और महत्वाकांक्षी व्यक्ति का वर्णन करते हैं, जो हॉलीवुड में पटकथा लेखक के रूप में बड़ा नाम कमाता है। वह साहित्यिक चोरी करता है, दूसरों के विचार चुराता है, शॉर्टकट अपनाता है, और एक ऐसी पटकथा से खुश होता है, जो पैसा कमाती है, भले ही वह औसत दर्जे की ही क्यों न हो। यह एक महत्वपूर्ण बात है- आप जो करते हैं, उसमें अच्छा बनने की आंतरिक इच्छा से कितने प्रेरित होते हैं? अगर आप सिर्फ पैसे और शोहरत के लिए काम कर रहे हैं, तो आपमें अपने काम के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता और समर्पण की कमी होगी, और आपके अंदर जुनून की कमी के रूप में काम और जिंदगी में साफ दिखाई देगी।
उपहार में मिले प्रेम और जरूरत के प्रेम में संघर्ष
अपनी पुस्तक द फोर लव्स में, सी.एस. लुईस ने लिखा है कि हमारे कुछ प्रेम पूर्णता से उत्पन्न होते हैं और कुछ शून्य से। अगर बचपन में किसी ने आप पर अपार प्रेम बरसाया हो और आप भी अपने पड़ोसियों, सहकर्मियों और उत्पादों पर अपार प्रेम बरसाना चाहते हैं, तो वह उपहार में मिला प्रेम है। लुईस जरूरत के प्रेम के उदाहरण के रूप में मिसेज फिडगेट नामक एक पात्र का उदाहरण देते हैं, जो अपने परिवार की देखभाल के लिए समर्पित है। पर वह हमेशा अपने त्याग का बखान करती रहती है। वह चालाक और नियंत्रणकारी है और अपने दिल के खालीपन को भरने की कोशिश कर रही है, इसलिए उसका प्यार आत्म-केंद्रित है। उपहार में मिला प्रेम मूलतः संसार से प्रसन्न होता है; जबकि जरूरत का प्रेम अतृप्ति और असफलता के भय से युक्त होता है। उपहार में मिला प्रेम मानवीय जुड़ाव को बढ़ावा देता है; जरूरत का प्रेम व्यक्ति को स्वयं में ही सीमित कर देता है, और एकाकीपन की ओर ले जाता है।
उत्कृष्टता और श्रेष्ठता के बीच संघर्ष
कुछ लोगों की लालसाएं तुलनात्मक नहीं होतीं। अगर वे किसी चीज में अच्छे हैं, तो वह संतुष्टि ही उसकी उपलब्धि है। जबकि कुछ दूसरे लोगों की लालसाएं मुख्यतः प्रतिस्पर्धात्मक होती हैं। उनका अच्छा होना ही काफी नहीं है; उन्हें दूसरों से बेहतर भी होना होता है। हमारा पूरा योग्यता-तंत्र (मेरिटोक्रेसी) श्रेष्ठता की चाहत के इर्द-गिर्द बुना गया है। सोशल मीडिया की दुनिया रैंकिंग और तुलना की एक क्रूर दुनिया है। येल धर्मशास्त्री मिरोस्लाव वोल्फ द कॉस्ट ऑफ एंबिशन में लिखते हैं, ‘श्रेष्ठता के लिए कुंठित प्रयास अक्सर आक्रामक आत्म-प्रवंचना के रूप में राहत ढूंढता है, जिसमें श्रेष्ठ को नैतिक रूप से अपूर्ण, अभिमानी और दमनकारी बताया जाता है।’ यह पर्याप्त नहीं है कि मैं ऊपर उठूं, दूसरों को गिराया भी जाना चाहिए।
उच्च और तुच्छ इच्छाओं के बीच संघर्ष
आपकी महत्वाकांक्षा की गुणवत्ता उस लक्ष्य से निर्धारित होगी, जिसे आप पाना चाहते हैं। सदियों से विद्वान कहते आए हैं, अगर आप शक्ति के भूखे हैं, तो आप हमेशा शक्तिहीन महसूस करेंगे और विश्वासघात से डरेंगे; यदि आप समझ के भूखे हैं, तो आपका संसार हमेशा आश्चर्यों से भरा रहेगा; और यदि आप ईश्वर के भूखे हैं, तो आप स्वयं पूर्ण प्रेम के भूखे होंगे और आपकी भूख, मेरा विश्वास है, उस प्रेम से शुद्ध हो जाएगी। हम सभी सहज रूप से जानते हैं कि कुछ इच्छाएं नैतिक रूप से दूसरों से श्रेष्ठ होती हैं। हम प्यार करना और प्यार पाना चाहते हैं, जो एक महान महत्वाकांक्षा है, लेकिन हमें लगता है कि अच्छा दिखने, जानकार होने और लोगों के बीच लोकप्रिय होने से हम इसे पा सकते हैं। संत ऑगस्टाइन ने चेतावनी दी थी कि आप जिससे प्यार करते हैं, उसके प्रति सावधान रहें, क्योंकि अंततः आप उसी के रूप में बदल जाते हैं, जिससे आप प्यार करते हैं। उन्होंने कहा कि नैतिक जीवन का अर्थ है अपने प्रेम को सही क्रम में रखना और उससे भी बेहतर की चाहत रखना।
महत्वाकांक्षा और आकांक्षा के बीच संघर्ष
महत्वाकांक्षा दुनिया में ऊंचा उठने की चाहत है। आकांक्षा दुनिया में एक बेहतर इन्सान बनने की चाहत है। पहली सामाजिक गतिशीलता के बारे में है, जबकि दूसरी आंतरिक परिवर्तन के बारे में है। मैं महत्वाकांक्षा की सराहना करता हूं, लेकिन आकांक्षा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है। ऐसे रिश्ते बनाने के लिए साहस चाहिए, जो आपने पहले कभी अनुभव नहीं किए। जब आप बाहरी प्रभाव के बजाय आंतरिक पवित्रता के लिए खुद को समर्पित करते हैं, तो दुनिया आपकी उतनी सराहना नहीं करती। पेशेवर सफलता अक्सर पूरे मन से, बिना किसी शर्त के एक लक्ष्य का पीछा करने से मिलती है। लेकिन जो लोग हमें पसंद आते हैं, वे थोड़े संशय के साथ बगैर मंजिल का तनाव लिए रास्तों का मजा लेते हुए दिखते हैं।