वेदवती ने अतिथि-धर्म के अनुसार पाद्य, फल और जल से रावण का सत्कार किया। परंतु रावण के मन में पाप था। वह वेदवती के समीप पहुंचा और बोला, ‘कल्याणी! तुम कौन हो और यहां क्या कर रही हो?’ वेदवती के अनुपम सौंदर्य को देखकर रावण का हृदय विकार से संतप्त हो गया। उसने वेदवती का हाथ पकड़कर उसके साथ अभद्र व्यवहार करने का प्रयास किया। रावण की इस कुचेष्टा को देखकर वेदवती को क्रोध आ गया। उसने रावण को अपने तपोबल से स्तंभित कर दिया। रावण में कुछ कहने-करने की क्षमता नहीं रह गई थी। वेदवती ने रावण को शाप भी दिया, ‘तू मेरे कारण अपने बंधु-बांधवों सहित काल का ग्रास बनेगा और चूंकि तूने दूषित भाव से मुझे स्पर्श किया है, इसलिए मैं इस शरीर को त्याग रही हूं।’ यह कहकर वेदवती ने योग द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया।
देवी वेदवती, अगले जन्म में राजा जनक की कन्या हुईं और उनका नाम सीता पड़ा। वेदवती (सीता) के कारण रावण को मृत्यु का मुख देखना पड़ा। वेदवती की तपस्या के प्रभाव से श्रीराम, सीता के पति हुए।
सीता ने बहुत दिनों तक श्रीराम के साथ सुख भोगा। कालांतर में श्रीराम, पिता की आज्ञा से लक्ष्मण और सीता सहित वनवास में गए। वहां सीता के हरण से पूर्व अग्निदेव ने सीता को अपने संरक्षण में ले लिया और उनके स्थान पर माया से उत्पन्न सीता को वन में छोड़ दिया।
इसी बीच श्रीराम ने एक स्वर्ण मृग देखा। सीता ने उस मृग को लाने के लिए राम से अनुरोध किया। राम जानकी की रक्षा हेतु लक्ष्मण को पीछे छोड़ मृग को मारने चल दिए। उन्होंने मृग को मार गिराया। परंतु वह मृग रावण का मायावी मामा मारीच था। उसने मरते समय राम की आवाज में ‘हा लक्ष्मण!’ पुकारा, तो अपने भाई राम को संकट में जानकर लक्ष्मण उसी ओर चल दिए। पीछे से सीता अकेली रह गईं और रावण ने अवसर का लाभ उठाते हुए सीता का हरण कर लिया। दोनों भाई जब आश्रम लौटे, तो सीता को वहां न पाकर दुखी हुए। फिर उन्होंने सीता की खोज आरंभ की। गोदावरी नदी के तट पर उन्हें जटायु से सीता का समाचार मिला। फिर उनकी भेंट मतंग मुनि की शिष्या शबरी से हुई, जिन्होंने श्रीराम को सुग्रीव से मिलने के लिए कहा।
सुग्रीव से मैत्री करके श्रीराम को पता लगा कि सीता को रावण ने लंका में बंदी बना रखा था। तब राम ने वानर-सेना बनाई और समुद्र पर पुल बांधा। उन्होंने लंका पहुंचकर रावण का वध किया तथा सीता को मुक्त कराया। तत्पश्चात सीता की अग्नि-परीक्षा हुई। अग्निदेव ने वास्तविक सीता को श्रीराम के समक्ष उपस्थित कर दिया। तब माया सीता ने पूछा, ‘मुझे बताइए कि मैं अब क्या करूं? और कहां जाऊं?’ श्रीराम बोले, ‘देवी! आप पुष्कर क्षेत्र में जाकर तपस्या कीजिए। इसके फलस्वरूप आपको स्वर्गलक्ष्मी बनने का सुअवसर प्राप्त होगा।’ यह सुनकर माया सीता ने पुष्कर जाकर तप आरंभ कर दिया। उनकी कठिन तपस्या के फलस्वरूप उन्हें स्वर्गलक्ष्मी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
यही माया सीता, द्वापर युग में राजा द्रुपद के यहां यज्ञ-वेदी से उत्पन्न हुईं और याज्ञसेनी कहलाईं। द्रुपद-पुत्री होने के नाते उन्हें ‘द्रौपदी’ भी कहते हैं। इस प्रकार सतयुग में कुशध्वज की कन्या वेदवती, त्रेता युग में माया सीता बनकर श्रीराम की सहचरी बनी तथा द्वापरयुग में द्रौपदी हुईं। उन्हें ‘त्रिहायणी’ कहा गया है, क्योंकि वे तीनों युगों में विद्यमान रही हैं।